दृष्टिहीन बना सकता है सिगरेट का धुआं


 धूम्रपान के कारण हृदय रोग, सांस संबंधी बीमारियां व कैंसर जैसे गंभीर रोगों की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। हाल ही में हुए शोधों से यह सामने आया है कि धूम्रपान व आंखों संबंधी बीमारियां, मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और आयु बढ़ने के साथ होने वाली आंखों की मांसपेशियों पर पड़ने वाले प्रभाव, जो आंखों में रेटिना को प्रभावित करता है, में गहरा संबंध है।  तम्बाकू में निकोटिन होती है और निकोटिन ओप्टिक नर्व या दृष्टि की नसों के लिए जहर के बराबर है। लंबे समय तक इसके सेवन से नसों की क्षति के कारण अंधेपन तक की नौबत आ सकती है। निकोटिन आंखों की नसों की क्षमता को कम कर देती है।  ’फ्री-रेडिकल्स से तो शायद सभी परिचित हैं। ये शरीर में स्वस्थ सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं। धूम्रपान फ्री-रेडिकल्स को बढ़ाता है और एंटीआक्सीडेंट के स्तर को कम करता है और आंखों को नुकसान पहुंचाता है। इनके बढ़ने से हृदय रोग, कैंसर व आंखों संबंधी रोगों की संभावना बढ़ती है।  आयु बढ़ने के साथ होने वाले परिवर्तनों की गति को तेज करने में इन कणों का ही हाथ होता है। कई शोधों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि फ्री-रेडिकल्स के नुकसान को कम करने के लिए हमें अपनी डाइट में विटामिन व मिनरल युक्त खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए क्योंकि इनसे हमें एंटी आक्सीडेंट प्राप्त होते हैं पर आँखों को सुरक्षा देने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है धूम्रपान का त्याग क्योंकि धूम्रपान के कारण ही मोतियाबिंद होने की संभावना दुगुनी हो जाती है व ’मैक्यूलर डिजेनरेशन‘ की भी संभावना बहुत अधिक होती है। ’मैक्यूलर डिजेनरेशन‘ का कोई इलाज नहीं पर धूम्रपान न करके आप अपनी आंखों को इससे सुरक्षा दे सकते हैं। मेक्यूलर डीजेनरेशन के इलाज में लेज़र ट्रीटमेंट का सहारा लिया जाता है पर इससे कोई खास सुधार नहीं हो पाता। मैंक्यूलर डीजेनरेशन की प्रक्रि या भी कई वर्षों तक होती रहती है और इसका पता भी वृद्धावस्था में चल पाता है। आंखों के विशेषज्ञ आँखों के क्षतिग्रस्त होने की स्थिति का पता एक साधारण टेस्ट से लगा लेते हैं इसलिए अगर आप ऐसा पाएं कि आपकी एक आँख से आपको ठीक दिखाई नहीं दे रहा या आप अपनी आंख के केन्द्र में कोई गाढ़ा  या स्लेटी पैच पाएं तो तुरन्त आंखों के विशेषज्ञ से सम्पर्क करें। (स्वास्थ्य दर्पण)

-सोनी मल्होत्रा