उत्तर प्रदेश चुनाव में राजनीति पर जातीय समीकरण हावी
देश के सबसे बड़े और अधिसंख्य प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है। सभी राजनीतिक दल जातीय समीकरणों को साधने में जुटे हुए हैं। हालांकि यहां विधानसभा चुनाव की अभी विधिवत घोषणा नहीं हुई है मगर चुनावी सरगर्मियां अभी से शुरू हो गई है। छोटे बड़े सभी राजनीतिक दलों ने अपने अपने चुनावी हथियार संभाल किये है और वार प्रतिवार शुरू कर दिए है। इनमें सबसे बड़े चुनावी हथियार जातीय वोटों की गोलबंदी के है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों का महत्व हमेशा रहा है। राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन में जातीय समीकरणों को महत्व देते है। अभी भी यही चल रहा है, चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टियां जातीय समीकरणों को प्राथमिकता दे रही हैं। उम्मीदवारों को टिकट देते समय उनकी जाति और समुदाय को ध्यान में रखा जा रहा है। विभिन्न पार्टियां अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली जातियों के उम्मीदवारों को चुन रही हैं। जातीय समीकरणों के आधार पर उम्मीदवार चयन का सीधा असर चुनाव परिणामों पर देखने को मिल सकता है। अगड़ा-पिछड़ा, सवर्ण-दलित तक ही नहीं बल्कि जातीय समीकरणों में भी उपजातियां तक चुनावी नतीजे ऊपर नीचे कर देते हैं। कई पार्टियों का अस्तित्व जातीय आधार पर ही खड़ा है और वे अपने इसी जातीय आधार के बूते सीटों की मांग करते है।
उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने सामाजिक और जातीय आधार को मजबूत करने और वोट बैंकों को साधने में जुट गए हैं। समाजवादी पार्टी जहां पीडीए फॉर्मूले के जरिए अपने पारंपरिक जनाधार के साथ-साथ अब सवर्ण, खासकर ब्राह्मण मतदाताओं को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है। वहीं बसपा अपने दलित आधार को मज़बूत करने में जुटी है। सत्तारूढ़ भाजपा अपने स्वर्ण वोट बैंक के साथ ओबीसी और दलित मतदाताओं को गोलबंद करने के लिए प्रयासरत है। कांग्रेस का जनधजर पहले से ही खिसका हुआ है। कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन कर सीटें हासिल करने के उपाय खोज रही है। प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए अब कुछ वक्त ही बाकी रह गया है। यानी कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश का चुनावी साल शुरू हो चुका है। उत्तर प्रदेश के चुनाव ही देश की दशा और दिशा निर्धारित करेंगे। सत्तारूढ़ भाजपा ने मोदी और योगी के सहारे जहां सत्ता में वापसी की उम्मीद जगाई है वहां अखिलेश की समाजवादी पार्टी ने कुछ छोटे दलों से गठजोड कर मुकाबला कांटे का खड़ा करने का प्रयास कर रही है।
उत्तर प्रदेश इस समय जातीय संघर्ष के महाभारत में डूबकी लगा रहा है। सभी राजनैतिक पार्टियों ने सिद्धांतों और विचारों के इतर जात-पात को जीत के मूल मंत्र रूप में स्वीकार कर लिया है और तदनुरूप अपनी गतिविधियां बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की गतिविधियां अपने परवान पर है। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतियां बनाना शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जातियों की सियासत जोर शोर से शुरू हो गयी है। जातियों की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए सभी सियासी दलों में होड़ सी मच गयी है। इस जातीय महासंग्राम में एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है। चुनावी हथियार निकाल लिए है और प्रहार शुरू कर दिए है।
उत्तर प्रदेश की सियासत जातियों के ईर्दगिर्द ही घूमती रही है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जातीय समीकरण शुरु से ही अहम भूमिका निभाता आया है, ऐसे में सभी पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही बनाती हैं। राजनीति में जातीय समीकरण का बड़ा खेल हमेशा से माना जाता रहा है। प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी है। आने वाले महीनों में यह मुकाबला और तेज होने की संभावना है। उत्तर प्रदेश में ओबीसी और दलितों के बाद सबसे ज्यादा 23 प्रतिशत आबादी सवर्णों की है। सवर्ण यानी ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार, कुछ बनिया आदि। इनमें भी सबसे ज्यादा ब्राह्मण (11-13 प्रतिशत), फिर राजपूत (7-8 प्रतिशत), कायस्थ (करीब 2.25 प्रतिशत) और अन्य अगड़ी जातियां (करीब 2.75 प्रतिशत) हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव आगामी लोकसभा चुनाव की आधारशिला रखेगा। प्रदेश में चुनावी माहौल तेजी से गहराने लगा है। मिशन-2027 को लेकर भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। भाजपा मिशन-2027 को लेकर ओबीसी वोट बैंक, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर केंद्रित रणनीति अपना रही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी के साथ रहा है। सांसद ओवैसी की पार्टी भी दम खम के साथ चुनाव में कूद रही है। उत्तर प्रदेश के चुनाव ही देश की दशा और दिशा निर्धारित करेंगे।

