एथेनॉल संबंधी आशंकाएं

देश के वाहनों के लिए पैट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाए जाने संबंधी अक्सर विवाद सामने आते रहते हैं, परन्तु केन्द्र सरकार द्वारा इस संबंध में स्पष्ट लिए गए फैसले से यह विवाद कम ज़रूर हुआ है। मुख्य रूप से इस संबंध में यह आशंका प्रकट की जाती रही है कि इससे कारों और अन्य वाहनों में कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं, परन्तु इस प्रचार को भी सरकार ने अक्सर गलत बताया है। इस संबंध में परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने विस्तारपूर्वक बातचीत में इसके इस्तेमाल के विभिन्न पहलुओं की ओर भी ध्यान दिलाया है। उन्होंने इस बात को झुठलाया है कि एथेनॉल से गाड़ियों का नुकसान होता है। उन्होंने कहा पिछले 22 वर्ष से पैट्रोल में एथेनॉल मिलाया जा रहा है, अब तक किसी तरह की कोई समस्या सामने नहीं आई। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी तेल लागू करने से पहले कम से कम 4-4 वर्ष तक इस संबंध में परीक्षण किया जाता है। भारत में तो इसका इस्तेमाल कम मात्रा में किया जाता है, परन्तु अमरीका, ब्राज़ील, कनाडा, जर्मनी और अन्य कई देश विभिन्न अनुपात से एथेनॉल से मिश्रित तेल का इस्तेमाल कर रहे हैं।
इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से यह जवाब मांगा है कि केन्द्र सरकार की ओर से मोटर व्हीकलज़ एक्ट 1889 में जो संशोधन किया गया है, उसके अनुसार 100 प्रतिशत एथेनॉल वाले वाहनों की जो स्वीकृति दी जा रही है, उस संबंध में सभी देशों में इसके वितरण को कैसे सुनिश्चित बनाया जाएगा। इस संबंध में पैट्रोलियम मंत्रालय ने यह कहा है कि फिलहाल पैट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण 20 प्रतिशत से बढ़ाने की योजना नहीं है। इससे यह अभिप्राय है कि निकट भविष्य में इसके इस्तेमाल को क्रियात्मक रूप दिया जा सकता है। जहां तक ऊर्जा की प्राप्ति का संबंध है, उस संबंध में प्रत्येक वर्ष केन्द्र सरकार पैट्रोल के आयात पर अरबों डॉलर खर्च करती है। इस क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कीमतें स्थिर नहीं रहती। विशेष रूप से युद्ध, प्राकृतिक आपदा या अन्य आपात्काल के आने से कच्चे तेल के आयात पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, जिससे ऊर्जा क्षेत्र मुश्किल में फंस जाता है। एथेनॉल के साथ-साथ ई-वाहनों और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल को प्रत्येक परिस्थिति में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। एथेनॉल के इस्तेमाल से भी कहीं अधिक अब ई-वाहनों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी जाने लगी है। इसके साथ ही सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए व्यापक स्तर पर जो सोलर प्रबन्ध किए जा रहे हैं, उनके इस्तेमाल को भी अधिक से अधिक उत्साहित किए जाने की ज़रूरत है। यह नए ऊर्जा प्रबंध पैदा होती ग्रीन गैसों को भी कम करने में सहायक होते हैं और प्रदूषण को भी बड़ी सीमा तक रोकते हैं।
आज यह अनुमान लगाया जा रहा है कि छोटे-बड़े शहरों में लगभग 40 प्रतिशत प्रदूषण वाहनों के इस्तेमाल से पैदा होता है। एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाने से कृषि  क्षेत्र को भी बड़ा उत्साह मिलने की सम्भावना बनी दिखाई देती है, क्योंकि यह गन्ना, मक्की, चावल और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। यदि ऐसा प्रचलन बढ़ता है तो इससे देश की आर्थिकता विदेशों से मंगवाए जाने वाले तेल का आयात कम होने से मज़बूत होगी। चाहे इन नए ऊर्जा स्रोतों के उत्पादन की गति बहुत धीमी है परन्तु भविष्य के लिए यह देश के विकास के साक्षी ज़रूर बन सकते हैं।
नि:संदेह इन ऊर्जा स्रोतों के उत्पादन को अधिक से अधिक बढ़ाने और इनका अधिक से अधिक इस्तेमाल करने पर बल दिया जाना ज़रूरी है। इसके साथ ही इस समूचे प्रचलन को पारदर्शी बनाया जाना भी ज़रूरी है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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