दवाओं के अधिक मूल्य—केन्द्र सरकार किसके साथ ?
निजी अस्पतालों में दवाओं की एमआरपी से कई गुना ज़्यादा कीमत वसूलने के जारी चलन को सुप्रीम कोर्ट ने ‘डकैती’ बताया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है, ‘सरकार इस डकैती को चलने दे रही है। सब कुछ सरकार की आंखों के सामने घट रहा है।’ हैरानी की बात यह है कि अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बावजूद अदालत में केंद्र सरकार निजी अस्पतालों के बचाव में खड़ी दिखाई दी। सरकार ने दलील दी कि अस्पतालों के ऊपर खर्च का बड़ा बोझ है, इसलिए वे दवाओं की अधिक कीमत वसूलते हैं। केंद्र सरकार का निजी अस्पतालों के बचाव में खड़ा होना इस मामले का एक और आंख खोल देने वाला पहलू है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की कीमतों को लेकर यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की, ‘ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य-निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है।’ गौरतलब है कि एनपीपीए पर ही जीवनोपयोगी दवाओं के मूल्य निर्धारण की जिम्मेदारी है। निजी अस्पतालों के सरासर अनुचित व्यवहार और मुनाफाखोरी के पक्ष में सरकार ने यह दलील भी दी कि ‘भारत में दवाओं की कीमत दुनिया में सबसे कम है।’ इस पर सुनवाई कर रहे जजों ने उचित ही इसका यह प्रतिवाद किया कि भारत की प्रति व्यक्ति आय भी दुनिया में ज्यादातर देशों से कम है। बहरहाल, केंद्र सरकार से यह ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि वह मरीज़ों और आम जन की प्रतिनिधित्व करती है या अस्पताल संचालित कर रहे बड़ी पूंजी वाले समूहों की?
सारे बड़े नौकरशाह सेवा विस्तार पर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कम ही अधिकारियों पर भरोसा बनता है और जिन बनता है. वह सेवानिवृत्ति के बाद भी लंबे समय तक सेवा देते रहते हैं। इसीलिए इस समय ज्यादातर शीर्ष अधिकारी सेवा विस्तार पर चल रहे है। कह सकते है कि सेवा विस्तार, जो पहले अपवाद के तौर पर होता था उसे इस सरकार ने एकदम सामान्य बना दिया है। केंद्रीय जांच एजेंसियों सीबीआई और ईडी के निदेशक को सेवा विस्तार देने के लिए तो सरकार ने कानून में संशोधन किया और यह प्रावधान किया कि पांच साल तक सेवा विस्तार दिया जा सकता है। इस समय भी सीबीआई और ईडी दोनों के प्रमुख सेवा विस्तार पर ही है। बहरहाल, यह संभवत: पहली बार हो रहा है कि भारत सरकार के लगभग सारे शीर्ष सचिव सेवा विस्तार पर चल रहे है। सबसे ताज़ा मामला रक्षा सचिव का है। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली नियुक्ति संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (एसीसी) ने रक्षा सचिव राजेश कुमार सिह का कार्यकाल एक साल बढ़ा दिया है। वह 31 अक्तूबर को सेवा-मुक्त होने वाले थे। वह अब 31 अक्तूबर 2027 तक सेवा देंगे। वह एक नवम्बर 2024 को रक्षा सचिव नियुक्त हुए थे और दो साल का तय कार्यकाल पूरा कर लिया है। इसी तरह गृह सचिव गोविंद मोहन को दो सेवा विस्तार मिल चुके हैं। विदेश सचिव विक्रम मिसरी का कार्यकाल भी जुलाई 2026 में खत्म हो रहा था, लेकिन उनको एक साल का सेवा विस्तार मिला है।
कांग्रेस से ज्यादा शिवकुमार को झटका
कर्नाटक में विधान परिषद की चार सीटों पर चुनाव हुए थे और सभी चार सीटें एनडीए ने जीत ली। सत्तारूढ़ कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। यह कांग्रेस के लिए तो झटका है लेकिन उससे ज्यादा बड़ा झटका मुख्यमंत्री डी.केय शिवकुमार के लिए है। पहली बार उनके प्रबंधन पर सवाल उठ रहे हैं। वह पहले से पार्टी के अंदर विरोध झेल रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के समर्थकों को काबू में किया है और पार्टी व सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत की थी। लेकिन विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद सिद्धारमैया खेमा आक्रामक हो गया है। हालांकि इससे डी.के. शिवकुमार की कुर्सी को कोई खतरा नहीं है लेकिन धारणा के स्तर पर बिल्कुल नीचे जा रही भाजपा को संजीवनी मिली है और शिवकुमार की चुनौतियां बढ़ गई हैं। गौरतलब है कि विधान परिषद चुनाव के लिए भाजपा के सहयोगी जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने बड़ी मेहनत की थी। इसीलिए पश्चिमी स्नातक, उत्तर पश्चिमी शिक्षक, दक्षिण पूर्व स्नातक और बेंगलुरू शिक्षक की चारों सीटों पर एनडीए ने जीत हासिल की है। जेडीएस को बेंगलुरू की शिक्षक सीट पर जीत मिली है। तीन सीटों पर भाजपा और एक पर जेडीएस को जीत मिली है।
नए राज्यपाल ने शुरू किया टकराव
भाजपा के वरिष्ठ नेता ओम माथुर को कुछ समय पहले सिक्किम का राज्यपाल बनाया गया था। अब उन्हें केरल भेज दिया गया है। केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को तमिलनाडु भेजा गया है। उन्होंने आर.एन. रवि की जगह ली है, जिनको पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया है। सिक्किम से निकल कर केरल पहुंचते ही ओम माथुर एक्शन में आ गए हैं। उन्होंने वहां पहुंचते ही विवाद खड़ा कर दिया। माथुर ने कहा कि अब लोकभवन मे सिर्फ शाकाहारी भोजन बनेगा। सबको पता है कि यह आदेश पूरी तरह से राजनीतिक है, क्योंकि इस तरह का कोई आदेश सिक्किम के लोकभवन में ओम माथुर ने नहीं दिया था। केरल की लगभग 95 फीसदी आबादी मांसाहार करती है। वहां करीब 45 फीसदी आबादी मुस्लिम और ईसाई की है। 55 फीसदी हिंदू आबादी में भी ज्यादातर लोग मांसाहार करते हैं। यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है। राज्यपाल खुद शाकाहार हैं, लेकिन उन्होंने अपनी पसंद सभी लोगों पर थोप दी है। सभी लोगों पर शाकाहार थोपना भाजपा की राजनीतिक ताकत दिखाने का सबसे बेकार तरीका है। पश्चिम बंगाल में पिछले दिनों भाजपा ने ऐसा करने का प्रयास किया, लेकिन उसे तुरंत ही पीछे हटना पड़ा। केरल में भी इस आदेश का कोई राजनीतिक लाभ पार्टी को नहीं मिलने वाला है।
राहुल के बरी होने से सपा-भाजपा को राहत
सुल्तानपुर की अदालत ने अमित शाह की मानहानि के मामले में राहुल गांधी को बरी कर दिया। मानहानि का यह मामला 2018 का है। उस समय अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। राहुल गांधी ने कर्नाटक में एक चुनावी सभा में कहा था कि भाजपा ने ऐसे नेता को अध्यक्ष बनाया है जिसके ऊपर हत्या का आरोप है। वह जस्टिस लोया की मौत के मामले का ज़िक्र कर रहे थे, जिसमें बाद में अमित शाह बरी हो गए थे। राहुल गांधी की इस टिप्पणी को लेकर भाजपा के एक कार्यकर्ता ने उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर मे मानहानि का केस कर दिया। उसने दावा किया था कि राहुल ने अमित शाह को हत्यारा कहा है, जबकि राहुल बार-बार हत्या का आरोपी कह रहे थे। फिर भी मामले की सुनवाई आठ साल चली और अंतत: मामला खारिज कर दिया गया। बहरहाल, उनकी रिहाई से भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों के नेताओं ने राहत की सांस ली है। मामले में राहुल दोषी ठहरा दिए जाते और उनको सज़ा हो जाती। फिर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ज्यादा आक्रामक हो जाती और भाजपा विरोधी वोट को एकजुट करने लगती। मुस्लिम वोटों पर उसकी दावेदारी बढ़ जाती और फिर दलित वोट भी कांग्रेस की ओर रुझान दिखा सकता था। सपा को यह चिंता थी कि पहले से ही 180 सीटों की मांग कर रही कांग्रेस ज्यादा मोलभाव करने लगेगी। भाजपा को भी कांग्रेस की सक्रियता से ब्राह्मण वोट टूटने की चिंता है। इसीलिए राहुल को बरी किया गया तो सबने राहत की सांस ली।





