कहानी-गौरी गैया

छोटा-सा गांव, पक्की सड़कें, पक्के मकान। रमेश का घर गांव के बीचों-बीच था। रमेश शहर में एक छोटी-सी नौकरी करता था। परिवार में बस रमेश की मां, पत्नी और तीन बेटियां थीं, जो इसी गांव में दो कमरों के मकान में रहते थे। द्वार पर एक गाय बंधी हुई थी।
‘गौरी, ओ गौरी! गैया को जूठन डाल दे, दूध दुहने का समय हो गया है।’ गौरी की सास खाट पर बैठी माला जप रही थी।
गौरी और रमेश की तीन बेटियां थीं। पहली 6 साल की, दूसरी 4 साल की और तीसरी...साल की। गौरी चौथी बार गर्भवती थी। नौवां महीना चल रहा था। इस बार सभी को विश्वास था कि कुल का दीपक ही आएगा।
गौरी अभी गाय को जूठन डाल ही रही थी कि मोबाइल की घंटी टनटनाने लगी। रमेश का फोन था। गौरी की सास ने फोन उठाया। जल्दी-जल्दी गाय को सानी-पानी देकर गौरी अंदर चली गई ताकि रमेश से बात कर सके, पर सास की बातें सुनकर उसके पैर वहीं ठिठक गए।
गौरी की सास कह रही थी, ‘गांव की दाई को गौरी का पेट दिखाया है, इस बार भी बेटी ही है।’
बेटियों के जन्म के समय की प्रसव-पीड़ा याद आते ही गौरी सहम गई और दीवार के सहारे वहीं बैठ गई। दूसरी और तीसरी बेटी के जन्म के बाद पति और सास के बदले व्यवहार की स्मृति मात्र से उसके रोंगटे खड़े हो जाते थे। गांव वालों के ताने, सास का उग्र रूप और पति की उपेक्षा सहने का साहस अब उसमें नहीं बचा था।
‘अब तो राम ही पार लगाएंगे...’
तभी फोन पर रमेश की तेज आवाज सुनकर गौरी वर्तमान में लौट आई।
‘तीसरा महीना चढ़ते ही मैंने अल्ट्रासाउंड करवाने को कहा था!’ रमेश के चीखने की आवाज साफ-साफ सुनाई दे रही थी। ‘पर तू ही नहीं मानी। कहने लगी, जीव हत्या पाप है...तो अब भुगतो।’
फोन के उस पार कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर दोनों धीमी आवाज में कुछ जोड़-घटाव करने लगे। मां और बेटे को समझ नहीं आ रहा था कि चौथी मुसीबत से कैसे बचा जाए।
गौरी धीरे से उठकर गैया के पास आकर बैठ गई। इस घर में वही तो उसकी एकमात्र सखी थी। ‘फूटी किस्मत मेरी, फिर से लड़की होगी। शायद सच ही कहती हैं मांजी.. मेरा भाग्य ही फूटा है।’ 
गैया जुगाली करना छोड़ अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से गौरी को देखने लगी, जैसे उसकी सारी बातें उसे समझ में आ रही हों। गौरी ने गैया की आंखों में देखा और उसके सिर को सहलाने लगी, ‘हम दोनों का भाग्य एक जैसा ही है।’
गैया भी गर्भवती थी। इसके पहले भी उसके चार बछड़े हुए थे। गैया के बछड़े कसाई को बेच दिए जाते थे और गौरी हर बार बेटे की उम्मीद में फिर गर्भ से भर दी जाती थी। 
दूसरी सुबह गौरी बहुत खुश थी। गैया के नाद में पानी डालते हुए गौरी ने कहा, ‘मां का फोन आया था...उन्होंने कहा कि गैया की खूब सेवा करना, उसके आशीर्वाद से तुझे बेटा ही होगा।’
गैया ने भी रंभाते हुए गौरी की तरफ देखा और फिर नाद में मुंह डाल दिया। गौरी ने गैया के माथे पर हाथ फेरा, जैसे किसी देवी का आशीर्वाद ले रही हो।
गौरी की डिलीवरी का दिन निकट आ गया था, इसलिए रमेश भी छुट्टी लेकर गांव आ गया। रातभर गौरी दर्द से बेचैन थी। सुबह होते ही रमेश उसे लेकर अस्पताल जाने लगा।
‘अरे-अरे, ठहरो! गैया का आशीर्वाद लेने दो...मांजी, इसका ख्याल रखिएगा। कल रातभर ये भी रंभाती रही... इसका भी समय हो गया है।’
गौरी को बेटा हुआ। रमेश ने पूरे अस्पताल में मिठाई बांटी। गौरी की मां और बहन भी आ गई थीं, बस गौरी की सास नहीं आ पाई थी।
होश में आते ही गौरी ने अपनी मां से कहा, ‘मां, यह सब गैया का ही आशीर्वाद है...देखना, उसे इस बार बछिया ही होगी।’
एक दिन और एक रात अस्पताल में रहने के बाद गौरी वापस घर लौट आई। आते ही उसका ध्यान नाद की तरफ गया। वहां उसे न बछिया दिखी और न ही गैया। नाद खाली पड़ा था। बंधी रस्सी हवा में धीरे-धीरे झूल रही थी। रमेश से पूछने पर उसने उसे डांटते हुए घर के अंदर चलने को कहा।
मां को आया देखकर सभी बच्चियां दौड़कर उससे लिपट गईं। छोटी बेटी मां से लिपटते हुए बोली, ‘मम्मी-मम्मी, तुम्हारी गैया तो मर गई।’ 
(सुमन सागर)

#कहानी-गौरी गैया