आज भी प्रासंगिक है सरदार पटेल का दृष्टिकोण

राष्ट्रीय एकता दिवस पर विशेष

सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्मदिन 31 अक्तूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाने की शुरुआत भाजपा सरकार द्वारा 2014 में की गई थी। प्रश्न है कि क्या इसकी सार्थकता सिद्ध हुई या केवल उनके नाम को भुनाने का प्रयास था। जैसा बिखराव समाज में देखने को मिलता है, यह एक रस्म अदायगी जैसा लगता है। 
लौहपुरुष बनना मुश्किल है 
सरदार पटेल कोई साधारण नेता नहीं थे, बल्कि सत्य तो यह है कि उनकी तरह की सूझबूझ, कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की क्षमता और उसके परिणाम की ज़िम्मेदारी उठाना आसान नहीं। केवल इच्छाशक्ति का होना पर्याप्त नहीं, सोच व्यावहारिक हो, संगठन बनाने और संभालने की शक्ति हो और देशहित को सामने रखकर किया गया काम हो। यह तो हर कोई जानता है कि आज़ादी के बाद देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में एक थी सैकड़ों रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करना। विभाजन की पीड़ा और अनिश्चित भविष्य के बीच पटेल ने बातचीत, कूटनीति और दृढ़ निर्णयों के सहारे राष्ट्रीय एकीकरण में निर्णायक भूमिका निभाई। इस काम में वी. पी. मेनन, अधिकारियों और अन्य नेताओं का योगदान महत्वपूर्ण था लेकिन सरदार पटेल की सूझबूझ और निर्णय क्षमता प्रमुख आधार बनी। उनके समकक्ष यदि किसी कांग्रेसी नेता को रखा जा सकता है तो वे केवल इंदिरा गांधी थीं जो दो टूक फैसले लेकर विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बना सकती थीं। उनकी हत्या के बाद देश ने एक गंभीर त्रासदी देखी। दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में सिख समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर हिंसा की गई। हज़ारों लोगों की जान गई, परिवार उजड़े और घर-व्यापार तबाह हुए। इसका अर्थ यह नहीं कि देश की एकजुटता खंडित हुई, क्योंकि अन्य धर्मों के लोगों ने निर्दोष सिखों की रक्षा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
जो भी हो, दोनों ऐतिहासिक घटनाओं को याद करना राष्ट्रीय एकता के अर्थ पर गंभीरता से सोचने का अवसर है। पटेल का जीवन बताता है कि विविधताओं से भरे देश को जोड़ने के लिए दूरदृष्टि और दृढ़ नेतृत्व चाहिए। 1984 की हिंसा याद दिलाती है कि राजनीतिक हिंसा और सामूहिक प्रतिशोध निर्दोष नागरिकों की ज़िंदगी, सुरक्षा और देश के सामाजिक विश्वास को कितनी गहरी चोट पहुंचा सकते हैं। किसी व्यक्ति की हत्या के लिए पूरे समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराना न्याय नहीं है। अपराध का उत्तरदायित्व अपराध करने वालों पर तय होना चाहिए जैसा कि कानून के अनुसार हुआ, न कि उनकी धार्मिक या सामाजिक पहचान वाले निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जाए। अफसोस की बात यह है आज भी अदालतों में बहुत से मामले लंबित हैं। पीड़ितों को न्यायए दोषियों की जवाबदेही और प्रभावित परिवारों का पुनर्वास—ये सभी राष्ट्रीय एकता के ही प्रश्न हैं।
‘सरदार’ की उपाधि 
लोगों का विश्वास जीतना, उन्हें संगठित करना और अनुशासन के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ना उनकी प्राथमिकता थी। बारदौलो के किसान आंदोलन के बाद उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि मिली। यह जन भावनाओं का सम्मान और जनता का विश्वास था। आज भी सामान्य व्यक्ति अपने नेता में यही गुण देखता है और जो इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता वह कभी सिर आंखों पर नहीं बिठाया जाता चाहे वह किसी भी तरह लोकप्रिय होने का दावा करता हो। 
उनकी कार्यशैली की महत्वपूर्ण सीख है—दृढ़ता और ज़िद में अंतर। दृढ़ नेता लक्ष्य को लेकर स्पष्ट रहता है और परिस्थितियों के अनुसार रास्ता चुनता है। जिद्दी नेता अक्सर अपने तरीके को ही सही मानता है। पटेल की विशेषता यह थी कि वे समस्या को समझकर व्यावहारिक समाधान खोजते थे और ज़रूरत पड़ने पर कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटते थे। आज ज़िद को बिना किसी तर्कसम्मत आधार और विश्वसनीयता के अपने लक्ष्य की प्राप्ति का रास्ता मान लिया जाता है जो कभी सफलता का मानदंड नहीं बनता।  उदाहरण के लिए पटेल और नेहरू के बीच मतभेद थे। लेकिन वे कभी एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं थे। दोनों ने स्वतंत्र भारत के निर्माण में अपनी-अपनी भूमिका निभाई। 
केवल औपचारिकता नहीं
राष्ट्रीय एकता दिवस पर शपथ लेना या दौड़ आयोजित करना पर्याप्त नहीं है। होना यह चाहिए कि सरकारी या गैर राजनीतिक संगठन संकल्प लें कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, कानून सब पर समान रूप से लागू हो और राजनीतिक या सामाजिक तनाव के समय नेतृत्व हिंसा रोकने तथा शांति बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदारी से काम करे। एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी लोग एक जैसा सोचें। एकता का अर्थ है कि मतभेदों के बावजूद हम एक-दूसरे के अधिकारों और सुरक्षा का सम्मान करें। 
लोकतंत्र में विरोध हो सकता है, लेकिन हिंसा और सामूहिक दंड को स्वीकार नहीं किया जा सकता। आज के नेताओं के सामने भी पटेल के जीवन से जुड़े कुछ बुनियादी प्रश्न हैं। क्या वे कठिन फैसले लेने से पहले पर्याप्त जानकारी जुटाते हैं? क्या वे विरोधी विचार सुनने का धैर्य रखते हैं? क्या वे राष्ट्रीय हित को तत्काल राजनीतिक लाभ से ऊपर रखते हैं? क्या वे संस्थाओं को मजबूत करते हैं और अपने फैसलों के परिणामों की ज़िम्मेदारी लेते हैं? मज़बूत व्यक्तित्व वह नहीं जो कभी अपनी राय न बदले, बल्कि वह है जो तथ्यों को समझे, विवेक से निर्णय ले और अपने निर्णय के परिणामों का सामना करे।
सरदार पटेल को सच्ची श्रद्धांजलि केवल उनकी जयंती मनाने, प्रतिमाएं बनाने या भाषणों में उनका नाम लेने से नहीं होगी। राष्ट्रीय एकता दिवस तभी सार्थक होगा, जब उसकी भावना हमारे राजनीतिक व्यवहार, सामाजिक संबंधों और नागरिक कर्त्तव्यों में दिखाई दे। एकता दिवस मनाना आसान है, मतभेदों के बीच विश्वास बनाए रखना कठिन। इन दोनों कठिन ज़िम्मेदारियों को निभाना ही सरदार पटेल की विरासत का वास्तविक सम्मान है।

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