आर्थिक महाभारत में आम आदमी का हाल


पिछले दिनों में इस वर्ष की दो तिमाहियों के आंकड़े जनता के समक्ष आ गये। इस बीच मोदी सरकार ने श्रेय लिया कि देश के आर्थिक कायाकल्प के लिए उसने दो बड़े फैसले लिये हैं। पहला कि पिछले वर्ष 8 नवम्बर की रात को देश के बड़े नोटों की 86 प्रतिशत मुद्रा अमान्य कर दी। इससे देश की मण्डी व्यवस्था, क्रय-विक्रय प्रक्रिया और वितरण व्यवस्था मृत प्राय: हो गई। इस साहसिक घोषणा को नोटबंदी का नाम दिया गया। इसके बाद पुराने नोटों की जगह नये नोटों के अधिकांश प्रसार को लगभग पांच महीने लग गये। इसके विकल्प रूप में सरकार ने डिजिटल व्यवस्था को पेश किया। लेकिन लोगों की गरीबी, डिजिटल की लागत और आम लोगों की अनपढ़ता के कारण या सरकारी जबरदस्ती के कारण यह व्यवस्था अपनाई न जा सकी। ज्यों-ज्यों नये नोटों का प्रसार बढ़ता गया, लोग इस व्यवस्था को छोड़ कर वापस अपनी नकदी लेन-देन को लौट गये।
इससे भी बड़ी बात यह कि सरकार ने देश की 16.82 लाख करोड़ करंसी अमान्य करते हुए उम्मीद रखी थी, कि इससे काले धन की कमर टूट जायेगी, नकली नोटों का धंधा बंद हो जायेगा और आतंकवादियों की  फंडिग की कमर टूट जायेगी। लेकिन इसमें से एक भी लक्ष्य पूर्ण न हो सका। काला धन तो क्या बेनकाब होना था। लोग अमान्य मुद्रा से अधिक पैसा अपने खातों और अपने प्रभावधीन जन-धन खातों में जमा करवा कर तात्कालिक रूप से सफेद हो गये। अब ढूंढते रहिये इनमें सफेद कौन सा है और काला कौन सा। नकली नोटों का कारोबार रुका नहीं, क्योंकि इसका धंधा करने वाले शातिर लोगों ने तत्काल नई करंसी के नकली नोट मंडी में फेंक दिये। अब रह गई टैरर फंडिग को खत्म करने की बात। नोटबंदी का इस पर विशेष असर नहीं हुआ। पकड़े गये और मृत आतंकवादियों के थैलों में अब पुरानों की जगह नई करंसी नज़र आने लगी। नोटबंदी के बाद हुई मारक आतंकी और नक्सली घटनाएं इसका प्रमाण है। अभी कश्मीर घाटी में सेना के द्वारा जो टैरर फंडिग पर छापामारी और गिरफ्तारियों का सक्रिय अभियान चलाया गया, इससे स्पष्ट हो गया कि आतंकवादियों के पास नई करंसी आसानी से पहुंच गई है।
चाहे मोदी सरकार ने कुछ आंकड़े संसद में अवश्य पेश किये कि नोटबंदी के इस साहसिक अभियान के बाद लगभग पांच हज़ार करोड़ रुपए का काला धन उद्घाटित हुआ है, लेकिन जितना बड़ा यह साहसिक अभियान था, उसके मुकाबले यह प्राप्ति नगण्य है।
इसके बाद आर्थिक चिन्तन के गलियारों में पहले नोटबंदी और उसके बाद 1 जुलाई से लागू किये जी.एस.टी. ने एक-एक करके देश में आर्थिक विकास गति को जिस प्रकार धीमा कर दिया, उस पर आर्थिक विवाद का महा समर खड़ा हो गया। सबसे पहले इस वर्ष की पहली तिमाही का मूल्यांकन सामने आया, जिसमें स्पष्ट हुआ कि नोटबंदी ने देश की आर्थिक सक्रियता को मन्द किया, उसके कारण देश की आर्थिक विकास की गति में 1.7 प्रतिशत की कमी आ गई। लेकिन वित्त मंत्री ने इस आकलन की यह कहकर उपेक्षा कर दी कि यह विश्व-व्यापी मन्दी के कारण है। लेकिन डा. मनमोहन सिंह, अर्मत्य सेन, सुब्रह्मण्यम स्वामी, रंग राजन और बाद में इस बहस में कूदे यशवंत सिन्हा का यह मत था कि यह मन्दी नोटबंदी की वजह से पैदा हुए आर्थिक नीति के पक्षाघात के कारण पैदा हुई है। डा. मनमोहन सिंह ने कहा था और अब भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने भी आलोचना की कि नोटबंदी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर कम से कम दो प्रतिशत कम हुई है। वित्त मंत्री अरुण जेतली का यह कहना था कि जो नुक्सान होना था, वह हो चुका, जबकि इन अर्थशास्त्रियों का यह मत था कि नोटबंदी से पैदा नुक्सान कम से कम दो वर्ष चलेगा।  लेकिन पहली तिमाही के बाद ही दूसरी तिमाही में देश भर में जी.एस.टी. लागू होने का हल्ला शुरू हो गया। इसके कारण व्यापारी और उद्योगपति अपना पहला स्टाक क्लीयर करने में लग गये और जी.एस.टी. प्रक्रिया के सरल और पूरी तरह लागू होने से पहले उन्होंने अपने नये निर्माण और निवेश को हतोत्साह कर दिया। नतीजा एकदम सामने आ गया। एक जुलाई से जी.एस.टी. लागू हो गया और देश की आर्थिक विकास दर में और 5 प्रतिशत की कमी हो गई। इस प्रकार कुल कमी हगुई दो प्रतिशत से अधिक, जिससे तीन लाख करोड़ रुपए की सकल घरेलू आय और रोज़गार में कमी आई।
तब यशवंत सिन्हा का एक कटु बयान इस पूरी स्थिति पर आया। उन्होंने नोटबंदी और जी.एस.टी. लागू होने को अर्थव्यवस्था का चीरहरण बताया। मोदी जी ने अपने भाषणों में कहा कि यह सत्य नहीं। सत्य है कि इस समय हमारे देश की आर्थिक गति मन्द हुई है, लेकिन इससे पहले आठ बार मनमोहन काल में यही आर्थिक विकास दर कम हो 5.7 प्रतिशत तक आई है। लेकिन यह नहीं बताया कि मोदी काल में सूचकांक का आधार वर्ष बदल दिया गया था। इसके कारण अगर वास्तविक आर्थिक विकास गति देखी जाये तो यह 5.7 प्रतिशत की जगह 3.7 प्रतिशत होती। इस पर बहुत छीछालेदर हुई। पिछले दिनों आर्थिक विकास गति को लेकर जो महाभारत देश के सत्ता पक्ष और विपक्ष में हुआ, उसी कारण जी.एस.टी. काउंसिल को 27 वस्तुओं की दरें घटानी और छोटे उद्यमियों को राहत देनी पड़ी। लेकिन इसके बावजूद आर्थिक विकास पर विवाद थमा नहीं। सम्भवत: अभी गुजरात और हिमाचल के चुनावों से पूर्व मन्द आर्थिक गति से आहत जनता के ज़ख्मों पर राहत का कोई और मरहम लगाना पड़े।