ध्वस्त हुआ नेतन्याहू के ‘अपराजित’ होने का मिथक
इज़राइल के 2026 के संसदीय आम चुनावों के नतीजों आने बाद देश में एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध की स्थिति बन गई है और किसी भी गुट को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। उल्लेखनीय है कि इज़राइल की 120 सदस्यों वाली ‘नेसेट’ अर्थात संसद में सरकार बनाने और पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है। परन्तु प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिकुड पार्टी व अन्य सहयोगी दक्षिणपंथी दलों के गठबंधन को कुल 53 सीटें मिली हैं। जबकि इसमें उनकी स्वयं की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिली हैं। 27 सीटें जीत कर लिकुड पार्टी संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो ज़रूर उभरी है परन्तु इसके बावजूद नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन बहुमत के आंकड़े (61 सीटों) तक नहीं पहुंच सका और बहुमत से 8 सीटें कम रह गया। बेंजामिन नेतन्याहू का कहना था कि उनका उद्देश्य एक मज़बूत दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सरकार बनाना है। इस चुनाव का एक और आकर्षण अरब नेतृत्व वाली पार्टियां का 19 सीटों पर जीत दर्ज करना भी है। अरब लोग इज़राइल की कुल जनसंख्या का लगभग 21 प्रतिशत हैं। इज़राइल के इतिहास में यह अरब पार्टियों का अब तक का ऐतिहासिक व सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है। जबकि गादी आइज़नकोट का मुख्य विपक्षी गठबंधन 48 सीटें जीत पाया है। माना जा रहा है कि किसी भी बड़े गठबंधन को बहुमत न मिलने के कारण अब इज़राइल में सरकार बनाने के गठबंधन की जोड़-तोड़ और बातचीत का लंबा दौर चल सकता है।
इज़राइल में हुआ यह चुनाव कितना महत्वपूर्ण था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें यहूदी और अरब दोनों ही मतदताओं की ओर से रिकॉर्ड संख्या में मतदान में हिस्सा लिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक मतदाताओं ने हज़ारों डॉलर खर्च कर विदेशों से आकर मतदान में हिस्सा लिया। नेतन्याहू की पार्टी व उनके नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन को पूर्ण बहुमत हासिल न होने के पीछे जो मुख्य कारण माने जा रहे हैं उनमें एक तो यह कि यह चुनाव एक ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हुये जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग चुके हैं। इसके अतिरिक्त नेतन्याहू पर 7 अक्तूबर से पहले इज़राइल की रक्षा करने में नाकाम रहने का भी आरोप है। विपक्षी नेताओं व समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा इसकी जांच की मांग भी होती रही है, लेकिन नेतन्याहू इस जांच के लिए कभी तैयार नहीं हुये। इसलिये इज़राइली समाज का एक बड़ा वर्ग 7 अक्तूबर की घटना को एक सुनियोजित व सत्ता प्रायोजित साज़िश के संदेह से भी इन्कार नहीं करता।
अब इज़राइल में नई सरकार बनाने को लेकर भी तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। इतने अलग-अलग विचारों और राजनीतिक हितों को एक सरकार के रूप में साथ लाना अब इज़राइल की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। सरकार बनाने के लिये क्या नेतन्याहू अपने धार्मिक सहयोगियों को छोड़कर विपक्षी गुट के दक्षिणपंथी नेताओं के साथ गठबंधन बनाने के लिए तैयार होंगे? क्या वे नेता, जो लंबे समय से नेतन्याहू के विरोधी रहे हैं, उनके साथ सरकार में शामिल होने के लिए तैयार होंगे? क्या विपक्षी गठबंधन अपने चुनावी वादों का बड़ा हिस्सा छोड़कर नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए अरब पार्टियों के साथ सहयोग करने को तैयार है और क्या अरब पार्टियां ऐसी सरकार में शामिल होने का जोखिम उठाएंगी, जो कुछ ही महीनों में गिर सकती हो?
इस बीच इज़राइल के वरिष्ठ वामपंथी डेमोक्रेट नेता यायर गोलान ने विपक्षी गुट से अरब पार्टियों के साथ साझेदारी करने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि ‘हमें अब नेतन्याहू द्वारा यहूदी और अरब वोटों के बीच किए जा रहे नस्लवादी विभाजन को स्वीकार नहीं करना चाहिए।’ चुनाव परिणामों और विश्लेषकों के रुख को देखें तो यह स्पष्ट है कि नेतन्याहू की कट्टर, ध्रुवीकरण करने वाली और अत्यधिक आक्रामक छवि ने उन्हें गंभीर राजनीतिक नुकसान पहुंचाया है। नेतन्याहू ने ईरान, गाज़ा और लेबनान में सैन्य सफलताओं को भुनाने की कोशिश भी की, लेकिन देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा लगातार जारी युद्ध की अनिश्चितता, बंधकों की घर वापसी में विफलता और देश के आर्थिक नुकसान से थक चुका था। इसी ने नेतन्याहू की ‘अजेय सुरक्षा प्रदाता’ वाली छवि को चोट पहुंचाई।
नेतन्याहू के मौजूदा गठबंधन में धुर-दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी वे यहूदी नेता भी शामिल थे, जिन्होंने वैस्ट बैंक में आक्रामक नीतियों को बढ़ावा दिया। इससे इज़रायल के उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और यूरोपीय मूल के यहूदी नागरिकों में यह डर बढ़ गया था कि यह कट्टरता इज़रायल के लोकतांत्रिक ढांचे को खत्म कर रही है। युद्ध के इस दौर में भी नेतन्याहू द्वारा कट्टरपंथी रूढ़ीवादी यहूदियों को सेना की अनिवार्य सेवा से छूट देना भी आम इज़राइलयों को रास नहीं आया, जो लंबे समय से मोर्चे पर लड़ रहे हैं। विपक्ष ने इसे भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। इज़राइल में बदलाव की चाहत रखने वाले और उनके कट्टर रवैये से असहमत लोगों ने उनके ‘अपराजित’ होने के मिथक को ध्वस्त कर दिया है।
-मो. 98962-19228



