उर्दू और हिंदी में अलगाव और साझेपन के हाशिये
खालिद अमीर खान गंडापुर की ‘एक्सप्रेस ट्रिब्यून’, पाकिस्तान (19 सितम्बर 2012) में एक रपट प्रकाशित हुई है। उसमें यह चिंता जाहिर की गई है कि ‘क्या हिंदी पाकिस्तान की राष्ट्र-भाषा होती जा रही है?’
‘पाकिस्तान टुडे’ में इस पर मोहर लगाने वाली कुछ और ‘खबर कथाएं’ भी प्रकाशित हुई हैं, जिन में यह कहा गया है कि पाकिस्तान में लोग, उर्दू की बनिस्वत ‘हिंदी’ का इस्तेमाल, बोलचाल की भाषा के तौर पर ज्यादा करते हैं। इन रपटों में इसके कारण बताये गये हैं— पाकिस्तान में बच्चों के द्वारा देखे जाने वाले हिंदी के कार्टून चैनल तथा हिंदी या हिंदुस्तानी की फिल्में। इन्हें ‘पाबंदी’ लगाकर ‘देखे जाने से रोकना’ अब मुमकिन नहीं रह गया है।
यहां गौरतलब बात है कि पाकिस्तान की कुल जनसंख्या का केवल आठ प्रतिशत हिस्सा ही ऐसा है, जो उर्दू को अपनी ‘पहली’ या ‘बुनियादी’ भाषा के रूप में इस्तेमाल करता है। इस लिहाज से देखा जाए तो उर्दू का इस्तेमाल प्राथमिक तौर पर करने वालों की तादाद, भारत में पाकिस्तान के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
दूसरी बात यह भी रेखांकित करने लायक है कि भारत में जो लोग उर्दू का अपनी प्राथमिक भाषा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, वे भी इसे ‘देवनागरी लिपि’ की मार्फत ही पढ़ते-लिखते हैं।
यही स्थिति पाकिस्तान की भी है। वहां बहुसंख्यक लोग पंजाबी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। वे इसे शाहरूखी लिपि में दर्ज करते हैं। परन्तु इसके बावजूद अब वहां उर्दू को ‘उर्दू’ बनाने वाली मूल अरबी-फारसी-तुर्की भाषाओं को पढ़ने और समझने वालों की संख्या बेहद कम रह गई है। सामान्य-जन में शायद ही कोई ऐसा हो जो अरबी-फारसी का जानकार हो।
मौजूदा दौर में वैश्विक संदर्भों के बरअक्स हमें हिंदी की स्थिति का आकलन ठीक उस शक्ल में करना होगा, जो उसकी ‘जमीनी हकीकत’ की तरह प्रस्तुत हो रही है। उसे समझने के लिये उसके इतिहास को भी देखना होगा, ताकि हम अनुमान लगा सकें कि विकास किस दिशा में हो रहा है?
जैसे-जैसे वक्त बीतता जाता है, हिंदी और उर्दू के बीच का ‘बनावटी विभाजन’ अपनी अर्थवत्ता को खोता दिखाई देने लगा है। हम अपने इस समय में गहरा रही सांप्रदायिक मानसिकता, कट्टरपंथी प्रवृत्तियों और आतंकवाद की ओर रुख करते मूलवाद से उत्तरोत्तर और-और चिंतित तो होते ही रहते हैं। ऐसे में हमें भाषा के तल पर प्रकट हो रही सरहदों को मिटा देने वाली जमीनी हकीकत की ओर भी थोड़ा ध्यान देने की ज़रूरत है।
इस बदले परिदृश्य का विश्लेषण करेंगे तो हम पाएंगे कि कट्टरताओं और विभाजनवादी प्रवृत्तियों के अमानवीय रूपों के स्रोत, सत्ता के आरोपित समीकरण ही अधिक है। जबकि लोग बदल रहे हैं। वे हमारे इस पूरे दक्षिण एशियायी परिदृश्य में जमीनी तौर पर किसी ‘सांझी भाषा’ की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसी भाषा की ओर जो इस पूरे ‘महा-प्रदेश’ की सांझी संस्कृति की भाषा है।
कभी इसे ‘हिंदुस्तानी’ या ‘रेख्ता’ कहा जाता था। हिंदी और उर्दू को उसी के भीतर से निकली दो उप-भाषाओं या एक ही भाषा के दो ‘भिन्न रजिस्टरों’ के रूप में ही अमूमन देखा जाता रहा है। पर भाषायी विकास की जमीनी हकीकत उस स्थिति से एक कदम आगे निकल आई है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, हिंदी या हिंदुस्तानी के स्रोतमूलक भाषायी रजिस्टर, अब अपनी व्यापक प्रचलन-मूलक प्रासंगिकता को खोने लगे हैं। ये स्त्रोत, यानी हिंदी का संस्कृत की ओर उन्मुख होना और उर्दू का अरबी, फारसी व तुर्की की ओर रुख करना- ये दोनों प्रेरक होने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।
हिंदी और उर्दू को दो अलग भाषाओं जैसा रूप देने वाले ये स्रोतमूलक रजिस्टर, अब दो कारणों से अपने ‘विभाजक’ या ‘अलहदगी पसंद’ रूप को खोते जा रहे हैं। एक यह कि इन्हें प्रासंगिक बनाने वाला ‘उग्र राष्ट्रवाद’, अब शक्ल बदल रहा है। वह अब ‘दो पड़ोसी देशों की अलग पहचान या अस्मिता को बनाये रखने’ के सवाल से ज्यादा अहमियत नहीं रखता है। पुनरुत्थानवादी हिंदू-महासभा और मुस्लिम लीग की विरासत, ‘उग्र राष्ट्रवादी मानसिकता’ को बनाए बचाए रखने से ज्यादा, अब भारत और पाकिस्तान के विकास और प्रगति की संभावनाओं के सवालों की ओर अधिक रुख कर रही है। अब तो बस, अलग होने की वजह से, एक-दूसरे को घूरते हुए, दो मुल्क हैं, जो आमने-सामने दिखाई देते हैं। भाषा के तल पर भारत की फिक्र यह है कि हिंदी को विश्व-भाषा के रूप में और अधिक कैसे विकसित किया जा सकता है।
और उधर पाकिस्तान को ज्यादा खतरा इस बात का सताता है कि ‘अलहदगी’ को बनाए रखने वाली उर्दू के स्वरूप की हिफाजत कैसे की जाए? उसे अपने स्त्रोतों से दूर हो जाने से कैसे रोका जाए? ताकि उसके हिंदी में विलय होने की संभावना छूत की बीमारी की तरह फैलने ना लगे। अत: उर्दू-पक्षीय उग्रता अब, अलहदगी की बजाय, ‘अलग पहचान या अस्मिता’ को विकसित करने की, फिक्र ज्यादा करने लगी है। परन्तु भाषा, एक तल पर विश्व की संस्कृति का एक अंग भी होती है। इस वजह से हुआ यह है कि वैश्वीकरण की ओर उन्मुख मीडियाकरण ने भौगोलिक सरहदों को गिराना शुरू कर दिया है। ऐसे हालात में ‘उर्दू’ के लिये उर्दू की तरह बने-बचे रहने का एक बड़ा संकट पैदा हो गया है।
दूसरी बात ज्यादा बुनियादी है। उसकी जड़ें हिंदी के इतिहास में हैं। उस ओर जाते ही, भाषागत अलहदगी की धारणा के पैरों तले की जमीन खिसकने लगती है।
यह हम सभी जानते हैं कि रेख्ता या हिंदुस्तानी का, अरबी-फारसी मिश्रित उर्दू के तौर पर अधिक इस्तेमाल 1790 के बाद के कालखंड से ताल्लुक रखता है। इससे यह लगने लगा कि उर्दू, हिंदुस्तानी या हिंदी से कोई अलग जुबान है। इसके लिये दिल्ली-आगरा की मुगल फौजियों छावनियां अधिक जिम्मेवार थीं। वे अपने बिखर रहे शासन को बचाने का यह ‘अभिजात-वर्गीय तरीका’ अपना रही थीं। अरबी-फारसी-तुर्की बोलने वाले सामंतों-नवाबों की तहजीब को बचाये-बनाये रखने के लिए भाषा के एक खास रूप को गढ़ा गया। वह दरपेश बिखराव से उबरने के लिये एक ‘सांस्कृतिक विकल्प’ खोजने जैसी बात थी। ‘उर्दू’ शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ भी बही था- छावनी या दुर्ग की भाषा।
तो, यह जो ‘उर्दू जुबान’ है, वह उस नवाबी मानसिकता की पर्दादारी है, जो 18वीं-19 वीं शती में हिंदी से एक अलग जुबान की तरह होने-दिखने की कोशिश कर रही थी। वह ‘मुगल साम्राज्य के बिखराव के हालात के भीतर से उपजती है। यानी, उर्दू, हिंदुस्तानी के भीतर से उपजने वाला, उसी का एक ‘थोड़ा अलग’ भाषा-रजिस्टर भर है। इसका ताल्लुक एक बिखराव कालीन या पतनशील सत्ता-विमर्श से है। यह इस्लाम-केन्द्रित मुगलिया सत्ता-विमर्श से जुड़ी, बिखराव काल में जन्म लेने वाली जुबान है। (क्रमश:)
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