चुनाव आयोग कटघरे में

नि:संदेह भारत एक बेहद जटिल देश है। इसे मतदान द्वारा स्थापित लोकतंत्र का विश्व का सबसे बड़ा देश माना जाता है, परन्तु इस बात पर विगत लम्बी अवधि से बड़े किन्तु-परन्तु होते रहे हैं, कि इसके साथ लगते अन्य देशों की सीमाओं से अक्सर भारी संख्या में लोग यहां दाखिल हो जाते हैं। पश्चिम बंगाल और असम में दशकों से यह दाखिला एक जटिल समस्या बना रहा है। नेपाल की सीमा पर भी ज्यादा पहरेदारी न होने के कारण लोग यहां से दाखिल हो जाते हैं। इसके साथ ही देश में लोगों का अन्य स्थानों से आना-जाना भी आम रहता है। लोग किसी भी स्थान पर रोज़ी-रोटी कमाने या व्यापार करने के लिए जाने के लिए स्वतंत्र हैं। इस कारण भी दोहरी वोटें बनने की बड़ी आशंका बनी रहती है।
समय-समय पर मतदाता सर्वेक्षण न होने के कारण स्थायी रूप से देश बदलने वाले या मर चुके मतदाताओं की पहचान की जानी भी ज़रूरी होती है। इसलिए संविधान की विभिन्न धाराओं के तहत जब से चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) की कवायद शुरू की गई है, उस समय से ही चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई प्रक्रिया और उसके कामकाज़ के तरीके पर बड़े किन्तु-परन्तु लगने शुरू हो गए। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के चुनाव से पहले बिहार की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण संबंधी उठे सवालों का चुनाव आयोग को जवाब देना बेहद कठिन लग रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में भी लाखों ही लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके थे, क्योंकि चुनाव आयोग द्वारा पुनरीक्षण के लिए अपनाई प्रक्रिया बेहद जटिल होने के कारण यह आम आदमी की समझ में नहीं आई थी। इस संबंध में पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने न्यायिक अधिकारियों के समक्ष लाखों ही याचिकाएं दायर की हैं, जिनकी सुनवाई कर पाना आसान काम नहीं है, अपितु बेहद लम्बी अवधि का काम है।
बिहार के मतदाताओं में भी मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण को लेकर बड़ा हड़कम्प मचा रहा था, जिसका सन्तोषजनक जवाब अब चुनाव आयोग उचित ढंग से देने में असमर्थ रहा है और अब तक चुनाव आयोग की इसी तरह की प्रक्रिया जारी है। एक-एक राज्य से लाखों ही मतदाताओं के नाम काटे जाने से आयोग की कार्यशैली पर बड़े प्रश्न-चिन्ह ज़रूर लगते हैं। दिल्ली में एक सर्वेक्षण के दौरान 43 लाख मतदाताओं को ‘अनुपस्थित’ या ‘स्थान बदल गए’ की श्रेणी में रख कर मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार लगभग 31.59 लाख मतदाताओं को स्थायी रूप से स्थान बदलने और 11 लाख को अनुपस्थित या लापता करने वाली श्रेणी में रखा गया। इस संबंध में दायर की गई याचिकाओं के अनुसार मतदाता सूची का पुनरीक्षण शुरू होने के समय दिल्ली में 1.45 करोड़ मतदाता थे। लगभग 97 लाख लोगों ने ‘एन्यूमरेशन’ फार्म जमा करवाए। 47 लाख लोगों के फार्म जमा नहीं हो सके। इसकी सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से कहा कि लोगों से उनकी अनुपस्थिति में भी मताधिकार नहीं छीना जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी पूछा कि मतदाता सूची से बाहर रह गए मतदाताओं को ‘फार्म-6’ क्यों भरने के लिए कहा गया, जो पहली बार वोट बनाने वालों द्वारा भरा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय में राजनीतिक पार्टियों के नेताओं और अनेक नागरिकों द्वारा दिए गए हल्फिया बयानों में जो बातें कहीं गई हैं, उनके संबंध में चुनाव आयुक्त द्वारा दाखिल बयान के जवाब में बयान दाखिल करवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को 10 दिन दिए हैं और आगामी सुनवाई 17 नवम्बर को होगी। इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक पार्टियों का पारा बेहद चढ़ा हुआ है। कांग्रेस और अन्य बड़ी पार्टियां इसके लिए अडिग हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त त्याग-पत्र दें।
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जहां कार्यपालिका की ओर से उसके सदस्यों को आसानी से हटाया नहीं जा सकता। हटाने के लिए यह प्रक्रिया बड़ी और लम्बी है। यह वैसे है, जैसे सर्वोच्च न्यायालय के किसी जज पर आरोप लगने पर उस पर महाभियोग चला कर उसे संसद द्वारा निकालने की कार्यवाही की जाती है। इसके साथ ही कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां लगातार यह आरोप भी लगा रही हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इशारों पर चल रहे हैं। राहुल गांधी लगातार चुनाव आयोग पर देश में व्यापक स्तर पर वोट चोरी करने के आरोप लगा रहे हैं। चाहे अभी तक उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय या चुनाव आयोग के समक्ष किसी ठोस सबूत के साथ हल्फिया बयान दायर नहीं किया परन्तु इस बात में भी सच्चाई है कि अब तक देश के 13 करोड़ मतदाताओं को मतदाता सूची से निकाला जा चुका है और उनमें सही मतदाताओं को पुन: सूची में दाखिल करने संबंधी चुनाव आयोग ने कोई सरल किस्म की व्यवस्था नहीं बनाई।
विभिन्न स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य जज ने यह कहा है कि इन याचिकाओं की आपत्तियों सहित प्रत्येक पक्षों को गहराई से जांचा जाएगा परन्तु इस पूरे घटनाक्रम में आज चुनाव आयोग सर्वोच्च न्यायालय के कटघरे में ज़रूर खड़ा हुआ दिखाई देता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक सीमित समय में दिए गए इस फैसले से लोगों को बड़ी राहत मिलने की सम्भावना ज़रूर दिखाई देती है। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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