खेलों में भावनाओं को उत्साहित करने की ज़रूरत


आधुनिक, तेजी से बढ़ रहे विश्व में जहां खेलों का प्रसार-प्रसारण अखबारों, टी.वी. और सोशल मीडिया में अधिक हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ अन्य देशों में सरकारें अपने खिलाड़ियों को उत्साहित करने के लिए कई नए कदम भी उठा रही है। पहले खेलों का महत्त्व दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करना होता था, आपसी भाईचारे को बढ़ाना होता था, देश और लोगों के प्यार में बढ़ौत्तरी करना होता था, लेकिन अब सिर्फ यह खेल का मैदान न होकर एक जंग का मैदान बन गया है, कोई प्यार, सत्कार नहीं रहा। खिलाड़ियों का उद्देश्य सिर्फ जीतना है उनको किसी और चीज़ की कोई परवाह नहीं है। आजकल के खिलाड़ियों में ईमानदारी की कमी है। अगर वह ईमानदारी से खेले तो हर राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता को हासिल कर सकते हैं। खिलाड़ी अपने रिकार्ड को बढ़ाने के लिए नशों का सहारा लेते हैं जिससे अनुशासन का तो उल्लंघन होता ही है, साथ ही नियमों को भी तोड़ते हैं।
अक्सर हमें सुनने में आता है कि जीते हुए खिलाड़ी के पदक और पुरस्कारों को वापिस ले लिया गया, यह सिर्फ नशों के कारण ही होता है। यह सब खिलाड़ी इसीलिए करते हैं ताकि वह रातों-रात अमीर हो सकें, क्योंकि जब वह एक मैच को खेल कर जीते हैं तो उनको सरकार और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी मान-सम्मान दिया जाता है और बड़ी-बड़ी कम्पनियां उनको अपने विज्ञापन में भी लेने के लिए मिलती हैं, जिसकी वजह से खिलाड़ी रातों-रात ही पैसा और दौलत कमाने में समर्थ हो जाता है। उनमें लालच आ जाता है।
आज कल हर देश में लोगों की रूचि खेल देखने में नहीं बल्कि उनकी दिलचस्पी खेल की जीत-हार से होती है। मान लो कि अगर भारत-पाकिस्तान का फाइनल मैच चल रहा हो तो हमारी यही इच्छा होगी कि भारतीय खिलाड़ी अच्छी तरह से खेलें और आऊट न हो खेलता रहे, लेकिन जब कोई पाकिस्तान का खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करता है तो हम बार-बार उसके आऊट होने की दुआ मांगते हैं।
हमेशा यह देखने में आया है कि अगर कोई टीम जीत कर विदेश से अपने देश में आती है तो उनका हर प्रकार से स्वागत किया जाता है। लेकिन जब वही टीम हार कर आती है तो उनको पूछा भी नहीं जाता स्वागत को दूर की बात है। इसके बाद जो कसर रह जाती है वह खिलाड़ियों के ऊपर सट्टा लगाने वाले पूरी कर देते हैं। वह तो बस खिलाड़ियों को कमाई का साधन समझते हैं।
आजकल खिलाड़ियों की रूचि खेलों में कम हो रही है। वह खेल के मैदान को सिर्फ जंग और हार-जीत का मैदान समझते हैं। यह हार जीत तो एक सिक्के के दो पहलू हैं। अगर आज एक टीम की हार है तो कल उसी टीम या खिलाड़ी की जीत भी हो सकती है। खेल तो मानवता को आपस में जोड़ने का काम करता है। अगर एक खिलाड़ी हारता है तो उसकी बुराई करने के बजाय उसको अगली खेल के लिए उत्साहित करना चाहिए। नीचा नहीं दिखाना चाहिए। उसका हौसला बढ़ाना चाहिए ताकि आगे वह अच्छा प्रदर्शन करके अपना और देश का नाम रोशन कर सके।