अकेला इन्सान.....


‘मैं इन बच्चों की मां हूं’ उसने टोपी पहने उन तीनों बंदरों की ओर संकेत करते हुए कहा।  ‘लेकिन वह तो मेरा घर है,’ मैंने दृढ़ता के साथ कहा। ‘नहीं सर, यह झूठ बोल रहा है, ये लोग तो सारे जंगलों को काट कर अपने घर बनाते जा रहे हैं, फिर हम कहां जाएं, जब हम अपने घरों की तलाश में इन लोगों के इलाकों में जाते हैं तो ये लोग इकट्ठे हो कर हम पशु-पक्षियों को मार ही देते हैं’ वह भावुक होकर कितना ही कुछ कह गई।‘हां, एक बार मैं भी भूल से इन के इलाके में चला गया था तो ये सब लोग लट्ठ लेकर मेरे पीछे पड़ गए थे, मुझे तो ये लोग मार ही देते यदि कुछ भले-मानस लोगों ने मुझे बचाया न होता और शायद आज मैं यहां जीवित भी खड़ा न होता’ शेर ने आह भरते हुए कहा। ‘सर, इन लोगों ने तो बहुत कहर ढाह रखा है, इन लोगों ने तो सब जंगल ही काट दिए हैं। और वहां बड़ी-बड़ी गगनचुम्बी-इमारतें बना ली हैं। ’ कुछ और जानवर भी बड़ी बेबसी में बोले। ‘सर, इन्होंने तो हमारे घौंसले तक बनाने की जगह नहीं छोड़ी, सबके सब वृक्ष काट दिए हैं।’अब हम कहां जाएं?’ हमारे वंश, हमारी नस्लें तक इन लोगों ने तबाह कर दी हैं बड़े-बड़े टावर लगा कर। टावर के पास तो हम जा भी नहीं सकते, पता नहीं कैसी अदृश्य-सी आंधी वहां झूलती है।’ ‘सर, टावर के पास जाते ही ऐसे प्रतीत होता है जैसे कोई करंट मार रहा हो, आंखें तो यूं जैसे अंधी हो जाती हैं, न ही कुछ दिखता है न ही कुछ सूझता है। हमारे तो मां-बाप जो भी कभी हमारे लिए दाना चुगने गए थे अभी तक वापिस नहीं लौटे, हम बड़े मायूस हैं न तो हमें उनके जीवित होने का पता है और न ही उनके मरने का, ऐसे लगता है कि इन मानव-निर्मित टावरों ने ही उनके प्राण निगल लिए हों। इस निर्मम-मानव ने तो जैसे हमारी नस्लों को तबाह करने की ठान ही ली है, हमें तो लगता है कि हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा’ सभी पशु-पक्षी अपनी-अपनी निर्मम-व्यथा बड़े व्यथित-हृदय से बयान कर रहे थे। विभिन्न प्रकार के असंतुष्ट-स्वर सम्पूर्ण वातावरण में गुंजायमान हो रहे थे। हर दिल से हर आत्मा में बड़ी व्यथित-आह निकल रही थी। एक बार तो मेरा मन भी भर आया। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं ही इनका गुनाहगार हूं क्योंकि सच में न तो हमने जंगल छोड़े हैं और न ही पेड़-पौधे यहां ये जीव अपना आशियाना बना सकें। हर चीज़ को तो हम लोगों ने अपनी सुविधा अनुसार काट-छांट कर अपने उपयोग हेतु बना लिया है। परन्तु ये लोग जाएं तो जाएं कहां, करें तो करें क्या? ऊपर से कारखानों, फैक्टरियों और वाहनों का प्रदूषण, गंदगी जिसने सारे वातावरण को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण प्राकृतिक स्वरूप को भी प्रभावित किया है और बची-खुची कसर इन मोबाइलों और नैट के टावरों ने पूरी कर दी है जिसकी रेडिएशन से कई पक्षियों की तो जात-नस्लें ही तबाह हो गई हैं तो कुछ समाप्त होने की कगार पर खड़ी हैं। अपने स्वार्थ में हम लोग इतने अंधे हो गए हैं कि दूसरे जीवन जिनको ईश्वर ने हमारी तरह ही प्राणी-रूह दिए हैं हमें उनका ज़रा भी ध्यान नहीं आता। ये बेबस पशु-पक्षी बेचारे क्या करें और कहां जाएं, यह बात मेरे दिल में शूलों की तरह चुभ रही थी। मुझे अपने अपराधी होने का आभास बड़ी गहराई से हो रहा था। मुझे लग रहा था कि यहां आज मेरा घर है कभी यहां इनका रैन-बसेरा हुआ करता था। ये कोई झूठ थोड़े ही बोल रहे हैं। जब कभी ये पशु-पक्षी भूलवश हमारे घरों की ओर आ जाते हैं तो हम इनके साथ क्या व्यवहार करते हैं यह किसी से भी छुपा नहीं है। उस समय हम लोग ही दृष्ट बन जाते हैं और इन लोगों के साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार करते हैं। सभी पशु-पक्षी बड़ी बेबसी-भरी नज़रों से मेरी ओर ताक रहे थे मानो कह रहे हों कि जिस परमात्मा ने तुम्हें पैदा किया है उसी परमात्मा ने हमें भी पैदा किया है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ मत करो और हमें भी जीने दो। वहां खड़े मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे मैं इतने सारे इंसानों में अकेला ही जानवर खड़ा हूं। 

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