आदतें अच्छी या बुरी !


मैं एक ऐसे बुजुर्ग को जानता हूं, जिसके पास 50-60 लाख रुपए हैं। खूबसूरत घर है व खूबसीरत पत्नी भी। दोनों मियां बीवी अच्छी पैंशन लेते हैं। एक बेटी है, जिसे बहुत ही अच्छा पति मिल गया। गुलेल नाम के इस बुजुर्ग को बजरी, रेत, ईंटें इत्यादि चोरी करने की बुरी आदत है। गुलेल रात्रि समय पीतल की परात में डालकर बजरी/रेत इत्यादि की ढुलाई कर लेता है। मोहल्ले में जब भी कोई सरकारी काम शुरू होता है तो गुलेल भिखारियों की तरह चीजें मांग भी लेता है। जनवरी की घने कोहरे में लिपटी रात में मैने बजरी उठाने का दृश्य खुद देखा। मैं कई बार सोचता हूं कि आदमी के मन की स्थिति भी क्या चीज़ है? बुरी आदतें तो श्मशान घाट तक साथ जाती हैं। शव यात्रा में आये लोग जाने वाले प्राणी की आदतों का पोस्टमार्टम भी करते हैं। मेरे पिता स्वर्गीय इंद्रजीत सिंह ग्रेवाल विद्वान लेखक थे। उन्होंने आठ किताबें लिखीं। रूसी सहित्य की मोटी-मोटी किताबें भी पढ़ीं। मैं उनकी कुछ आदतों का रूप रंग आज तक भी समझ नहीं पाया। उन्होंने मोटा कैश, भूखंड, ज़मीन व घर के बर्तन तक शराब के दरिया में बहा दिये। पापा ‘पठानी ब्याज़’ (मनमर्ज़ी का ब्याज़) पर कर्ज़  लेते थे। पापा को नि:शुल्क दवाईयां/टॉनिक इत्यादि एकत्र करने का भी अजीब शौक था। सरकारी डाक्टरों से जान-पहचान होने के कारण हमारे घर सरकारी दवाइयों का अम्बार लगा रहता। पापा सरकारी स्टेशनरी व सरकारी कोयला भी घर ले आते। मैं आधी रात के समय जब लिखते-लिखते थक जाता हूं तो चांद तारों को देखने छत्त पर चला जाता हूं। चांद की तरफ देखते हुए मैं अक्सर सोचता हूं कि आदमी भी क्या चीज है? आदमी का स्वभाव भी क्या चीज है? मैंने कंजूस मक्खी चूस व्यक्तियों की हरकतें नोट करने के लिए एक रजिस्टर लगा रखा है। एक अंग्रेज़ी स्कूल टीचर का नाम भी रजिस्टर में अंकित है। दलेर कौर नामक यह टीचर मेरी अच्छी जानकार हैं। मुझे एक दिन गिफ्ट स्टोर पर मिल गई। वह राखी खरीद रही थी। वास्तव में मैं भी कम नहीं। जब पर्स भरा होता है तो धड़ाधड़ शापिंग करता हूं और जब पैसे समाप्त हो जाते हैं तो ‘विंडो शॉपिंग’ (सिर्फ देखना-खरीदना नहीं)। मैं हैरान था कि मैडम त्यौहार के गुजर जाने के बाद राखी क्यों खरीद रही हैं? बड़े ही ढंग से पूछने पर पता चला कि मैडम आगामी वर्ष की राखी की तैयारी में जुट गई हैं, क्योंकि तीस वाली राखी मात्र 10 रुपए मिल रही है। सिर्फ बातें बनाने से आपकी बल्ले-बल्ले नहीं हो सकती। पंजाबी कहावत है—‘इक रुक्ख सौ सुख’ इस कहावत को अपना कर देखो मौज और महक आपके कदम चूमेंगी। ‘खामोश रहना’ व ‘सहनशीलता’ तो ज़िंदगी के बेशकीमती आभूषण हैं। मूर्ख क्या जाने इनका मोल। मूर्ख उस समय तक नहीं रुकते जब तक छित्तर परेड न हो। मेरे जानकार धमाका सिंह ने बड़े धूमधाम से विवाह रचाया। पांच दिन बाद ही दुल्हन कैश व जेवरात लेकर अपने मायके चली गई। मूर्ख लड़के की बुरी आदतों के कारण दुल्हन गई... कैश गया... गहने भी गये। लड़के का पूरा परिवार दुल्हन को लेने गया मगर शर्मसार होकर लौट आया। ऊपर से लड़की वालों ने धमकी दी कि अगर फिर से आये तो दहेज विरोधी कानून की धाराएं लगवा कर दांत खट्टे कर देंगे। सार्वजनिक समारोहों में बैठना भी बड़ी परीक्षा है। बड़े-बड़े लीडर, डाक्टर, लेखक, बुद्धिजीवी अत्यंत लम्बे-लम्बे भाषण करते हैं। अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवी समय भी खा जाते हैं और सिर भी। इन लोगों को वहम होता है कि भाषण के बाद सतयुग आ जायेगा। एक प्रोफेसर साहिब को मैंने आदत सुधारने का निवेदन किया तो उन्होंने अत्यंत दिलचस्प उत्तर दिया ‘हम तो कक्षा में भी चालीस मिनट बोलते हैं’। काम की बात के लिए 8-10 मिनट का भाषण बहुत है। राग दरबारी को कौन सुने? जाने-माने लोग भी बुढ़िया और संत की कथा छेड़ कर बैठ जाते हैं। एक थी बुढ़िया... उसका पोता गुड़ बहुत ज्यादा खाता था। विज्ञान ने मोबाइल दिया, अब मिस काल मारने वालों का क्या करें? वारिस शाह की हीर बड़े कड़वे सत्य को बयां करती हैं। आदतों संबंधी इस फरिश्ते द्वारा लिखा सत्य पत्थर पर लकीर की तरह है।

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