मुस्लिम नाटो की वास्तविकता
अपनी कुछ कमियों को दूर करने के लिए और संकटकाल में सुरक्षित रहने के लिए गठजोड़ बनाए जाते हैं, परन्तु परखकाल में पता चलता है कि कितने मज़बूत हैं? पिछले कुछ समय में एक गठजोड़ सामने आया सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए का, जिसे ‘मुस्लिम नाटो’ का नाम दिया गया। इस गठजोड़ ने अक्तूबर के पहले सप्ताह स्वयं को सक्रिय करने के लिए ‘मक्का गठजोड़’ जिसे मुस्लिम नाटो कहा जाता है, कदम उठाया। जब पहली बार हूती मिसाइलों द्वारा सऊदी अरब पर हमला किया गया था, तब यह सवाल सामने आया था कि क्या पाकिस्तान सऊदी अरब की मदद के लिए आगे आएगा? लेकिन जब पूरा एक महीना गुज़र गया और पाकिस्तान की तरफ से कोई भी कार्रवाई नहीं हुई तब जवाब अपने आप मिल गया। हो सकता है पाकिस्तान की कुछ वजह हो, लेकिन गठबंधन की मजबूती की परतें खुल गईं। अब ध्यान दें कि वजह क्या हो सकती है। क्या सैन्य क्षमता? नहीं, यह वजह नज़र नहीं आती। ग्लोबल फायर पॉवर इंडेक्स में पाकिस्तान 14वें स्थान पर खड़ा है, जिसके पास 6.80 लाख सक्रिय और 5.50 लाख रिज़र्व सैनिक हैं। इसकी वायु सेना में 1400 विमान हैं, जिनमें चीन द्वारा दिए गए विमान और अमरीकी एफ-16 सहित तीन सौ फाइटर जेट हैं, और जो बात-बात में भारत को परमाणु हथियार की धमकियां देता रहा है, लेकिन अगर कोई कमी है तो मानसिक दृढ़ता या राजनीतिक पाबंदी की। राजनीतिक पहलकदमी या धन। पूरा देश गरीबी की दलदल में पहुंचा दिया गया। ईरान-अमरीका युद्ध में क्या हुआ? पाकिस्तान ने स्वयं को मध्यस्थ के रूप में पेश किया। यू.एस. और ईरान के बीच बातचीत की मेजबानी की और युद्ध विराम में मददगार होना चाहा। इस भूमिका को आगे बढ़ाने में उसकी दिलचस्पी बनी रही क्योंकि उसने अपना प्रभाव, राजनीतिक लाभ और दुनिया के नीतिकारों में जगह बनानी थी। इसके लिए ईरान से अच्छे संबंध बनाए। पाकिस्तान ईरान के बीच 900 किलोमीटर सीमा बताई जाती है। अतीत में झांके तो दोनों देश एक-दूसरे पर हमले कर चुके हैं। ईरान जब भी चाहे पाकिस्तान की ऊर्जा आपूर्ति पर असर डाल सकता है। सीमा पर तनाव पैदा कर सकता है। ऐसे ही कुछ कारण हैं कि जिनके चलते पाकिस्तान ऐसी स्थिति को टालता रहा है। रणनीतिक प्राथमिकता भी एक वजह हो सकती है। पश्चिम एशिया धन और तेल के स्रोत पाकिस्तान के लिए प्राथमिक विषय होंगे। किंतु वह उसका पड़ोसी देश नहीं है। पाकिस्तान के लिए अपने पास के क्षेत्रों में ज्यादा बड़ी चुनौतियां हैं। अफगानिस्तान के साथ रिश्ते खराब हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि तालिबान से टी.टी.पी. (पाकिस्तानी तालिबान) को समर्थन प्राप्त है। दोनों देशों के बीच इस समय कट्टर दुश्मनी का भाव है। मसला हिंसक रूप ले चुका है। पाकिस्तान पूर्वी सीमा नहीं सम्भाल पा रहा। जिस आतंकवाद को उसने पाला, उसका बढ़ता प्रभाव अब उसके अपने लिए खतरा बन चुका है। उसे इस खतरे का सामना करना ही पड़ेगा। इसी वर्ष के पहले सात महीनों में हमलों में उसके अढ़ाई हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। पी.ओ.के. में शांति हो नहीं रही। बलोचिस्तान के हालात से पाकिस्तान पर दबाव स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में सऊदी अरब उसका ज़रूरी मोर्चा नहीं हो सकता। आर्थिक स्थिति पाकिस्तान की कतई बेहतर नहीं है। बार-बार कज़र् के लिए कटोरा उठा कर जाना पड़ता है। पैसा नहीं तो युद्ध नहीं। पाकिस्तान कोई भी युद्ध झेल नहीं सकता। उसकी अर्थव्यवस्था उसे सूली पर टांग देगी।



