सांसों पर गहराता संकट और समाधान ढूंढने में विफल सरकारें
साफ हवा में सांस लेना किसी नागरिक की बुनियादी ज़रूरत है। फिर भी उत्तर भारत में सर्दियों की दस्तक के साथ ही हर साल हवा का सवाल सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकट में बदल जाता है। विशेष तौर पर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ते ही सरकारी बैठकों, चेतावनियों, निरीक्षणों और प्रतिबंधों का सिलसिला शुरू हो जाता है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि जिस समस्या का समाधान वर्षों से तलाशा जा रहा है, वह हर साल लौट कर पहले से अधिक गंभीर क्यों हो जाता है? क्या हमारी व्यवस्था प्रदूषण को समय रहते रोकने के बजाय उसके बढ़ जाने के बाद उससे निपटने की आदी हो चुकी है?
अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में दिल्ली की हवा की स्थिति इस चिंता को फिर सामने ले आयी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक 21 अक्तूबर 2026 को दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) दोपहर दो बजे 244 दर्ज किया गया, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है। इसके बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) के पहले चरण को लागू कर दिया। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के पूर्वानुमान ने भी आने वाले दिनों में प्रदूषण की स्थिति पर सतर्क रहने की ज़रूरत रेखांकित की है। मगर ये आंकड़े किसी एक दिन की असुविधा नहीं बल्कि उस मौसमी चुनौती की चेतावनी हैं, जिसका सामना हर वर्ष लाखों लोग करते हैं।
दिल्ली की ज़हरीली होती हवा पर चर्चा शुरू होते ही पराली जलाने का मुद्दा प्रमुखता से उठता है। पंजाब और हरियाणा में धान की फसल के अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआं निश्चित रूप से चिंता का विषय है, लेकिन पूरे संकट का दोष किसानों को देना समस्या को सरल बनाकर देखने जैसा है। दिल्ली-एनसीआर और आस-पास के क्षेत्रों में वाहनों का धुआं, सड़क और निर्माणस्थलों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाना तथा कुछ क्षेत्रों में ईंधन के पारंपरिक साधनों का इस्तेमाल भी प्रदूषण में योगदान देता है। मौसम की स्थिरता, कम हवा और वायुमंडल में प्रदूषकों के फैलाव की सीमित परिस्थितियां इनका प्रभाव बढ़ा सकती हैं। चूंकि समस्या बहुआयामी है, इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए। किसान को पराली न जलाने की सलाह देना आसान है, लेकिन फसल कटाई के बाद सीमित समय में खेत साफ करने की उसकी आर्थिक और व्यवहारिक मजबूरियों को समझना भी ज़रूरी है। मशीनें उपलब्ध कराना, उनके किराये को वहनीय बनाना, फसल अवशेष से उपयोगी उत्पाद तैयार करने के बाज़ार को विकसित करना और समय पर किसानों को आर्थिक सहायता देना नीति का हिस्सा होना चाहिए। किसान को दंडित करने से पहले उसे व्यवहारिक विकल्प उपलब्ध कराना स्थायी समाधान है।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए नियमों की कमी नहीं है। ग्रैप के अंतर्गत हवा की गुणवत्ता बिगड़ने पर चरणबद्ध उपाय लागू किए जाते हैं। धूल नियंत्रण, निर्माणस्थलों की निगरानी, कचरा जलाने पर रोक, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर नियंत्रण और औद्योगिक इकाइयों की जांच जैसे कदम पहले से निर्धारित हैं। फिर भी सवाल उठता है कि इन उपायों का पालन सुनिश्चित करने वाली एजेंसियों की जवाबदेही किस तरह तय होती है। किस सड़क पर नियमित सफाई नहीं हुई? किस निर्माणस्थल ने धूल रोकने के नियमों का उल्लंघन किया? कहां खुले में कचरा जलाया गया? किन औद्योगिक इकाइयों ने निर्धारित मानकों की अनदेखी की? और शिकायत मिलने के बाद भी कार्रवाई कितने समय में हुई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। जब प्रशासनिक कार्रवाई का मूल्यांकन केवल निरीक्षणों और चालान की संख्या से होगा, तो वास्तविक सुधार पीछे छूट जाते हैं। सफलता का पैमाना हवा में प्रदूषकों की कमी और नागरिकों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा होना चाहिए।
इसके लिए केंद्र, दिल्ली सरकार, पड़ोसी राज्यों, नगर निकायों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के बीच प्रभावी समन्वय अनिवार्य है। प्रदूषण की कोई प्रशासनिक सीमा नहीं होती। दिल्ली में हवा खराब होने का कारण कई बार आसपास के क्षेत्रों की गतिविधियों और मौसम से भी जुड़ा होता है। इसलिए अलग-अलग सरकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप से अधिक ज़रूरी साझा कार्ययोजना और उसके परिणामों की नियमित समीक्षा है।
वायु प्रदूषण को केवल पर्यावरण संबंधी समस्या मानना भूल होगी। सूक्ष्म कण, विशेषकर पीएम 2.5, सांस के रास्ते शरीर में गहराई तक पहुंच सकते हैं और फेफड़ों तथा हृदय से संबंधित बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से चिंताजनक है।
सांसों के इस संकट का समाधान मौसमी आदेशों से नहीं, निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक योजना और प्रशासनिक जवाबदेही से निकलेगा।े अब समय आ गया है कि प्रदूषण पर नियंत्रण का दावा सरकारी घोषणाओं में नहीं, लोगों की सांसों में दिखाई दे।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



