वक्फ संशोधन बिल का प्रभाव

आज देश में ही नहीं, विश्व भर में केन्द्र सरकार द्वारा पेश किए गए वक्फ संशोधन बिल की चर्चा हो रही है। वक्फ से संबंधित वह सम्पत्ति होती है जो इस्लाम में धार्मिक या सामाजिक कार्यों के लिए दान दी गई होती है। एक बार जब कोई सम्पत्ति वक्फ कर दी जाती है तो उसे बेचा या तोहफे के रूप में नहीं दिया जा सकता। उसको सिर्फ दर्ज उद्देश्यों के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इस समय रेलवे और सेना की विशाल ज़मीनों के बाद वक्फ के पास ही देश में सबसे अधिक सम्पत्तियां हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में वक्फ बोर्ड के पास 8.72 लाख सम्पत्तियां हैं। राज्यों में 9 लाख एकड़ ज़मीन पर वक्फ बोर्ड का अधिकार है। 32 राज्यों व केन्द्र शासित राज्यों में सिर्फ 25 राज्यों में ही 8.72 लाख वक़्फ बोर्ड की सम्पत्तियां हैं। इसके कामकाज़ को सुचारू ढंग से चलाने के लिए ब्रिटिश शासन के समय से ही कानून बनते रहे हैं। आज़ाद भारत में भी वर्ष 1954 और 1995 में बने कानूनों के अनुसार वक्फ को सिर्फ मुसलमान ही बना सकते हैं, जिसमें 2013 में कानूनी संशोधन करके किसी भी व्यक्ति को सम्पत्ति वक्फ करने अभिप्राय दान देने की इजाज़त दी गई थी।
केन्द्र में भाजपा की बहुमत वाली राजग की सरकार बनने के बाद पहले वर्षों में तो सरकार इस मामले पर चुप रही, परन्तु बाद में उसे मुसलमानों के प्रति मोह जागा और वक्फ संशोधन बिल तैयार किया गया। पिछले वर्ष इसे लोकसभा में पेश किया गया था, परन्तु विपक्षी दलों द्वारा उठाई गई कड़ी आपत्ति के बाद इसे संसद की संसदीय समिति के पास और विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श के लिए भेज दिया गया। इस समिति में विपक्षी दलों के सदस्यों ने कई एतराज़ उठाए। उन्होंने अब भी यही कहा है कि उनके ज्यादातर एतराज़ों को सरकार की ओर से दृष्टि-विगत कर दिया गया है। लोकसभा में इसे पेश करते हुए अल्पसंख्यकों से संबंधित मंत्री किरण रिजिजू ने यह कहा है कि पहले सरकार और फिर संसद की संयुक्त समिति ने इस पर विचार-विमर्श किया है। चाहे उन्होंने यह कहा कि इस बिल के कानून बनने पर वक्फ मामलों में मुसलमानों के अतिरिक्त कोई और हस्तक्षेप नहीं कर सकता, परन्तु साथ ही उन्होंने कहा कि बिल में जो चैरिटी कमिशन की व्यवस्था की गई है, उसका काम सिर्फ यह देखना है कि वक्फ बोर्ड और उसके तहत आने वाली ज़मीनों का प्रबन्ध ठीक ढंग से हो रहा है या नहीं, परन्तु इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि वर्ष 2013 में किए गए संशोधन के अनुसार कोई भी व्यक्ति वक्फ कर सकता है परन्तु नए बिल में यह जोड़ा गया है कि 5 वर्ष से इस्लाम धर्म की पालना करने वाला व्यक्ति ही वक्फ (ज़मीन-जायदाद का दान) कर सकता है और यह भी कि नए बिल में इस्लाम के सभी समुदायों के प्रतिनिधियों को वक्फ में स्थान दिया जाएगा और यह भी कि इसके बेहतर प्रबन्ध से देश के ़गरीब मुसलमानों का कल्याण होगा और उन्हें ऊपर उठने में सहायता मिलेगी। पहले वक्फ बोर्डों में सिर्फ मुसलमान ही प्रबन्धकों के रूप में शामिल होते थे। अब केन्द्रीय वक्फ परिषद में 22 सदस्य होंगे, जिनमें से 4 सदस्य ़गैर-मुस्लिम होंगे, इसके अतिरिक्त तीन सांसद और 10 सदस्य मुस्लिम समाज के होंगे। 2 सेवानिवृत्त उच्च जज होंगे और अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्धियां हासिल करने वाले 4 व्यक्ति और शामिल होंगे। भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव और संयुक्त सचिव भी शामिल होंगे। मुस्लिम समाज के 10 सदस्यों में 2 महिलाओं का होना भी ज़रूरी है। इसी तरह राज्यों के वक्फ बोर्डों के 11 सदस्य होंगे। इनमें 3 ़गैर-मुस्लिम होंगे। बार कौंसिल का एक सदस्य और राज्य सरकार का ज्वाइंट सचिव इसमें शामिल होंगे। 4 मुस्लिम सदस्यों में 2 महिलाएं होंगी।
विपक्ष के नेताओं का यह आरोप है कि सरकार सुनियोजित रणनीति के अनुसार समाज को बांटने की राजनीति कर रही है और इस तरह मुस्लिम समाज के एक तरह से धार्मिक अकीदों में हस्तक्षेप बढ़ाने का यत्न कर रही है। आज उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब तक जिस तरह का माहौल बना दिया है, उसमें हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के लोग पूरी तरह विभाजित हुए दिखाई देते हैं। प्रतिदिन इसी दिशा में ही योगी आदित्यनाथ के बयान आ रहे हैं। इस समय उत्तर प्रदेश में ही वक्फ से संबंधित ज्यादातर सम्पत्तियां है, जिनमें लगभग सवा लाख सम्पत्तियां हैं। इनमें से लगभग एक लाख 20 हज़ार सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास और 50 हज़ार से अधिक शिया वक्फ बोर्ड के पास हैं।
नि:संदेह मुसलमान समुदाय में इस बिल के आधार पर जो कानून बनने वाला है, उस संबंध में अनेक आशंकाएं पैदा हो गई हैं उनमें से बहुसंख्यक इसे मुसलमानों के आंतरिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप मान रहे हैं। आज देश में अलग-अलग धर्मों से संबंधित अनेक संस्थान चल रहे हैं। उनके पास बड़ी सम्पत्तियां हैं। कई धार्मिक स्थानों के पास करोड़ों-अरबों के सम्पत्तियां हैं, परन्तु उनमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं है। बाबरी मस्जिद गिराने के बाद केन्द्र सरकार की ओर से 1991 में यह कानून बनाया गया था कि देश को आज़ादी मिलने के समय अलग-अलग धार्मिक स्थानों का जो स्थान था, उसे छेड़ा नहीं जाएगा, परन्तु इसके बावजूद आज प्रतिदिन किसी न किसी धार्मिक स्थान को लेकर बड़े विवाद पैदा करने का यत्न किया जा रहा है, जिसने उपरोक्त बिल के संबंध में आशंकाओं को और भी बढ़ा दिया है।
शिव सेना के नेता उद्धव ठाकरे जो कभी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का दम भरते थे, की ओर से यहां तक कहा गया है कि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा मुस्लिम समाज के प्रति ‘दिखाई गई चिन्ता’ पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना तक को शर्मिन्दा करने के समर्थ है। यह भाजपा की ओर से वक्फ ज़मीनों को छीनने की साजिश है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ने केन्द्र में तीसरी बार जीत हासिल की है और सहजपूर्ण सरकार चल रही है। फिर भी वह हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों को क्यों उठा रही है? हम समझते हैं कि ऐसे बिल को पास करवा कर और ऐसी नीतियां धारण करके केन्द्र सरकार एक बार फिर समाज में ऐसा तनाव पैदा कर रही है, जिसके देश के लिए बेहद दूरदर्शी परिणाम निकल सकते हैं।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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