विश्वास करने के योग्य नहीं रहा चीन
चीन की विश्वसनीयता को लेकर वैश्विक राजनीति, व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्रों में अलग-अलग दृष्टिकोण और गंभीर चिंताएं व्यक्त की जाती हैं। कई देश और विश्लेषक चीन की नीतियों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं जबकि कुछ क्षेत्रों में उसके साथ व्यावहारिक सहयोग भी जारी है। भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से तनाव है। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद से भारत में चीन के प्रति अविश्वास काफी बढ़ा है। द्विपक्षीय समझौतों और शांति स्थापित करने के वादों के बावजूद सीमा पर चीनी सेना की गतिविधियां इस अविश्वास को गहरा करती हैं।
चीन इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है, जिससे फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और ताइवान जैसे पड़ोसी देशों के साथ उसका लगातार टकराव बना रहता है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसलों को न मानना भी उसके प्रति अविश्वास का एक बड़ा कारण है। चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ परियोजना के तहत कई विकासशील देशों जैसे श्रीलंका, पाकिस्तान और कुछ अफ्रीकी देश को भारी कज़र् दिया गया। जब ये देश कज़र् चुकाने में असमर्थ होते हैं, तो चीन उनके रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों जैसे श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह पर नियंत्रण कर लेता है। इसे वैश्विक स्तर पर आर्थिक शोषण के रूप में देखा जाता है। चीनी तकनीकी कंपनियों पर डेटा चोरी और जासूसी के आरोप लगते रहे हैं, जिसके कारण कई देशों ने उन पर प्रतिबंध लगाए हैं। कोविड-19 महामारी की शुरुआत के दौरान सूचनाओं को दबाने और विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ पूर्ण सहयोग न करने के आरोपों ने भी वैश्विक स्तर पर चीन की छवि को नुकसान पहुंचाया।
वैश्विक मंच पर शांति और कूटनीति के कितने ही दावे क्यों न किए जाएं, लेकिन चीन का चरित्र और उसकी विस्तारवादी नीतियां हमेशा से संदेह के घेरे में रही हैं। पड़ोसी देशों की भूमि पर अवैध कब्ज़ा जमाने की उसकी पुरानी आदत किसी से छिपी नहीं है। भारत भी इस विस्तारवाद का एक प्रमुख निशाना रहा है, विशेष रूप से हमारा सामरिक और भौगोलिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य अरुणाचल प्रदेश। हाल ही में एक बार फिर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीनी सैनिकों के बीच आमने-सामने की स्थिति और तनाव ने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया है कि बीजिंग के इरादों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। प्रश्न केवल किसी एक घटना का नहीं, उस व्यवहार का है जिसमें बातचीत के साथ दबाव बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। भारत के लिए संदेश स्पष्ट है कि संबंध सुधारने की इच्छा के साथ-साथ सुरक्षा संबंधी सतर्कता और राष्ट्रीय हितों पर दृढ़ता अनिवार्य है। नि:संदेह अरुणाचल प्रदेश पर भारत की स्थिति स्पष्ट है। यह राज्य भारत का अभिन्न अंग है, जहां संविधान के अंतर्गत निर्वाचित सरकार और प्रशासन कार्य करते हैं। वहां के नागरिक भारतीय लोकतंत्र के सक्त्रिय भागीदार हैं। चीन द्वारा राज्य को दक्षिण तिब्बत कहना या उसके विभिन्न स्थानों के लिए अपने नाम जारी करना इस वास्तविकता को नहीं बदल सकता। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की अपनी व्याख्या के आधार पर किसी पड़ोसी के भू-भाग सी के भू-भाग पर दावा करना स्वीकार्य अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार नहीं है। ऐसी गतिविधियां विवाद के समाधान की संभावनाओं को मजबूत करने के बजाय संदेह और असुरक्षा बढ़ाती हैं। पूर्वी क्षेत्र के सीमा विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मैकमोहन रेखा से जुड़ी है। भारत इसे अपनी पूर्वी सीमा का आधार मानता है जबकि चीन इसकी वैधता स्वीकार नहीं करता। लेकिन ऐतिहासिक मतभेद वर्तमान में तनाव बढ़ाने का औचित्य नहीं बन सकते। जब सीमा के प्रश्न पर संवाद के तंत्र मौजूद हैं, तब जरूरी है कि उन्हीं के माध्यम से समाधान तलाशा जाए। वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर अलग-अलग धारणाओं के बीच सैनिकों की गतिविधियों में संयम और सहमत व्यवस्थाओं का पालन विशेष महत्व रखता है। किसी भी पक्ष की एकतरफा कार्रवाई गलत आकलन को गंभीर टकराव में बदल सकती है।
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