इन्सानियत


वह एक निहायत शरीफ -सा दिखने वाला इंसान था और एक होटल का मालिक था। होटल से उसे ठीक-ठाक आमदनी हो जाती थी। उसका गुजारा चल जाता था। घर-परिवार में उसका कोई नहीं था। मां-बाप चल बसे थे। भाई-बहन कोई थे नहीं और विवाह उसने किया नहीं था। उसकी एक खासियत थी। अपने होटल में आने वाले हर विकलांग को वह मुफ्त में खाना खिलाता था। किसी विकलांग के आग्रह करने पर भी वह उससे कोई पैसा नहीं लेता था। कई सालों तक इसी तरह विकलांगों को खाना खिलाकर उसने बहुत पुण्य कमाया था। विकलांगों के दिल से उसके लिए दुआएं निकलतीं। उसकी एक और आदत थी। सुबह हर रोज वह चिड़ियों को दाना-पानी देता था। उसके होटल के सामने तड़के दाना चुगने के लिए पंछियों के झुंड के झुंड इकट्ठा होते थे। उनकी चहचहाहट से पूरा वातावरण भर जाता था। ग्राहक आने तक वह दाना चुगते पंछियों को निहारता रहता था, इस काम में उसे गजब का सुकून मिला करता था। एक दिन एक सज्जन ने उससे पूछा आप हर विकलांग को मुफ्त में खाना क्यों खिलाते हो? इससे तो आपको काफी नुकसान उठाना पड़ता होगा? इस पर होटल मालिक उससे बोला,‘ हर रोज दाना चुगती इन चिड़ियों को मैं देखता हूं। कई बार मैंने देखा कि किसी भी अपाहिज चिड़िया के आसपास का दाना अन्य चिड़ियाएं नहीं चुगतीं। जब पहली बार मैंने यह देखा, तो मुझे लगा कि चिड़िया होकर भी वे विकलांगों का इतना ख्याल रखती हैं तों मैं तो इंसान हूं। मैं सोचने लगा कि विकलांगों के लिए मैं क्या कर सकता हूं। मुझे लगा कि अपने होटल में विकलांगों को मैं मुफ्त में खाना खिला सकता हूं।’ तभी से मैंने इस राह पर चलना शुरू किया उसकी बात सुनकर वह सज्जन नतमस्तक हो गए।

-धर्मपाल डोगरा, ‘मिन्टू’