41 साल बाद

4 दशक से अधिक समय बाद सज्जन कुमार बारे आया फैसला राहत देने वाला है। इसकी बड़े स्तर पर प्रशंसा हुई है और अदालतों में सिख भाईचारे का पुन: विश्वास बना है। 31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर दी गई थी। पहली नवम्बर को देश की राजधानी दिल्ली और अन्य अनेक स्थानों पर दंगे शुरू हो गये थे, जिनमें सिख भाईचारे के साथ संबंधित लोगों को निशाना बनाया गया था। इन दंगों को नरसंहार का नाम भी दिया गया है। अकेले दिल्ली शहर में ही सिख भाईचारे से संबंधित 2700 से अधिक लोगों को भड़की भीड़ द्वारा बुरी तरह प्रताड़ित करके मार दिया गया था। तीन दिन तक इसी तरह दंगाइयों द्वारा मौत का नंगा नाच किया जाता रहा था, पर समय की कांग्रेस सरकार ने इससे आंखें मूंद रखी थीं। 
अत्याचार की इस दास्तान की दुनिया भर में चर्चा होती रही है। सरकार दंगाइयों के साथ थी। कांग्रेसी नेता इस भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। जायदाद, गुरुद्वारे और घर जलाए जा रहे थे पर इस बड़े कत्लेआम के बाद भी तत्कालीन सरकार ने इन दंगों में शामिल अपने नेताओं को पूरी तरह सुरक्षा देने का यत्न किया और लूटमार करती भीड़ संबंधी आंखें मूंद रखीं। उसी समय मानवाधिकारों का दम भरते हुए कुछ सुचेत संगठनों ने दिल्ली में हुए इस घटनाक्रम संबंधी चश्मदीद गवाहों के आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित करवाई गईं, जिनकी बड़े स्तर पर चर्चा हुई। कुछ दर्जन केस भी दर्ज किये गये और बाकी सभी घटनाक्रमों को दबा दिया गया। बाद में कई कमिशन भी बने, उनकी रिपोर्टों को भी धीरे-धीरे सबूत न मिलने का बहाना बनाकर खारिज़ कर दिया गया। कुछेक दोषियों को छोटी मोटी सज़ाएं मिलीं। एक अपराधी किशोरी लाल बुचड़ को फांसी की सज़ा भी हुई जो बाद में खारिज़ कर दी गई। दिल्ली पुलिस ने चलते केसों को आधारहीन और जानहीन बना दिया और इन दंगों से संबंधित बहुत सी फाइलें भी बंद कर दीं, जिससे भाईचारे के शरीर पर लगे जख्म नासूर बनते गये।
केन्द्र में साल 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद 2015 में गृह मंत्रालय द्वारा इस संबंधी एस.आई.टी. (सिट) का गठन करके पुन: जांच शुरू करवाई गई। इन दंगों से संबंधित फाइलों को पुन: खोला गया ताकि पीड़ित परिवारों को राहत मिल सके। समय बीतने और तत्कालीन शासकों द्वारा तथ्यों को हर ढंग तरीके से छुपा देने के कारण यह काम और भी मुश्किल हो गया था। इसी कारण 8 जुलाई, 1994 को दिल्ली की एक अदालत ने सज्जन कुमार के विरुद्ध सबूत न होने के कारण आरोप पत्र दाखिल करने से मना कर दिया था। चाहे 8 मई, 2000 को नानावती आयोग भी गठित किया गया था पर उसमें से भी बहुत कुछ हासिल न हो सका। 2014 में केन्द्र में सरकार बदलने के साथ पुन: बंद पड़े केसों को दोबारा खोला गया, जिससे इन्साफ मिलने की उम्मीद पुन: बंध गई। इसी की एक अहम कड़ी के तौर पर सज्जन कुमार को सज़ा सुनाई गई है। इससे पहले भी 17 दिसम्बर 2018 को 5 सिखों की हत्या करने के बाद गुरुद्वारा साहिब को जला दिये जाने के मामले में सज्जन कुमार आरोपी पाया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसम्बर, 2018 को उसको ताउम्र कैद की सज़ा सुनाई थी। अब 2 सिखों की हत्या और अन्य कई मामलों में दोषी ठहराये जाने के बाद उसके विरुद्ध अलग-अलग सख्त सज़ा का ऐलान किया गया है और दो मामलों में उसको दोहरी ऊमर कैद की सज़ा सुनाई गई है। सज्जन कुमार 80 साल का है और अनेक बीमारियों से ग्रस्त है। एक कारण यह भी बताया गया है कि उसको फांसी की सज़ा नहीं सुनाई गई। हम जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के धन्यवादी हैं वहीं तमाम उन संस्थाओं और सहयोगियों का भी धन्यवाद करते हैं, जो आज भी निरंतर इन दंगों के पीड़ितों को इन्साफ दिलाने के लिए यत्न कर रहे हैं।

    —बरजिन्दर सिंह हमदर्द

#41 साल बाद