लोकतंत्र में नागरिकों के मताधिकार की रक्षा ज़रूरी
किसी भी कालखंड में लोकतंत्र की मज़बूती केवल चुनाव कराने, सरकारें बनाने और सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है। उसकी वास्तविक ताकत इस बात में निहित है कि प्रत्येक पात्र नागरिक यानी आम आदमी को बिना किसी परेशानी यानी बाधा के अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिले। मतदान का अधिकार नागरिक को शासन व्यवस्था में भागीदारी का अवसर देता है और सरकारों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता जितनी आवश्यक है, उसमें प्रत्येक योग्य आम आदमी (नागरिक) का नाम शामिल होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर देश में चल रही बहस ने इस विषय को लोकतंत्र के केंद्र में ला दिया है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां मतदाता सूची तैयार करना तथा उसे अद्यतन रखना एक विशाल प्रशासनिक कार्य है। निर्वाचन आयोग के अनुसार फरवरी 2024 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में देशभर के लगभग 96.88 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। इनमें करीब 47.15 करोड़ महिला और 49.72 करोड़ पुरुष मतदाता शामिल थे। यह आंकड़ा बताता है कि भारत में चुनावी प्रक्रिया कितने बड़े स्तर पर संचालित होती है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 64.64 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया और कुल मतदान प्रतिशत 66.10 रहा। इतने विशाल लोकतंत्र में मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनाए रखना निर्वाचन व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं की प्रविष्टियों को ठीक करना, दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना और नए पात्र नागरिकों को सूची में शामिल करना है। इस प्रक्रिया से चुनावी व्यवस्था अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बन सकती है लेकिन किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने नाम हटाए गए बल्कि इससे भी कि कितने पात्र नागरिकों का अधिकार सुरक्षित रखा गया। सूची को त्रुटिरहित बनाने के प्रयास में यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम छूट जाता है, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व भी प्रभावित होता है।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान लगभग 95.40 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड की समीक्षा की गई। आयोग ने 13.39 करोड़ प्रविष्टियों को अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत अथवा दोहरी प्रविष्टियों जैसी श्रेणियों में रखा। आयोग के वर्गीकरण के अनुसार इनमें लगभग 6.30 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित, 3.01 करोड़ अनुपस्थित या पता नहीं चल पाने वाले, 2.80 करोड़ मृत और 1.02 करोड़ दोहरी प्रविष्टियों वाले मतदाता शामिल थे। इन आंकड़ों के बीच यह अंतर समझना ज़रूरी है कि संबंधित श्रेणियों में प्रविष्टियों की संख्या और अंतिम रूप से हटाए गए नामों की संख्या हमेशा एक ही बात नहीं होती। आयोग ने पात्र मतदाताओं को छूटे हुए नामों के लिए आवेदन करने का अवसर देने की भी बात कही है।
इसे यूँ समझिए कि यहीं इस पूरी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी सामने है। किसी मतदाता का पता बदल गया हो, वह काम के कारण दूसरे शहर में रहता हो या सत्यापन के समय अपने घर पर उपलब्ध न हो तो केवल इन परिस्थितियों के आधार पर उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए, अर्थात नाम नहीं काटा जाना चाहिए। इसी प्रकार, दस्तावेजों में अंतर या पारिवारिक विवरण में कोई गलती मिलने पर भी उचित सत्यापन और संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर अवश्य मिलना चाहिए। तकनीक और डिजिटल रिकॉर्ड प्रशासनिक कार्यों को आसान बना सकते हैं, लेकिन आप मानवीय परिस्थितियों को समझने और वास्तविक स्थिति की पुष्टि करने की आवश्यकता समाप्त नहीं कर सकते।
इतना ही नहीं, इस विषय पर राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों की चिंताओं को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए। अगर निर्वाचन आयोग का दायित्व मतदाता सूची को शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है तो प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
अक्तूबर 2026 में कर्नाटक की मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में प्रविष्टियों के सत्यापन और नाम हटाए जाने को लेकर बहस हुई। यह उदाहरण बताता है कि व्यापक स्तर पर होने वाली ऐसी प्रक्रिया में स्पष्ट नियम, पर्याप्त सूचना, शिकायतों के निपटारे और अपील की प्रभावी व्यवस्था कितनी आवश्यक है। किसी भी आरोप को बिना प्रमाण लें अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए लेकिन आमजन की आशंकाओं का तथ्यपूर्ण उत्तर देना भी संस्थागत जवाबदेही है। आखिरकार, मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता की नींव है और हर पात्र नागरिक का मताधिकार उस लोकतंत्र की आत्मा है जिसकी रक्षा करना हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है। (एजेंसी)



