खौफनाक हो रहे चक्रवात : क्या बदल रहा है समुद्र का मिज़ाज ?

समुद्र की लहरें सदियों से तटों से टकराती रही हैं, लेकिन जब यही लहरें चक्रवात की ताकतवर हवाओं, मूसलाधार बारिश और विनाशकारी बाढ़ के साथ धरती पर उतरती हैं, तो सवाल केवल मौसम का नहीं रह जाता। यह सवाल बन जाता है कि बदलती जलवायु के बीच मानव बस्तियां, खेती, शहर और अर्थव्यवस्था कितने सुरक्षित हैं।
गत 28 अक्टूबर, 2026 को आंध्र प्रदेश और पुड्डुचेरी के यानम तट के निकट पहुंचा चक्रवाती तूफान अर्नब ने भारी तबाही मचाई। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक तट पार करते समय इस चक्रवाती तूफान की हवा की गति 115 से 135 किलोमीटर प्रतिघंटा रही जबकि हवा के कुछ झकझोर देने वाले झोंके 150 किलोमीटर प्रतिघंटा से भी तेज़ थे। तट से टकराने के बाद हालांकि खौफनाक साइक्लोन ‘अर्नब’ कमजोर जरूर हुआ, लेकिन भारी बारिश, जलभराव, बिजली व्यवस्था को तहस-नहस करने और बड़े स्तर पर फसलों की तबाही के बाद उसका तांडव थमा। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक इस खौफनाक साइक्लोन में जानमाल के भारी नुकसान बड़े पैमाने पर कृषि फसलें बर्बाद हुईं। यह सब उस खतरे की याद दिलाता है, जो तूफान के कमज़ोर पड़ने के बाद भी समाप्त नहीं होता।
गर्म होता समुद्र
चक्रवात समुद्र के ऊपर पैदा होने वाली ऐसी मौसमी प्रणालियां हैं, जिन्हें ऊर्जा देने में गर्म समुद्री जल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समुद्र से वाष्पीकरण के ज़रिए वातावरण में पहुंचने वाली नमी, बादलों के भीतर संघनन से निकलने वाली ऊर्जा और अनुकूल वायुमंडलीय परिस्थितियां मिलकर ऐसे तूफान को बेहद खौफनाक बना देती हैं। वास्तव में यह सामान्य स्थिति नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का नतीजा है। जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ गया है, जिसके असर से समुद्र भी गर्म हो रहे हैं। गर्म वातावरण अधिक नमी धारण कर सकता है, जिससे अनुकूल परिस्थितियों में अत्यधिक वर्षा की आशंका बन जाती है। जलवायु विज्ञान के आकलन बताते हैं कि मानवजनित ताप वृद्धि के कारण दुनिया के कई क्षेत्रों में अत्यंत तीव्र ऊष्णकटिबंधीय चक्रवातों और उनकी वर्षा की तीव्रता का जोखिम बढ़ सकता है। 
हालांकि वैज्ञानिक सावधानी ज़रूरी है, क्योंकि हर चक्रवात केवल जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा नहीं होता। किसी तूफान का जन्म, उसका मार्ग और उसकी तीव्रता समुद्र के तापमान के साथ-साथ वायुमंडलीय दबाव, हवाओं की ऊंचाई के साथ बदलती दिशा और गति तथा अनेक दूसरे कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए अर्नब को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने के बजाय उसे बदलते जलवायु जोखिमों के व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। 
बंगाल की खाड़ी में बढ़ता खतरा
भारत का पूर्वी समुद्री तट चक्रवातों के प्रति लंबे समय से संवेदनशील रहा है। बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक बनावट, समुद्री परिस्थितियां और तटीय आबादी का घनत्व यहां जोखिम को और बढ़ाते हैं। दूसरी ओर, अरब सागर में भी चक्रवातों के व्यवहार को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ी है। एक अध्ययन के मुताबिक साल 1982 से 2000 के बीच और  फिर 2001 से 2019 की अवधि की तुलना करें तो अरब सागर में चक्रवातों की संख्या में 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और बंगाल की खाड़ी में आठ प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। अर्नब का महत्व इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में है। भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में करोड़ों लोगों की आजीविका खेती, मछली पकड़ने, बंदरगाहों, पर्यटन, परिवहन और छोटे कारोबारों पर निर्भर है। ऐसे में चक्रवात का प्रभाव किसी एक जिले तक सीमित नहीं रहता। बिजली आपूर्ति बाधित होने से उद्योग-धंधे प्रभावित होते हैं, रेल और सड़क यातायात रुकने से वस्तुओं की आवाजाही ठहरती है और खेतों में खड़ी फसल के नष्ट होने से सबसे ज्यादा किसानों के साथ पूरी कृषि अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। 
तबाही के दायरे में घर भी
चक्रवात अर्नब के बाद आंध्र प्रदेश में सिर्फ  बड़े पैमाने पर कृषि और बागवानी फसलें ही नहीं नष्ट हुईं, बल्कि हज़ारों की संख्या में घर भी तबाह हुए हैं। बिल्कुल शुरुआती आंकलन में ही लगभग 2.25 लाख की कृषि एवं बागवानी नष्ट होने की बात कही गई है। धान की खड़ी फसल, नारियल और केले के बागान इस नुकसान का सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि और कुछ नुकसान नहीं हुआ। प्रारंभिक अनुमानों के मुताबिक कई हज़ार घर भी आंशिक रूप से या बड़े पैमाने पर इस खौफनाक चक्रवाती तूफान का शिकार हुए हैं। 
मछुआरों के लिए इस तूफान का अर्थ कई दिनों तक समुद्र में न जा पाना, उनकी नौकाओं और जालों में हुआ कई तरह कर नुकसान तथा नियमित बाज़ार के अस्त-व्यस्त हो जाने में भी देखा जा सकता है। गरीब परिवारों के ज्यादातर कच्चे मकानों का कुछ हिस्सा या पूरी तरह से मकान ध्वस्त हो गये हैं। ऐसे में इनके पुनर्वास का भी संकट खड़ा हो गया है। इसलिए खतरनाक चक्रवात के बाद शासन-प्रशासन की तरफ से राहत राशि बांट देने से कुछ नहीं होता। 
आगे की तैयारी
इसमें कोई शक नहीं है कि भारत ने चक्रवातों की निगरानी और पूर्वानुमान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। उपग्रह, डॉप्लर मौसम रडार, संख्यात्मक मौसम मॉडल और मोबाइल अलर्ट अब संभावित खतरे की जानकारी पहले पहुंचाने में मदद करते हैं। ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में निकासी तथा राहत व्यवस्थाओं का अनुभव भी बढ़ा है। लेकिन पूर्वानुमान तभी जीवन बचाता है, जब चेतावनी लोगों तक समय पर पहुंचे और वे उस पर कार्रवाई कर सकें यानी कार्रवाई कर सकने की स्थिति और संसाधन मौजूद हों। मछुआरों को समुद्र में जाने से रोकना, संवेदनशील बस्तियों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना, अस्पतालों के लिए बिजली का वैकल्पिक इंतजाम करना और बिजली के टूटे तारों से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकना आपदा प्रबंधन की अनिवार्य कड़ियां हैं। इसके साथ ही तटीय शहरों की जलनिकासी, निर्माण संबंधी नियमों और प्राकृतिक सुरक्षा कवचों पर भी विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। मैंग्रोव वन, तटीय आर्द्रभूमियां और बालू के प्राकृतिक टीले कई स्थानों पर लहरों तथा कटाव के प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं। इनकी रक्षा विकास विरोधी कदम नहीं बल्कि भविष्य के नुकसान को कम करने की रणनीति है।
क्या हो विकास का पैमाना?
तटीय भारत में बंदरगाहों, औद्योगिक क्षेत्रों, शहरी बुनियादी ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था का तेज़ी से विस्तार हो रहा है। ऐसे में नई परियोजनाओं की सफलता केवल निवेश और निर्माण की गति से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि वे अत्यधिक वर्षा, बाढ़, तेज़ हवाओं और बिजली आपूर्ति बाधित होने जैसी परिस्थितियों का कितना सामना कर सकती हैं। जलवायु जोखिम का आकलन परियोजना शुरू होने से पहले होना चाहिए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर  

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