अरुणाचल में अड़ंगा : ध्वस्त होंगे चीनी घेरेबंदी के मन्सूबे
अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन के सैनिकों के आमने-सामने होने के दावों पर चीन ने साफ किया है कि दोनों देश एक-दूसरे के संपर्क में हैं और समझौतों का सख्ती से पालन हो रहा है। दोनों पक्षों ने बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए उपयुक्त क्षेत्रों में एलएसी की समझ को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा की सहमति बनी है। विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। इन बयानों से यह साबित होता है कि अरुणाचल प्रदेश की भारत चीन सीमा पर सब कुछ सामान्य नहीं है। सेना और सरकार भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के निवर्तमान महानिदेशक की इस पुष्टि से कि अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कई स्थानों पर भारत और चीनी सैनिकों के बीच गतिरोध और टकराव की स्थिति बनी हुई है, इन्कार कर सकती है क्योंकि स्थिति शांत दिखती है पर यह एक ‘असहज स्थिरता’ है। चीन अरुणाचल प्रदेश से लगी नियंत्रण रेखा के पास तिब्बती इलाके के 628 गांवों में अपने लोगों को जबरिया बसा रहा है, उसकी 72 प्रतिशत ‘शियाओकांग’ सीमावर्ती गांव हमारी पूर्वोत्तर क्षेत्र के नियंत्रण रेखा के पास हैं, जिनमें से 90 प्रतिशत बस्तियां अरुणाचल प्रदेश की तरफ हैं। इनमें सैकड़ों ऐसे गांव भी बसाए गए हैं जिनका इस्तेमाल ‘दोहरे उद्देश्य’ के लिए किया जा सकता है यानी इनमें आम नागरिकों के रहने की जगह के साथ-साथ सैन्य बुनियादी ढांचा भी मौजूद है।
ऐसे में इस तथ्य को नकारना कठिन है कि चीनी सेना अरुणाचल में अतिक्रमण के प्रयास में नहीं है। सैटेलाइट से मिली तस्वीरों में चीन द्वारा सीमा के पास अपने गांवों का तेजी से विस्तार किए जाने की बात को झुठलाना संभव नहीं है। उसने सीमावर्ती क्षेत्र की कई ऐसी जगहों पर सड़कें, पुल और सैन्य शिविर बनाए हैं, जहां स्थानीय समुदाय पारंपरिक रूप से अपने मवेशियों को चराने, शिकार करने और वन उपज इकट्ठा करने के लिए जाते रहे हैं। चीन नियंत्रण रेखा के करीब बस्तियां बसाने के साथ स्थानीय युवाओं को भारत के खिलाफ भड़का भी रहा है। उसे भ्रम है कि इससे वह अरुणाचल प्रदेश के नज़दीकी इलाकों में अपना दावा मजबूत कर सकता है और धीरे-धीरे इस पूरे इलाके में जनसांख्यिकीय और रणनीतिक स्थिति बदल सकता है। हमारे लिए मुख्य चिंता चीनी बस्तियों का बढ़ना ही नहीं बल्कि धीरे-धीरे उस बहाने बुनियादी ढांचे का विस्तार व आबादी वाले इलाकों में नेटवर्क का निर्माण भी है। बुनियादी ढांचे चीन को संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में अपनी पहुंच और आपूर्ति मार्गों को बेहतर बनाने में मदद करेंगे और इससे चीन की सैन्य क्षमता को बढ़त मिलेगी।
इन सच्चाइयों के साथ यह भी सच है कि भारत इससे अनजान और बेफिक्र नहीं है या इस संकट निवारण के लिए कुछ नहीं कर रहा है। भारत सरकार और सेना इस स्थिति के प्रति पूरी तरह सचेत, सावधान ही नहीं बल्कि समाधान एवं प्रतिरोध हेतु पूरी तरह सक्रिय भी हैं। हां, यह सवाल ज़रूर हो सकता है कि चीनी आक्रामकता और सक्रियता के प्रत्युत्तर में ये कितने सफल और सार्थक होंगे? दोनों देशों के बीच हुए 1962 के एकमात्र युद्ध का अरुणाचल मुख्य केंद्र रहा था। दोनों देशों के बीच संबंध तब से ही तनावपूर्ण बने हुए हैं। 1975 के बाद से अरुणाचल प्रदेश में, कुछ छोटी-मोटी झड़पों को छोड़कर, कोई बड़ा टकराव नहीं हुआ है। यहां तक कि गलवान में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हाथापाई के दौरान भी, अरुणाचल प्रदेश की सीमा शांत रही। भारतीय अधिकारियों ने दशकों तक अरुणाचल प्रदेश में सड़कें बनाने से इसलिए परहेज किया कि इससे हमलावर चीनी सेना को दक्षिण की ओर आने के लिए एक आसान रास्ता मिल जाएगा। मगर बाद में लगा कि खराब कनेक्टिविटी की वजह से अपने सैनिकों तक ज़रूरी सामान पहुंचाना तो मुश्किल है ही, वहां के नागरिक भी मुख्यधारा से कटे रहे। इस बीच चीन ने अपनी तरफ सड़कों का एक बड़ा जाल बिछा लिया। अब भारत कनेक्टिविटी को अपनी सुरक्षा और प्रतिरोध क्षमता मानते हुए वह न सिर्फ अरुणाचल के दूरदराज़ के सीमावर्ती इलाकों के हालात बदल रहा है बल्कि चीन द्वारा किए जा रहे बड़े पैमाने के बुनियादी ढांचे के विकास का मुकाबला भी कर रहा है।
सेना सीमा तक पहुंच, सैन्य रसद, सीमावर्ती गांवों का विकास और निगरानी क्षमता की चैतरफा रणनीति पर मजबूती से काम कर रही है। यहां सीमा के सैन्य शिविरों में पहले से ज्यादा सैनिक तैनात हैं। केन्द्र सरकार ने एलएसी के करीब बस्तियों के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान करने के लिए अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख की सरकारों के साथ काम करने का मन बनाना उचित है। रक्षा मंत्रालय और सड़क निर्माण विभाग इलाके में सैकड़ों किलोमीटर लंबी सड़कें बना चुके हैं, जिनमें ‘सेला टनल’ भी शामिल है, जिससे सर्दियों के मौसम में भी यहां के सबसे बड़े कस्बे तवांग तक पहुंचना सुगम हुआ है। अरुणाचल प्रदेश की नदियों में जलविद्युत निर्माण की अपार संभावनाएं देखते हुए सरकार की योजना कई बांध बनाने की है, जिसमें ‘अपर सियांग’ नदी पर बनने वाला अब तक का सबसे बड़ा बांध भी शामिल है। सीमा की सुरक्षा केवल वहां तैनात सैनिकों की क्षमता से नहीं बल्कि वहां रहने वाले नागरिकों के भरोसे, समृद्धि और भविष्य की संभावनाओं से भी मजबूत होती है। यही वह दीर्घकालीन आधार है, जो भारत को अरुणाचल में अपनी उपस्थिति बनाए रखने और चीन के साथ सामरिक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में मदद करेगा। सरकार ने ‘वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम’ के मद में राज्य की 2,082 परियोजनाओं के लिए लगभग 28 अरब रुपये आवंटित किये जो राज्य की जीडीपी का 6 प्रतिशत है। योजना में सड़क, बिजली, दूरसंचार, पेयजल, पर्यटन, कौशल विकास और स्थानीय रोज़गार जैसे विषय शामिल होने से इस इलाके से लोगों का पलायन रुका और आर्थिक स्थिति सुधरी।
यह राज्य हमेशा से भारत के सबसे गरीब और मुख्यधारा से कटे हुए इलाकों में से एक रहा है, लेकिन इसके चलते विगत वर्ष यहां की अर्थव्यवस्था में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो देश में तीसरी सबसे तेज़ विकास दर है। यहां एक ऐसा पर्यटन स्थल विकसित किया गया है, जहां पर्यटकों को बॉर्डर पोस्ट तक ले जाकर उन्हें 1962 के युद्ध के इतिहास के बारे में बताया जाता है। पर्यटक 4,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘बम ला पास’ में, चीनी सीमा की ओर मुंह करके ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हैं। सरकार को अब सड़क निर्माण से आगे बढ़कर सड़क परियोजनाओं का मूल्यांकन इस आधार पर करना चाहिए कि वह कितने गांवों को हर मौसम में जोड़े रहती है, आपदा के बाद सड़क कितनी जल्दी बहाल होती है। पुलों, वैकल्पिक संपर्क मार्गों और संचार सुविधाओं का रखरखाव भी प्राथमिकता होनी चाहिए। उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने पर जोर देना होगा, तो शिक्षा और स्थानीय युवाओं के लिए अवसर बनाने के साथ स्वास्थ्य, प्रशासन और आपदा प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट, स्थानीय रेडियो और आपदा-संचार को मजबूत करना आवश्यक है ताकि चीन से संबंधित दावों, सीमा की स्थिति और सरकारी योजनाओं के बारे में तथ्यपरक जानकारी स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध हो जिससे चीनी ब्रेनवाश को माकूल उत्तर मिल सके। बेशक भारतीय तैयारियां चीन को अरुणाचल की घेरेबंदी के मंसूबे तोड़ देंगी। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



