बचपन क्यों उदास है ?


पूदृश्य पूरा साल हमारे सामने होता है। उतना ही जटिल और परेशान करने वाला जितना वह असल में होता है परन्तु हमें उसकी जटिलता को बखान करने का विश्लेषण करने का अवसर साल बाद ही मिलता है। क्यों भला? मसलन हमारे सामने हैं अस्वस्थ बचपन की दुश्वारियां परन्तु बाल दिवस (14 नवम्बर) तक हम दम साधे पड़े रहते हैं। जबकि गलियों, बाज़ारों, बस अड्डों, स्टेशनों पर रोज सामना होता है कुपोषण से बीमार बचपन से टूटते सपनों से। अस्पतालों के बरामदों तक आते तो हिम्मत जवाब देने लगती है। कैप्रिहैंसिव नैशनल न्यूट्रीशन सर्वे (सी.एन.एन.एस.) हमें जगा रहा है कि आधुनिक जीवनशैली और खान-पान में हो रहे बदलाव के कारण हमारा देश कुपोषण और मोटापे के साथ ही ़गैर-संचारी रोगों से पीड़ित होता जा रहा है। सी.एन.एन.एस. का सर्वे देश के बच्चों और किशोरों के रोगों के अध्ययन पर ही आधारित है। सर्वे पिछले कुछ दशकों से समाज में हो रहे तीव्र आर्थिक और सामाजिक बदलाव की ओर इंगित करता है। बच्चों के खान-पान और उनसे होने वाले रोगों का अध्ययन किया गया है, यह न भूलें कि खान-पान और उनसे होने वाले रोग काफी हद तक हमारे सामाजिक परिवेश का हिस्सा होते हैं जो आर्थिक हालात को भी स्पष्ट करते हैं। रिपोर्ट इसलिए भयभीत करने वाली समझी जाएगी क्योंकि पिछले कुछ सालों में बच्चों और किशोरों में हाइपरटेंशन, शूगर तथा किडनी से संबंधित लोगों में इज़ाफा हुआ है।यूनीसेफ की रिपोर्ट का रुख करें तो भारत में कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के करीब दस लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया के देशों में बहुत ज्यादा है। इस दावे का विरोधाभास देखिए राजनीतिक स्तर पर दावे हो रहे हैं कि हम विश्व की पांचवीं-छठी अर्थ-व्यवस्था है लेकिन हम अपने नागरिकों की भूख मिटाने में असफल सिद्ध रहे हैं। एक तरफ भारी मात्रा में अनाज सम्भालने की ठीक जगह न होने से बर्बाद हो रहा है। दूसरी तरफ भूख की समस्या पर काबू नहीं पाया जा सका। विडम्बना यह भी है कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में मंगल तक निशाना बांधने वाले इस भारत देश में मनुष्य की बेसिक ज़रूरत भूख पर पूरा नियंत्रण नहीं हो पाया। अब अर्थ-व्यवस्था वैश्विक हो गई है। इस वैश्विक अर्थ व्यवस्था ने आर्थिक असमानता में भरपूर इज़ाफा किया है। यह दिखने में शायद अच्छा लगता है, परन्तु प्रभाव में बहुत खुश है कि बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों के फास्ट फूड आउटलेटस तो हर जगह चमकते दिख सकते हैं किन्तु अभावग्रस्त निर्धन बच्चों की पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाने की कोई ठोस, व्यापक, लगातार चलने वाली व्यवस्था का नितांत अभाव है। वैश्वीकरण नगरीकरण ने हेमं डिब्बाबंद खाद्य की तरफ धकेला है। पारम्परिक भोजन, मौसमी फलों, सब्जियों के उपभोग की प्रवृत्ति काफी कम हुई है। इससे मोटापे की, पेट की बीमारियों की शिकायतें बड़ी है। जो बच्चे स्कूल में टिफिन लेकर जाते हैं उनमें मैदे के ब्रेड के स्लाइस ही अक्सर दिये जाते हैं या फिर उच्च मध्य वर्ग के बच्चे कंटीन में ही अनाप-शनाप खाते देखे जाते हैं जो असभ्यकारी होता ही है। किसी भी सभ्य समाज या किसी देश के लिए कुपोषण बड़ी बदनामी का कारण होगा। भारत को इस आमानी से नहीं निपट सकने वाली समस्या को एक मिशन बना कर खत्म करने की चुनौती सामने है। हालांकि 2022 तक समाधान का लक्ष्य बनाया गया है। यदि एक बच्चा कुपोषित पैदा होता है तो उसकी मां की सेहत भी ठीक नहीं रही होगी। गरीबी, अशिक्षा, अज्ञानता ने हमारी राहों को मुश्किल बनाया है। गर्भावस्था में यदि एक महिला का ध्यान नहीं रखा जाता, उसका आहार सही नहीं है तो बच्चा स्वरूप में जन्मा नहीं ले सकता। बच्चा ही नहीं मां का स्वास्थ्य भी ज़रूरी है ताकि बच्चे का पालन-पोषण ठीक से हो सके। हम चीज़ों को एकांगी रूप में नहीं देख सकते। भारत का संविधान अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के साथ भोजन का अधिकार भी उपलब्ध करवाता है और बच्चे ही आने वाले कल में कदम उठाकर नया सवेरा लाने वाले हैं। इस उदास बचपन को फूल की तरह खिलाने के लिए कुपोषण के विरुद्ध जंग ज़रूरी है।