दौड़ रही अर्थ-व्यवस्था का आम आदमी को कितना लाभ ?
आर्थिक विकास की असली कसौटी जीडीपी के आंकड़े नहीं, बल्कि रोज़गार, वास्तविक आय, बचत और आम परिवार की क्रय शक्ति है। भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही है। निवेश बढ़ रहा है, सेवा क्षेत्र का विस्तार हो रहा है, डिजिटल भुगतान का दायरा बढ़ा है और आधारभूत सुविधाओं का विकास हो रहा है। ये सभी संकेत देश की आर्थिक प्रगति को दर्शाते हैं, लेकिन इस चमकती तस्वीर का दूसरा पहलू भी है, जैसे आम आदमी के सामने महंगाई, बढ़ते घरेलू खर्च और बचत में आती कमी जैसी चुनौतियां। खाद्य पदार्थों, पेट्रोल, दवाइयों और शिक्षा पर खर्च लगातार बजट पर दबाव डालता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, तो आम परिवार को आर्थिक राहत क्यों नहीं मिल रही? क्या देश की आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंच रहा है? अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ना निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन विकास का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका असर आम नागरिक के जीवन स्तर पर भी दिखाई दे।
जीडीपी बढ़ने का मतलब यह नहीं कि हर किसी की आय बढ़ गई। जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) किसी निश्चित अवधि में देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल आर्थिक मूल्य को दर्शाता है। इससे अर्थव्यवस्था के आकार और उसकी विकास दर का पता चलता है, लेकिन जीडीपी में वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि देश के प्रत्येक नागरिक की आय भी उसी अनुपात में बढ़ गई है। उदाहरण के लिए किसी शहर में नई फैक्टरी स्थापित होती है, सड़कें बनती हैं, परिवहन सुविधाओं का विस्तार होता है और बैंकिंग तथा व्यापारिक गतिविधियां बढ़ती हैं। इससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है, लेकिन यदि पर्याप्त रोज़गार पैदा नहीं होते या कर्मचारियों के वेतन में महंगाई के अनुपात में वृद्धि नहीं होती, तो विकास का लाभ हर परिवार तक नहीं पहुंच पाता।
यहां वास्तविक जीडीपी और नाममात्र जीडीपी के बीच का अंतर समझना ज़रूरी है। नाममात्र जीडीपी की गणना मौजूदा कीमतों पर की जाती है, जबकि वास्तविक जीडीपी में कीमतों में हुई वृद्धि के प्रभाव को समायोजित किया जाता है। इसलिए अर्थव्यवस्था की विकास दर सात प्रतिशत होने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति की आय भी सात प्रतिशत बढ़ गई है।
आर्थिक प्रगति का सही आकलन करने के लिए रोज़गार के अवसर, वास्तविक वेतन, प्रति व्यक्ति आय और लोगों की क्रय शक्ति जैसे पहलुओं को भी देखना चाहिए। यदि बड़े उद्योगों और कंपनियों की आमदनी बढ़ रही हो, लेकिन छोटे व्यापारियों, श्रमिकों और वेतनभोगी कर्मचारियों के जीवन में सुधार न हो, तो विकास की तस्वीर अधूरी मानी जाएगी।
महंगाई केवल आर्थिक आंकड़ों का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध परिवार की रसोई, बच्चों की पढ़ाई, इलाज, मकान के किराए और आने-जाने के खर्च से है। जब रोजमर्रा की ज़रूरतों पर खर्च बढ़ता है, तो परिवार को अपने बजट में कटौती करनी पड़ती है, उसकी बचत कम हो जाती है। यहां महंगाई की दर और आम आदमी के अनुभव के बीच का अंतर समझना भी ज़रूरी है। यदि महंगाई की दर पांच प्रतिशत से घटकर तीन प्रतिशत हो जाए, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वस्तुएं सस्ती हो गई हैं। इसका अर्थ केवल इतना है कि कीमतें पहले की तुलना में धीमी गति से बढ़ रही हैं। पहले से बढ़ चुकी कीमतों का बोझ परिवारों पर बना रह सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था में घरेलू मांग की बड़ी भूमिका है, लेकिन देश वैश्विक परिस्थितियों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। ऊर्जा की ज़रूरतों के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता इसका एक उदाहरण है। जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इसका असर परिवहन, माल ढुलाई और उत्पादन की लागत पर पड़ता है। कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इस तरह तेल की कीमतों में उछाल का प्रभाव केवल पेट्रोल और डीज़ल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अनेक वस्तुओं और सेवाओं के दाम भी प्रभावित हो सकते हैं।
मौसम भी महंगाई को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है। बारिश कम होने, असमान रूप से होने या किसी क्षेत्र में अत्यधिक बारिश से फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। इससे कृषि उत्पादन और बाज़ार में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित होती है। ऐसी परिस्थितियों में केवल ब्याज दर बढ़ाकर महंगाई पर नियंत्रण पाना पर्याप्त नहीं होता। खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बेहतर बनाना, भंडारण की उचित व्यवस्था करना, परिवहन की लागत घटाना और ज़रूरत के अनुसार समय पर आयात-निर्यात संबंधी निर्णय लेना भी आवश्यक है।
यदि बाज़ार में किसी वस्तु की कमी है, तो केवल लोगों की खर्च करने की क्षमता कम करने से उसकी उपलब्धता नहीं बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में आपूर्ति संबंधी समस्या का समाधान करना अधिक ज़रूरी है।
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