कांग्रेस के लिए प्रेरक साबित हुई कॉकरोच जनता पार्टी
देश की राजनीति एक निर्णायक दौर में पहुंचती जा रही है। सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। कॉकरोच आंदोलन और विपक्ष के विरोध की तपिश सरकार बड़ी शिद्दत से महसूस कर रही है। ये अकारण नहीं है कि एक साथ संघ परिवार और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े तीन सबसे शक्तिशाली नेताओं— मोहन भागवत, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने आंदोलन और विपक्ष पर बेहद तीखा हमला बोला है। संघ प्रमुख जो अपनी गंभीरता के लिये जाने जाते हैं और जिनके बारे में मशहूर है कि वो बिना सोचे कोई बयान नहीं देते, ने विजय दशमी के दिन अपने सालाना संबोधन में आंदोलन को विदेशी साजिश से जोड़ कर उसे डिस्क्रेडिट करने की कोशिश की। बांग्लादेश और फ्रांस का ज़िक्र कर यह बताने की कोशिश की कि सरकार के खिलाफ जो लोग सड़कों पर उतरे हैं, वे देश को हिंसा और आगजनी में झोंकना चाहते हैं।
मोहन भागवत का ये बयान बेहद अहम है और इस ओर इशारा करता है कि न केवल सरकार बल्कि समूचा संघ परिवार देश में आंदोलन को लेकर बेहद परेशान है। वो इस बात से परेशान हैं कि कहीं हालात 1977 जैसे न बन जायें। तब इंदिरा गांधी के आपातकाल से त्रस्त जनता ने आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंका था और इंदिरा गांधी को जेल जाना पड़ा था।
आज ये कहा जा सकता है कि देश में कहीं भी संवैधानिक आपातकाल नहीं लगा है और न ही विपक्ष के पास जयप्रकाश नारायण जैसा कोई नायक है जिनका व्यक्तित्व प्रधानमंत्री से भी ऊंचा था। जेपी ने आपातकाल के विरुद्ध अगर आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया होता तो भी वो ‘भारत छोडो आंदोलन’ के हीरो के तौर पर इतिहास में याद किये जाते। बेहद प्रखर समाजवादी के रूप में भी देश उनको अपनी याददाश्त में रखता। जेपी वो व्यक्ति थे जिन्हें नेहरू अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। अगर वो नेहरू की बात मान लेते तो वो नेहरू के बाद देश के प्रधानमंत्री भी हो सकते थे लेकिन वो मन और स्वभाव से साधु थे लिहाजा उन्होंने राजनीति की पथरीली ज़मीन को छोड़ कर संन्यास ले लिया। किन्तु जब इंदिरा गांधी के प्रति लोगों में गुस्सा भड़का और उनकी तानाशाही खुल कर सामने आने लगी तो वो एक बार फिर राजनीति में उतरे और इंदिरा को हरा कर ही माने। आज उन जैसा नेतृत्व नहीं है लेकिन ये भी सच है कि मोदी इंदिरा गांधी भी नहीं हैं और भाजपा या संघ परिवार कांग्रेस भी नहीं हैं।
हर युग के अलग नायक और खलनायक होते हैं। इतिहास की धारा के हिसाब से उनका गठन होता है और वो अपने तरीके से इतिहास की दिशा को मोड़ने का काम करते हैं। मई के महीने में किसने सोचा था कि नरेन्द्र मोदी की सरकार को अपने एक बेहद पावरफुल मंत्री का इस्तीफा लेना पड़ेगा, तथा प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को बीस दिन तक संसद का सामना करने का साहस नहीं होगा, और ये सब किसी बड़े महामानव की वजह से नहीं बल्कि 30 वर्षीय एक छात्र के इंस्टाग्राम अकाउंट से संभव होगा। अभिजीत दिपके ने जो किया वो खुद उसने भी कभी ख्वाब में नहीं देखा होगा। उनकी कोशिश से जो आंदोलन खड़ा हुआ उसने मोदी सरकार का इकबाल खत्म कर दिया, खौफ का जो साम्राज्य बड़े जतन से खड़ा किया गया था, उसे छिन्न भिन्न कर दिया। जो काम विपक्ष नहीं कर पाया, वो काम बच्चों ने कर दिखाया। आज इस आंदोलन को कमजोर करने के लिये मोदी सरकार कानून का एक मकड़जाल बुन रही है और वो काफी हद तक उसमें कामयाब होती दिख रही है। आशुतोष रांका, सौरव दास और नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस अपने तरीके से उलझा कर उनके मनोबल को तोड़ना चाहती है। वो लड़ रहे हैं. सवाल ये है कि कब तक?
मैंने पहले भी कहा था कि कॉकरोच आंदोलन ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा दी है। अब उनसे ज्यादा उम्मीद करना, उनके साथ अन्याय करना होगा। बच्चों को सरकार का मनोबल तोड़ना था, वो उन्होंने कर दिया। मोदी सरकार की नींव में मट्ठा डालना था, वो उन्होंने कर दिया। अब राजनीति को आगे की लड़ाई लड़नी होगी। अब तक राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस और विपक्ष का धरना प्रदर्शन पार्श्व में था, वो नायक के सम्मुख सह नायक की भूमिका में थे। अब लीड रोल लेना होगा और बच्चों को प्रोटेक्शन देना होगा। उनको सरकार के शिकंजे से बचाना होगा और साथ लेकर चलना होगा। 1977 में आंदोलन ने बड़ी कामयाबी हासिल की थी लेकिन बाद में राजनीति ने अपने आप को अयोग्य घोषित कर दिया। लिहाजा भारत की राजनीति में जो एक मैच्योरिटी आनी थी वो नहीं आ पाई। अगर जनता पार्टी ने अपनी भूमिका सही ढंग से निभाई होती, तो देश में दो सेकुलर दलों के बीच संघर्ष होता और सांप्रदायिक दलों को देश में ज़हर फैलाने का मौका नहीं मिलता और न ही वो सरकार में आ पाते।
नेहरू सांप्रदायिक ताकतों के खतरों से वाक़िफ थे। वो जब तक प्रधानमंत्री रहे, उन्होंने कभी जनसंघ और हिंदू महासभा को पनपने का मौका नहीं दिया। वो कहते थे कि अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता की तुलना में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता ज्यादा खतरनाक होती है। नेहरू के जाने के बाद भी लंबे समय तक जनसंघ और हिंदू महासभा राजनीति के हाशिये पर ही रहे। कभी प्रभावशाली भूमिका में नहीं आ पाये। यही कारण है कि थक हार कर, निराश होकर, लगातार मिलती असफलता से आजिज़ आकर जनसंघ ने अपना अस्तित्व खत्म कर लिया व जनता पार्टी में विलय कर दिया। जनता प्रयोग के नाकामयाब होने के बाद जनसंघ का भाजपा के रूप में पुनर्जन्म हुआ।
जनता पार्टी के फेल्योर से उपजी निराशा ने कांग्रेस विरोधी सेंटिमेंट को सांप्रदायिक राजनीति की ओर धकेला। भाजपा और उसके मातृ संगठन आरएसएस ने इस खालीपन को भरने के लिये रामजन्मभूमि आंदोलन का सृजन किया और उन्हें आशातीत सफलता मिली। आपस में लड़ कर समाजवादी आंदोलन को खत्म करने वाले समाजवादी नेता इतने बुरे हाल में आ गये कि उन्हें अपनी राजनीति को ज़िंदा रखने के लिये भाजपा का पिछलग्गू बनना पड़ा, परजीवी बन गये। जार्ज फर्नांडिस, रामकृष्ण हेगड़े, एच.डी. देवेगौडा, नितीश कुमार जैसे प्रखर नेता राष्ट्रीय सोच के अभाव में भाजपा की शरण में आ गये। ये भाजपा की सबसे बड़ी जीत थी क्योंकि भाजपा के विकास के रास्ते में समाजवादी ही सबसे बड़ा रोड़ा थे। कांग्रेस का एक स्पेस था, वो कम ज्यादा होता रहा लेकिन समाजवादियों से निराश कांग्रेस विरोधी लोगों के पास भाजपा के पास जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। गुजरात से लेकर कर्नाटक तक समाजवादी सिमटते गये और भाजपा मज़बूत होती गई। इस मामले में लालू यादव व मुलायम सिंह यादव अपवाद रहे। वे कभी भाजपा से नहीं मिले लेकिन इन्हें भी आपस में लड़ने से फुर्सत नहीं थी। बिहार और यूपी में अपने अपने कबीले बनाकर सरदार बने रहे। संकीर्ण और अहंवादी सोच ने समाजवादी आंदोलन को पूरी तरह से समाप्त कर दिया। तेजस्वी और अखिलेश कहने को समाजवादी हैं किन्तु इनका जेपी और लोहिया के समाजवाद से कोई लेना देना नहीं है। इस दौरान भाजपा लगातार मज़बूत होती गई।
आज की तारीख में इन क्षेत्रीय दलों से कोई भी उम्मीद करना बेमानी होगा। न ये लड़ सकते हैं और न ही इनके पास दूरगामी राष्ट्रीय सोच है। इसलिये पिछले बारह साल में ये कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर पाये। अकेले राहुल गांधी हैं जो लड़ रहे थे लेकिन कांग्रेस इतनी कमजोर हो गई थी कि उसे फिर से खड़े होने में वक्त लगा। अब वो काफी हद तक खड़ी हो गई है। उसका आत्मविश्वास वापस आ गया है। और इस पूरे खेल में कॉकरोच आंदोलन ने उसके लिये उत्प्रेरक का काम किया है। कॉकरोच ने रास्ता दिखा दिया है कि मोदी सरकार के इ़कबाल और संघ परिवार के अहंकार को तोड़ा जा सकता है। बशर्ते लड़ाई नैतिकता के धरातल पर बिना डरे लड़ी जाये और जनता के मुद्दों से उसे जोड़ा जाये।

