प्राग को देखें फ्रांज ़काफ्का की नज़रों से
मुझे लगता था कि भारत में ही शहर पुराने व नये हिस्सों में विभाजित होते हैं, लेकिन चेक रिपब्लिक की राजधानी व सबसे बड़े शहर प्राग, जो बोहीमिया की ऐतिहासिक राजधानी भी है, में आकर मेरा नज़रिया बदल गया। मैं जब पुराने प्राग के चैराहे पर पहुंचा तो देखा कि वहां जो सड़कें आकर आपस में मिलती हैं, उन पर उदासी छाई हुई थी। देर दोपहर का आसमान असामान्य रूप से भारी व काला था। वल्तावा नदी के ऊपर से आती हवाओं में ठंडक थी और पत्थरों की प्राचीन बिल्डिंगों से टकराकर हवाएं अजीब भयावह ध्वनि उत्पन्न कर रही थीं। चैराहे के किनारों पर बनी इमारतें एक से एक बढ़कर थीं, लेकिन चैड़ी खुली जगहें भी उदासी को दूर करने के लिए पर्याप्त न थीं। फ्रांज़ काफ्का के शहर में वही विशेषण मुखर था, जो उनके नाम का पर्याय बन गया है।
20वीं शताब्दी के जर्मन बोलने वाले बोहीमियन उपन्यासकार का जन्म प्राग में हुआ था और इस शहर ने न केवल उनके लेखन को प्रभावित किया बल्कि उनकी विशेष शैली को भी विकसित किया, जिसमें एक साथ घबराहट, अतियथार्वाद और भयप्रद जटिलता है। काफ्का प्राग के सबसे चहेते बेटे हैं, इसलिए आप इस शहर में कहीं भी चले जायें आपकी काफ्का से भेंट हो ही जायेगी- मूर्तियां, फ्रिज मैग्नेट्स, पोस्टकार्ड्स, कॉफी मग्स, टी, तौलिये आदि। मैं सोचता हूं कि इस लचरपन पर स्वयं काफ्का की क्या प्रतिक्रिया होती? विसंगति अन्य स्तर पर भी हैं, क्योंकि काफ्का ने अपने लेखन में प्राग को कभी सीधे संबोधित नहीं किया, लेकिन आसपास की राजनीतिक उथल-पुथल, तानाशाही ब्यूरोक्रेसी और व्यक्ति पर उसके प्रभाव कभी उनकी कल्पना से न बच सके। इसलिए इस शहर को उनकी दृष्टि से देखना दिलचस्प होगा।
काफ्का ने अपने जीवनकाल में दो दर्जन से अधिक घर बदले, स्कूल बदले, कैफे व रेस्टोरेंट बदले। पुराने चैराहे को पार करते ही एक स्कूल है, जिसमें वह जाते थे और पास में ही अनेक मकान हैं, जिनमें वह कभी न कभी रहते थे। मुझे वह घर भी मिला, जिसमें काफ्का एल्बर्ट आइंस्टीन के साथ बैठकें किया करते थे, यह एक पूर्व सोशलाइट का घर है। चैराहे के पश्चिम में नदी की तरफ यहूदी क्वार्टर है जहां काफ्का का जन्म हुआ था। अब इसका कुछ नहीं बचा है, सिवाय दरवाज़े के और एक छोटी तख्ती के जिस पर लिखा है- ‘फ्रांज़ काफ्का का जन्म यहां हुआ था’। यहूदी म्यूजियम में छह मुख्य साइट्स हैं- क्लाउस सिनागोग, पुराना यहूदी कब्रिस्तान, पिंकास सिनागोग, सेरेमोनियल हॉल, मैसेल सिनागोग और स्पैनिश सिनागोग। म्यूजियम में कलाकृतियों की भरमार है।
हालांकि ओल्ड न्यू सिनागोग इसका हिस्सा नहीं है, लेकिन अपने गोथिक फसाड और नाटकीय बहिर्भाग के कारण इसने मुझे आकर्षित किया, यहीं पर काफ्का का बार मित्ज्व: आयोजित हुआ था। 70,000 वर्ग मीटर में फैला प्राग कैसल भी आकर्षित करता है, जिसमें गिरजाघर, हॉल, टावर्स, पैलेस व अन्य बिल्डिंग हैं विभिन्न आर्किटेक्चरल शैली में, रोमन, गोथिक आदि। सुबह की चमकदार रोशनी में भी, इसमें अजीब सैन्य गुण था, जो तहखानों में डिस्प्ले किये गये यातनाओं के उपकरणों से अधिक तीव्र हो गया था। शायद इसी ने काफ्का की अपूर्ण लेकिन मशहूर पुस्तक ‘द कैसल’ (1926) को प्रभावित किया था- एक ऐसी जगह जो रहस्मय, अशुभ व ग़ैर-दोस्ताना है, लेकिन काफ्का ने कभी इसका संदर्भ नहीं दिया।
बाहर स्थिति कम वीभत्स थी। कैसल की उत्तरी दीवार की ओर एक पतली गली की ढलान है। गली पतली ज़रूर है, लेकिन इसमें छोटे-छोटे रंगीन कॉटेज हैं, जो 16वीं शताब्दी में कैसल गार्ड के लिए बनाये गये थे। एक शताब्दी बाद इनमें सुनार रहने लगे, जिससे इस गली का नाम गोल्डन लेन पड़ गया। 19वीं व 20वीं शताब्दी के शुरुआत में इन घरों में आर्टिस्ट रहा करते थे। इनमें से मकान नंबर 22 में एक बहुत ही मशहूर कलाकार रहता था- काफ्का, जो यहां 1916-17 में अपनी बहन के साथ रहते थे। घर बहुत छोटा है और काफी तंग भी प्रतीत होता है। इसलिए यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि इस तंग जगह ने काफ्का के लेखन को प्रभावित किया होगा। शुरू में काफ्का को इस जगह से नफरत थी, लेकिन धीरे धीरे वह इससे प्रभावित होने लगे और उन्होंने अपनी मंगेतर को लिखा कि वह इस जगह को कैसे प्रेम करने लगे। वर्तमान में अधिकतर घरों को स्टोर्स में बदल दिया गया है, जो आर्ट, क्राफ्ट व सौवेनिर्स बेचते हैं।
गोल्डन लेन, नदी व प्राग की अन्य प्रसिद्ध जगहों तक जाती है, चार्ल्स ब्रिज जिसमें 16 मेहराब हैं, थ्री ब्रिज टावर्स और 30 मूर्तियां। लेकिन मेरी दिलचस्पी पुल के निकट वाली बिल्डिंग में अधिक थी, जिसमें काफ्का म्यूजियम है। इसमें जबरदस्त कलेक्शन है, जिसमें से अधिकतर डार्क है जो ज़ाहिर है काफ्का को ही व्यक्त करता है, लेकिन यहां की यात्रा करके लेखक को समझने का अधिक अवसर मिला। यहां फर्स्ट एडिशन बुक्स, मूल पांडुलिपियां, पत्र, फोटोग्राफ्स और बहुत कुछ हैं। लेकिन म्यूजियम का महत्व थ्री डी प्रदर्शनी व ऑडियो विजुअल चीज़ों से अधिक बढ़ गया। हालांकि म्यूजियम काफ्का के बारे में बहुत कुछ बताता है, लेकिन मुझे कुछ और की तलाश थी, कुछ अधिक असरदार की। लगभग हर सड़क पर, कोर्टयार्ड में व चैराहों पर या तो काफ्का की मूर्तियां हैं या उनके कार्य से संबंधित चीज़ें, जैसे चेक शिल्पकार डेविड सरनी की मेटामॉरफोसिस और पिस या जारोस्लाव रोना का काफ्का स्मारक- एक सिर रहित व्यक्ति दूसरे को अपने कंधे पर उठाये हुए है, यह वीभत्स है, लेकिन काफ्का को जीवित कर देता है।
मैं काफी थक चुका था, फिर भी पुराने शहर के नरोद्नी त्रिदा में कैफे लौव्रे की तरफ बढ़ा। सौ वर्ष से भी अधिक पुराने कैफे में मुरम्मत हुई है, लेकिन इसके पुराने वैभव को बरकरार रखा गया है। हवा में शांति थी और मैं लोगों की वार्ता सुनने का प्रयास कर रहा था। यहीं पर काफ्का आईंस्टीन व ऐसी ही अन्य शख्सियतों के साथ हैंग करते थे, कॉफी सिप करते थे और साहित्य व अन्य विषयों पर चर्चा करते थे। उसी जगह पर बैठकर कॉफी सिप करते हुए मुझे लगा कि काफ्का मुझसे मुखातिब हैं। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



