सोशल मीडिया से प्रचारित ऩफरत की भाषा

कुछ समय पहले तक गलियों-मोहल्लों में खाट बिछाकर एक दूसरे की दु:ख-तकलीफ जानने का माध्यम आया था परन्तु आज सोशल मीडिया के कारण यह दृश्य देखा नहीं जा सकता। सोशल मीडिया ने जीवन को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। हंसी-खुशी के साथ मिल बैठने की जगह सीमित कर मनुष्य के विवेक को अपने ढंग से घृणा की तरफ मोड़ दिया है। इस मायाजाल ने मनुष्य को उसकी मूलभूत समस्याएं भूलने और विद्रोह तथा घृणा में उलझने पर मजबूर कर दिया है। यह सूरत-ए-हाल स्वाभाविक नहीं, कुत्रिम है। हम पर लादी जा रही है। कहा जा रहा है कि इस दौर में मूर्खतापूर्ण और अश्लील रील बनाना सबसे आसान हो गया है।
 लाइक और व्यूज़ का सीधा संबंध कमाई से हो गया है तो टिक-टॉक के बाद हर माध्यम का अपना स्टार रोज़ पैदा हो रहा है। कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि दो ही तरह के लोग रह गए हैं। एक वे जो रील बना रहे हैं और दूसरे वे जो देख रहे हैं। कहानीकार प्रियदर्शन ने चिंता प्रकट की कि जो लोग पहले मोहल्ले और चौपालों में समय बिताते थे वे अब रील और वीडियो देख कर समय काट रहे हैं। यह रील और वीडियो संस्कृति इसलिए और भी ज्यादा ़खतरनाक है कि इसका ज्यादातर हिस्सा पोर्न सामग्री से भरा पड़ा है और स्त्रियों को बहुत अपमानजनक और सतही ढंग से बस उपभोग की वस्तु में बदलता है। इन दिनों स्त्रियों के साथ होने वाले अपराधों में जो उछाल आया है और उसमें नाबालिगों का जो हिस्सा दिख रहा है, उसकी एक वजह यह रील और वीडियो (एप) संस्कृति भी है जिसमें दैहिक क्रूरता के फूहड़ रूप बिल्कुल चरम पर दिखते हैं। यह एक बड़ा सवाल है कि इससे निजात कैसे पाई जाए।
कवि बोधिसत्व की यह बात सकारात्मक है कि नए माध्यमों यानी मोबाइल का प्रसार अभी और बढ़ेगा। अभी स्क्रीन पर लिखित साहित्य का पूरी तरह आना बाकी है। वह पेड कंटेंट के रूप में हो या अनपेड कंटेंट के रूप में, लेकिन उसके प्रभाव का भी आकलन होना अभी बाकी है। किसी तरह की हड़बड़ी करने से कोई प्रतिफल आने वाला नहीं है। हमें केवल यह देखना है कि समाज अपने लिए क्या खोज रहा है और हम उसे क्या दे पा रहे हैं और उस तक न पहुंचे इस दिशा में क्या तैयारियां हैं। हमें सेंसर करने की जगह बेहतर रील, बेहतर साहित्य और बेहतर संगीत देने की योजना बनानी चाहिए। 
हमें याद रखना चाहिए कि जब पंजाब में पंजाबी के दोहरे अर्थों वाले मायनों का प्रदर्शन बढ़ रहा था तब नाटककार गुरशरण सिंह ने उसके बुरे प्रभाव की काट के लिए नए गीत तैयार करवाए थे और मंच का सार्थक उपयोग करने की राह पर कदम बढ़ाया था। एक बात और जिसकी तरफ ध्यान दिलाया जा रहा है। रील का विवेकवान लोगों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेने की ताकत।  बताया जा रहा है कि एक बार क्लिक करने के बाद वह एक ऐसी अप्रत्याशित और अंतहीन दुनिया का दरवाज़ा खोल देती है कि उससे बाहर एकदम निकल पाना मुश्किल हो जाता है। इसके असर में लिखने-पढ़ने वाली आबादी भी आ गई है। रील ने लोगों का आस्वाद बदल कर रख दिया है। आप लगातार स्क्रॉल करते चले जाते हैं किसी मनमाफिक कंटेंट की तलाश में। दु:खद परिस्थिति यह है कि ऐसे में कुछ पल के लिए आपको खुद पता नहीं चलता कि आप क्या देख रहे हैं। क्यों देख रहे हैं? आपको क्या नहीं देखना चाहिए था। यह विचार बाद में आता है कि आपने समय भी नष्ट किया और सहज भी नहीं रह पाए अलबत्ता विकृतियों के शिकार बने।

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