उप-चुनावों में अकाली-भाजपा नेता एक-दूसरे की सहायता के लिए सक्रिय


अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल का ताज़ा बयान है कि अकाली दल बादल और भाजपा की एकता पूरी तरह मज़बूत है। इनको कोई अलग नहीं कर सकता। जहां तक हमारी जानकारी है, अकाली दल फगवाड़ा और मुकेरियां दोनों सीटों के उप-चुनाव में अब भाजपा की जी-तोड़ सहायता कर रहा है और इस बात को अब भाजपा नेता भी मानते हैं। भाजपा भी जितनी उसकी क्षमता है, जलालाबाद और दाखा विधानसभा सीटों के उप-चुनाव में अकाली दल की सहायता कर रही है। परन्तु ठीक उसी समय अकाली दल हरियाणा विधानसभा का चुनाव ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ लड़ रहा है। पंजाब में तो सुखबीर सिंह बादल ने कहा है कि अकाली दल तो पहले भी हरियाणा में भाजपा से अलग ही चुनाव लड़ता रहा है और अब भी लड़ रहा है, यह एक आम बात है। 
परन्तु सच्चाई यही है कि इस बार हरियाणा में इंडियन नैशनल लोकदल की हालत खराब होने के कारण और चौटाला परिवार में पारिवारिक फूट होने के कारण अकाली दल ने पूरा जोर लगाया कि किसी तरह हरियाणा में भाजपा अकाली दल के लिए तीन-चार सीटें छोड़ दे, परन्तु बताया जाता है कि भाजपा के अपने जमा-घटाव और चुनाव सर्वेक्षण यह संकेत दे रहे थे कि यदि भाजपा ने अकाली दल के साथ हरियाणा में चुनाव समझौता किया तो सतलुज-यमुना लिंक नहर तथा कुछ अन्य मुद्दों पर भाजपा को नुक्सान हो सकता है। दूसरी तरफ यह डर भी बना हुआ था कि यदि अकाली दल चुनाव मैदान से पूरी तरह बाहर हो जाता है तो कहीं हरियाणा का सिख वोट 2017 के पंजाब विधानसभा के चुनावों की तरह कांग्रेस की तरफ ही न खिसक जाए।  चर्चा है कि इसी उधेड़बुन में भाजपा ने एक तरफ अकाली दल के साथ समझौता नहीं किया और दूसरी तरफ हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी ओम प्रकाश चौटाला को पेरोल पर भेजने का प्रबंध करवाया। गौरतलब है कि आजकल आमतौर पर जेल में बंद किसी राजनेता को पेरोल पर रिहा होने और राजनीति में सक्रिय हिस्सा नहीं लेने दिया जाता। परन्तु ओम प्रकाश चौटाला ने जेल से बाहर आकर कानून का सहारा लेकर अपनी पेरोल बढ़वा ली और अदालत ने भी पेरोल देने के समय किसी तरह की सक्रियता पर कोई रोक नहीं लगाई। इस बीच चौटाला ने लगभग दो दर्जन चुनाव रैलियां की परन्तु भाजपा सरकार ने उनका कहीं भी विरोध नहीं किया।  समझा जाता है कि भाजपा यही चाहती थी कि चौटाला और अकाली दल में चुनाव समझौता हो जाए ताकि दोनों दलों की एकजुट ताकत भाजपा विरोधी वोटों के एक बड़े हिस्से को बांटने में सफल रहे। कुछ क्षेत्र यह समझते हैं कि भाजपा अपनी चाल में सफल रही परन्तु राजनीतिक क्षेत्रों में अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल द्वारा पंजाब में भाजपा-अकाली दल गठबंधन को अटूट बताने तथा हरियाणा में भाजपा की हार सुनिश्चित बताने की दोहरी रणनीति पर कई सवाल उठाये जा रहे हैं। स. बादल हरियाणा में तो यहां तक कह गए थे कि सिरसा और फतेहाबाद ज़िलों में भाजपा एक भी सीट नहीं जीतेगी और रोहतक में भाजपा की हालत और भी खराब है। अब वास्तविकता क्या है, इसका पता तो 24 अक्तूबर को हरियाणा विधानसभा चुनावों के परिणामों को देखकर ही लग सकेगा।
कालांवाली सीट पर अकाली दल का सारा जोर
हरियाणा में चाहे अकाली दल तीन सीटों पर चुनाव लड़ रहा है परन्तु अकाली दल का सारा जोर हरियाणा में अपने एकमात्र किले कालांवाली विधानसभा सीट पर लगा हुआ है। अकाली नेता इसको जीतने के लिए पूरी शक्ति भी लगा रहे हैं। गौरतलब है कि यह सीट 2008 में हुए नए सीमांकन में पहली बार बनी थी। अब से पहले इस सीट पर दो बार चुनाव हुआ है और दोनों बार ही अकाली दल यहां से विजयी रहा है। पहली बार अकाली दल के चरणजीत सिंह ने कांग्रेस के सुशील कुमार इन्दौरा को 13,000 से अधिक वोटों के अन्तर से हराया और फिर 2014 के विधानसभा चुनावों में भी अकाली दल के ही बलकौर सिंह ने कांग्रेस के ही शीशपाल केहर वाला को 13,000 से अधिक वोटों के अंतर से ही हराया था। परन्तु इस बार मौजूदा अकाली विधायक बलकौर सिंह भाजपा में शामिल होकर भाजपा का उम्मीदवार बन गए और बदले में अकाली दल ने अकाली नेता राजिन्द्र सिंह देसु जोधा जिनको पहले यहां से भाजपा उम्मीदवार माना जाता था, को अकाली दल में शामिल करके अकाली उम्मीदवार बना दिया। अब देखने वाली बात है कि अकाली दल हरियाणा का अपना एकमात्र किला बचाने में सफल रहता है अथवा नहीं?
तीन और ‘आप’ विधायक वापिसी की राह पर
अब जब विधानसभा से इस्तीफा देने वाले (जो अभी स्वीकृत नहीं हुआ) आम आदमी पार्टी के विधायक मास्टर बलदेव सिंह वापिस ‘आप’ में लौट आए हैं, तो पर्दे के पीछे की कहानी बताने वाले बताते हैं कि मास्टर बलदेव सिंह जो विधायक पद से इस्तीफा देकर सुखपाल सिंह खैहरा के नेतृत्व वाली ‘पंजाब एकता पार्टी’ द्वारा लोकसभा का चुनाव तक लड़ चुके हैं, का खैहरा से मोह भंग हो गया है। यह वापिसी की आन्तरिक कहानी जानने वालों के अनुसार मास्टर बलदेव सिंह को पार्टी में वापिस लाने की ड्यूटी पार्टी के विधानसभा में प्रमुख और विपक्ष के नेता हरपाल सिंह चीमा ने दो विधायकों मनजीत सिंह बिलासपुर तथा कुलवंत सिंह पंडोरी की लगाई थी। इस बीच यह दोनों मास्टर बलदेव सिंह के घर भी गए और स्वयं मास्टर बलदेव सिंह भी बाद में इनमें से एक के घर गए बताए गए हैं। इस तरह वापिसी का फैसला होने के बाद ही मास्टर और आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष भगवंत मान के बीच सरसरी बातचीत में इस फैसले पर मोहर लगा दी गई। इस बीच यह दोनों विधायक मनजीत सिंह बिलासपुर और कुलवंत सिंह पंडोरी ‘आप’ के तीन अन्य बागी विधायकों के साथ भी घर-वापिसी की बातचीत चला रहे बताए जाते हैं। यह तीनों अलग-अलग ज़िलों से विधायक हैं। इनमें से दो चंडीगढ़ के निकटतम क्षेत्रों तथा एक बठिंडा से संबंधित हैं। हमारी जानकारी के अनुसार आम आदमी पार्टी के राज्य अध्यक्ष भगवंत मान इन तीनों में से दो को तो वापिस लेने के लिए सहमत हैं, परन्तु तीसरे विधायक के बारे में हिचकिचा रहे हैं। बताया गया है कि मान समझते हैं कि आम आदमी पार्टी में फूट की कहानी की पटकथा इसी विधायक ने विपक्ष का नेता बनने के लालच में लिखी थी। यह भी पता चला है कि पार्टी के कुछ अन्य नेता भी इस विधायक की वापिसी का विरोध कर रहे हैं।
नवजोत सिंह सिद्धू भक्ति में लीन
हालांकि आमतौर पर यह समझा जाता है कि जो राजनेता सक्रिय राजनीति से लगातार दूर रहे, वह लोगों के स्मरण से भूल जाता है। परन्तु पंजाब के पूर्व मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बारे में यह बात सत्य नहीं लगती, क्योंकि वह लम्बे समय से राजनीति में सिर्फ चुप ही नहीं है, अपितु वह किसी सार्वजनिक समारोह तो दूर, पत्रकारों तक के सम्पर्क में भी नहीं हैं। वह कपिल शर्मा शो में भी हिस्सा नहीं ले रहे। यहां तक कि इस बार दशहरे के अवसर पर अमृतसर में कुछ लोगों ने उनके खिलाफ गत वर्ष दशहरे के अवसर पर हुए हादसे के दौरान रोष-मार्च भी किया। परन्तु उन्होंने कोई प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की। यह भी चर्चा है कि कांग्रेस हाईकमान ने उनको हरियाणा विधानसभा चुनावों में स्टार प्रचारक बनने के लिए कहा, तो उन्होंने यह कहकर जवाब दे दिया कि उन्होंने तो पंजाब की सेवा करने का प्रण लिया है। यदि मैंने पंजाब में ही नहीं कुछ करना तो हरियाणा चुनावों में मेरा क्या काम? परन्तु इसके बावजूद नवजोत सिंह सिद्धू अभी भी लोगों के स्मरण से गायब नहीं हुए, अभी भी उनकी भविष्य की राजनीति के बारे में सबसे अधिक सवाल पूछे जा रहे हैं। हमारी जानकारी के अनुसार सिद्धू सही समय के इन्तज़ार में हैं, और अपने घर अमृतसर में ही हैं।  पता चला है कि उनका सारा दिन कसरत और प्रभु भक्ति में ही गुजरता है। यह भी पता चला है कि इस बीच उन्होंने अपना लगभग 20 किलो वज़न भी कम कर लिया है।

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