मां रेणुका जी की प्रतिछाया रेणुका झील


 शिवालिक पहाड़ियों के आंचल में सिरमौर ज़िले की खूबसूरत वादियों में नाहन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उत्तर भारत का प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल है रेणुका जी। यहां पर मौजूद है नारी देह के आकार की प्राकृतिक झील जिसे मां रेणुका जी की प्रतिछाया भी माना जाता है। इसी झील के किनारे मां रेणुका जी व भगवान परशुराम जी का भव्य मंदिर स्थित है। प्रतिवर्ष कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
कथानक के अनुसार प्राचीन काल में आर्यवर्त में हैहयवंशी क्षत्रीय राज करते थे तथा भृगुवंशी ब्राह्मण उनके राज पुरोहित थे। इसी भृगवंश के महर्षि ऋचिक के घर महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। इनका विवाह इक्ष्वाकु कुल के ऋषि रेणु की कन्या रेणुका से हुआ। महर्षि जमदग्नि सपरिवार इसी क्षेत्र में तपस्या में मग्न रहने लगे। जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की, वह ‘तपे का टीला कहलाता है’। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को मां रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम ने जन्म लिया। इन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। अश्वत्थामा, ब्यास, बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य व मार्कण्डेय जैसे अष्ठ चिरंजीवियों के साथ भगवान परशुराम भी चिरंजीवी हैं।
महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी जिसे पाने के लिए सभी तत्कालीन राजा ऋषि लालायित रहते थे। राजा अर्जुन ने वरदान में भगवान दत्तात्रेय से एक हज़ार भुजाएं पाई थीं, जिसके कारण वह सहस्त्रबाहु कहलाए जाने लगा। एक दिन वह महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु मांगने पहुंच गया। महर्षि जमदग्नि ने सहस्त्रबाहु एवं उसके सैनिकों का खूब सत्कार किया तथा उसे समझाया कि कामधेनु गाय उनके पास कुबेर जी की अमानत है, जिसे किसी को नहीं दिया जा सकता। यह सुनकर गुस्साए सहस्त्रबाहु ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। यह सुनकर मां रेणुका शोकवश राम सरोवर में कूद गईं। राम सरोवर ने मां रेणुका की देह को ढकने का प्रयास किया, जिससे इसका आकार स्त्री देह के समान हो गया।
उधर, भगवान परशुराम महेन्द्र पर्वत पर तपस्या में लीन थे। योग शक्ति से उन्हें अपनी जननी एवं जनक के साथ हुए घटनाक्रम का एहसास हुआ और उनकी तपस्या टूट गई। परशुराम अति क्रोधित होकर सहस्त्रबाहु को ढूंढने निकल पड़े तथा उसे आमने-सामने के युद्ध के लिए ललकारा। परमवीर भगवान परशुराम ने सेना सहित सहस्त्रबाहु का वध कर दिया। तत्पश्चात् भगवान परशुराम ने अपनी योग शक्ति से पिता जमदग्नि तथा मां रेणुका को जीवित कर दिया। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को अपने पुत्र भगवान परशुराम को मिलने आया करेंगी। एक अन्य कथा के अनुसार, महर्षि जमदग्नि तपस्या में लीन रहते थे। ऋषि पत्नी रेणुका पतिव्रता रहते हुए धर्म-कर्म में लीन रहती थीं। ऋषि जमदग्नि प्रतिदिन गिरि गंगा का जल पीते तथा उससे ही स्नान करते थे। उनकी प्रतिव्रता पत्नी रेणुका कच्चे घड़े में नदी से पानी लाती थीं। उनके सतीत्व के कारण वह कच्चा घड़ा कभी नहीं गलता था। एक दिन जब वह पानी लेकर सरोवर से आ रही थीं तो क्षण भर के लिए विचलित हो गईं तथा आश्रम में देरी से पहुंचीं। ऋषि जमदग्नि ने अंतर्ज्ञान से जब विलम्ब का कारण जाना तो वह रेणुका के सतीत्व के प्रति आशंकित हो गए। उन्होंने एक-एक करके अपने 100 पुत्रों को अपनी माता का वध करने का आदेश दिया, परन्तु उनमें से कोई भी पुत्र अपनी माता पर हाथ नहीं उठा सका। केवल परशुराम ने ही पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता का वध कर दिया।
इस कृत्य से प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने पुत्र से वर मांगने को कहा। भगवान परशुराम ने अपने पिता से माता को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगा। इसके बाद माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन डेढ़ घड़ी के लिए अपने पुत्र भगवान परशुराम से मिलने आया करेंगी। मां-बेटे के इस पावन मिलन के अवसर  से रेणुका मेला आरम्भ होता है। तब की डेढ़ घड़ी आज के डेढ़ दिन के बराबर मानी जाती है। पहले यह मेला डेढ़ दिन का हुआ करता था तथा वर्तमान में लोगों की श्रद्धा एवं जनसैलाब को देखते हुए यह मेला कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक आयोजित किया जाता है।