मां की ममता का अनूठा लोकपर्व है अहोई अष्टमी

भारत के लोकपर्वों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहते बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही भावनाओं, पारिवारिक रिश्तों और सामूहिक स्मृतियों को भी अपने भीतर समेटे रहते हैं। अहोई अष्टमी ऐसा ही एक पर्व है, जिसमें मां की ममता, संतान के प्रति उसकी मंगलकामना, लोककथाओं की विरासत और सनातन आस्था का अद्भुत संगम दिखाई देता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला यह त्योहार विशेष रूप से उन माताओं के लिए महत्त्वपूर्ण है, जो अपनी संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। दीपावली से कुछ दिन पहले आने वाला यह पर्व भारतीय परिवारों में उत्सव की एक अलग ही भावभूमि तैयार करता है। जहां दीपावली घर-आंगन को रोशन करने का उत्सव है, वहीं अहोई अष्टमी मां के हृदय में संतान के भविष्य के लिए जलने वाले विश्वास के दीप का प्रतीक बन जाती है।
आस्था के केन्द्र में संतान का मंगल
अहोई अष्टमी का धार्मिक महत्त्व मुख्य रूप से संतान की रक्षा और उसके कल्याण की कामना से जुड़ा है। परंपरागत रूप से माताएं इस दिन सूर्योदय से लेकर संध्याकाल अथवा तारों के दर्शन तक व्रत रखती हैं। हालांकि व्रत की अवधि और पूजा की कुछ विधियां अलग-अलग क्षेत्रों तथा पारिवारिक परंपराओं के अनुसार बदल सकती हैं। मान्यता है कि अहोई माता की पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन अहोई माता की आकृति दीवार पर बनाई जाती है या उनका चित्र स्थापित किया जाता है। कई परंपराओं में अहोई माता के साथ उनके बच्चों के प्रतीक भी अंकित किए जाते हैं। पूजा के दौरान रोली, अक्षत, पुष्प, जल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। माताएं अहोई अष्टमी की कथा सुनती हैं और संतान की मंगल कामना करती हैं। संध्या के समय तारों को अर्घ्य देने की परम्परा भी प्रचलित है। कुछ परिवारों में चंद्रमा के दर्शन अथवा अन्य स्थानीय विधियों का भी महत्त्व है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अहोई अष्टमी की पूजा में किसी एक विधि की तुलना में श्रद्धा, संकल्प और पारिवारिक परम्परा की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण रही है।
पशु-प्रेम और प्रायश्चित का संदेश
अहोई अष्टमी की लोकप्रिय लोककथा इस पर्व को एक भावनात्मक गहराई प्रदान करती है। कथा के प्रचलित रूपों में एक साहूकार की पत्नी अथवा एक महिला दीपावली से पहले घर की मरम्मत या मिट्टी लाने के लिए जंगल जाती है। वहां अनजाने में उससे स्याही नामक वन्य जीव और उसके बच्चों को नुकसान पहुंच जाता है। इसके बाद उसके जीवन में संतान संबंधी संकट उत्पन्न होने की कथा सुनाई जाती है। पश्चाताप से व्याकुल महिला अहोई माता की आराधना करती है और क्षमा तथा संतान के कल्याण की प्रार्थना करती है। कथा के अलग-अलग रूपों में घटनाओं और पात्रों का विवरण भिन्न मिलता है, लेकिन उनका मूल भाव एक ही है-अनजाने में हुई भूल का पश्चाताप, करुणा की महत्ता और संतान के प्रति अटूट ममत्व। इस कथा का एक उल्लेखनीय पक्ष प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता भी है। लोककथा धार्मिक आस्था के माध्यम से यह संदेश देती है कि मनुष्य का जीवन दूसरे जीवों से अलग नहीं है। हालांकि कथा को आधुनिक वन्यजीव विज्ञान का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन उसकी नैतिक व्याख्या आज भी प्रासंगिक है।
दीवार पर विश्वास की दुनिया
अहोई अष्टमी का सांस्कृतिक पक्ष इसकी पारंपरिक चित्रकला और घरेलू अनुष्ठानों में दिखाई देता है। पहले गांवों और कस्बों में महिलाएं घर की दीवार पर गेरू या दूसरे प्राकृतिक रंगों से अहोई माता का चित्र बनाती थीं। चित्र के साथ स्याही और उसके बच्चों की आकृतियां भी बनाई जाती थीं। अब अनेक घरों में छपे हुए चित्र और कैलेंडर इस परम्परा का स्थान ले चुके हैं, लेकिन पूजा का भाव लगभग वही है। चित्र बनाना केवल सजावट का काम नहीं था। यह घर की महिलाओं के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी था। बच्चे अपनी मां और दादी-नानी को पूजा की तैयारी करते देखते, कथा सुनते और धीरे-धीरे परिवार की परंपराओं से परिचित होते थे। इस तरह अहोई अष्टमी धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ मौखिक इतिहास और घरेलू लोककला की परम्परा को भी जीवित रखती है।
लोकविश्वास और तारों से जुड़ाव
अहोई अष्टमी के दिन तारों के दर्शन का विशेष महत्त्व माना जाता है। कई परिवारों में महिलाएं आकाश में तारे दिखाई देने पर जल अर्पित करती हैं और फिर व्रत खोलती हैं। आकाश की ओर देखते हुए संतान के मंगल की प्रार्थना करना इस पर्व को प्रकृति के साथ एक प्रतीकात्मक संबंध प्रदान करता है। लोकविश्वासों में आकाश, ग्रह-नक्षत्र और पारिवारिक जीवन के बीच संबंध स्थापित करने की परम्परा पुरानी रही है। हालांकि संतान की आयु या स्वास्थ्य पर किसी विशेष अनुष्ठान के प्रत्यक्ष प्रभाव का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, फिर भी ऐसे अनुष्ठान परिवारों को भावनात्मक संबल और सामूहिक विश्वास प्रदान कर सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में अहोई अष्टमी को संतान प्राप्ति की कामना से भी जोड़ा जाता है। विशेष रूप से संतान की इच्छा रखने वाले दंपती इस दिन पूजा-अर्चना करते हैं। मथुरा के निकट राधाकुंड में अहोई अष्टमी के अवसर पर स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों की विशेष परंपरा है। यहां श्रद्धालु संतान-सुख की कामना से पहुंचते हैं। यह परम्परा बताती है कि लोकपर्व किस तरह स्थानीय तीर्थों, धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक जीवन को एक सूत्र में पिरोते हैं।
बदलते समय में पर्व 
आज परिवारों का स्वरूप बदल रहा है। महिलाएं घर और कामकाज की दोहरी जिम्मेदारियां निभा रही हैं, जबकि स्वास्थ्य, शिक्षा और बच्चों के भविष्य को लेकर चिंताएं भी नए रूप ले रही हैं। ऐसे समय में अहोई अष्टमी का अर्थ केवल व्रत रखने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इस पर्व की आत्मा संतान के प्रति प्रेम, सुरक्षा और जिम्मेदारी में निहित है। यदि इस अवसर पर माता-पिता बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, भावनात्मक ज़रूरतों और सुरक्षित वातावरण पर ध्यान देने का संकल्प लें, तो धार्मिक आस्था जीवन के व्यावहारिक पक्ष से भी जुड़ सकती है। इसी तरह परिवार में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव से ऊपर उठकर सभी बच्चों के समान कल्याण की कामना करना पर्व के मूल भाव को और व्यापक बनाता है। यह भी ज़रूरी है कि व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी सेहत का ध्यान रखें। गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं अथवा किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को निर्जला या लंबे उपवास के संबंध में चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए। श्रद्धा का उद्देश्य जीवन को संबल देना है, उसे संकट में डालना नहीं।
ममता का उत्सव
अहोई अष्टमी भारतीय लोकजीवन की उस संवेदनशील परंपरा का प्रतीक है, जिसमें धर्म भावनाओं से जुड़ता है, कथा नैतिक शिक्षा देती है और अनुष्ठान पारिवारिक रिश्तों को मजबूत बनाते हैं। इसके केन्द्र में एक मां की वह सहज आकांक्षा है, जो अपनी सन्तान को स्वस्थ, सुरक्षित और प्रसन्न देखना चाहती है। समय के साथ पूजा की सामग्री बदल सकती है, घरों की दीवारों पर बने चित्रों की जगह कैलेंडर ले सकते हैं और परिवारों की जीवनशैली भी बदल सकती है, लेकिन मां की मंगलकामना का भाव नहीं बदलता। यही कारण है कि अहोई अष्टमी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि ममता, करुणा, लोकविश्वास और सांस्कृतिक निरंतरता का उत्सव है—एक ऐसा उत्सव, जिसमें तारों से भरे आकाश के नीचे एक मां अपनी सन्तान के उज्ज्वल भविष्य का सपना संजोती है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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