लोकतंत्र बनाम राजशाही : खतरनाक मोड़ पर नेपाल
भारत इस समय अपने पड़ोस के हिसाब से उबलते हुए कडाहों के बीच खड़ा दिख रहा है। आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान नाम का प्रेत उसके पीछे पड़ा है जिसे बार-बार सबक सिखाने के बावजूद भी वह बाज नहीं आता। 1971 के विभाजन एवं बांग्लादेश निर्माण के बाद लंबे समय तक यह दर्द आधा रहा क्योंकि बांग्लादेश भारत के साथ रहा लेकिन बांग्लादेश का रुख भी समय-समय पर बदलता रहा है एवं वह भी मौका मिलते ही भारत को आंख दिखाता रहा है।
नेपाल जोकि हर तरह से भारतीय सभ्यता संस्कृति तथा भौगोलिक सीमाओं की दृष्टि से भी भारत के सबसे नज़दीक रहा है उसके भी रुख में परिवर्तन दिखाई दिया और वह भी चीन के प्रभाव में आता दिखाई दिया है। वहां पेड़ के पत्तों की तरह बदलती हुई सरकारों के साथ जब पुष्प कमल दहल प्रचंड के हाथ में सत्ता आई तो भारत का जबरदस्त विरोध हुआ मगर उनका हश्र अच्छा नहीं रहा।
अब एक बार फिर से नेपाल चर्चा में है और इस बार चर्चा का सबब है वहां महज़ 16-17 साल बाद ही लोकतंत्र के प्रति अविश्वास दिखाते हुए राजशाही के पक्ष में एक हिंसक जन आंदोलन खड़ा हो गया है और इन आंदोलनकारियों की मांग है कि नेपाल में पुन: राजशाही की स्थापना हो एवं उसे हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाए।
विश्व में कुछ ही देश ऐसे हैं जहां हिंदू धर्म के अनुयायी बाहुल्य में है। इनमें से नेपाल और भारत सबसे महत्वपूर्ण हैं। भारत में हिंदू जनसंख्या लगभग 80 प्रतिशत है। भारत हिंदू धर्म का जन्मस्थान है। यहां हिंदू संस्कृति, त्योहार, परंपराएं और मंदिरों की भरमार है। हालांकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन हिंदू धर्म यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में गहराई से जुड़ा हुआ है जबकि नेपाल में हिंदू जनसंख्या लगभग 81 प्रतिशत है। नेपाल ही कभी एकमात्र घोषित हिंदू राष्ट्र था मगर 2008 में नेपाल को राजशाही से गणराज्य धर्मनिरपेक्ष घोषित कर दिया गया। हालांकि आज भी नेपाल की अधिकांश आबादी हिंदू है।
1990 के दशक से ही नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र की मांग हो रही थी जिसके चलते 1990 में संवैधानिक राजतंत्र स्थापित हुआ। 1996 से 2006 तक माओवादियों का सशस्त्र संघर्ष चला जिसमें उन्होंने राजशाही को हटाकर लोकतंत्र की स्थापना की मांग की। 2001 में सनसनीखेज ढंग से राजा बीरेन्द्र और उनके परिवार की हत्या के बाद राजा ज्ञानेन्द्र ने सत्ता संभाली। इस घटना से जनता में राजशाही के प्रति अविश्वास बढ़ा। यह विश्वास और भी मुखर तब हुआ जब 2005 में राजा ज्ञानेन्द्र ने लोकतांत्रिक सरकार को बर्खास्त कर सत्ता अपने हाथ में ले ली, इससे जनता में असंतोष बढ़ा। 2006 में नेपाल में व्यापक जनआंदोलन हुआ, जिसमें प्रमुख राजनीतिक दलों और नागरिकों ने भाग लिया। इसके परिणामस्वरूप राजा ज्ञानेन्द्र को सत्ता छोड़नी पड़ी और 2008 में नेपाल को गणराज्य घोषित कर दिया गया।
इस तरह नेपाल में लोकतंत्र की तो स्थापना हो गई लेकिन वहां इन वर्षों में कभी भी लंबे समय तक एक स्थाई सरकार नहीं रह पाई और देश ने इस छोटे से कालखंड में ही 11 प्रधानमंत्री बनते देखे। इस फेल्योर के चलते वहां की जनता त्रस्त रही एवं विकास की गाड़ी भी तेज़ी से नहीं दौड़ पाई जिसके सपने जनता को लोकतंत्र की स्थापना के समय दिखाए गए थे।
बी.पी. कोइराला के बाद से तो ऐसा लगा कि जैसे राजनीतिक दलों ने तय कर लिया था कि किसी भी व्यक्ति को साल डेढ़ साल से अधिक प्रधानमंत्री पद पर टिकने ही नहीं देंगे। के.पी. शर्मा ओली एवं पुष्प कमल दहल प्रचंड को छोड़ दें तो कोई भी प्रधानमंत्री 2 वर्ष से अधिक का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। अब चाहे वह गिरिजा प्रसाद कोइराला रहे हो या बाबूराम भट्टराई, कुछ तो ‘आज आए और कल गए’ की तर्ज पर आते-जाते रहे। कह सकते हैं कि नेपाली लोकतंत्र ने जनता को निराश किया और इसके चलते धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में भी उनकी आस्था घटती गई क्योंकि उनको लगता है कि राजशाही के नियंत्रण में यदि लोकतांत्रिक सरकार बनी तो उन्होंने काफी अच्छा काम किया जबकि स्वतंत्र रूप से बनने वाली सरकारें न टिकी और न ही काम कर पाई। इसी निराशा के चलते हाल के वर्षों में नेपाल में एक वर्ग राजशाही की पुन: स्थापना की मांग करने लगा। राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ ही बढ़ती बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान जनता राजशाही को एक स्थिर विकल्प के रूप में देखने लगी। नेपाल की सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाएं भी इसकी वजह बनी। आज नेपाल के कई समूह उसे फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने का ख्वाब देखने लगे हैं और इसके लिए राजशाही की वापसी को ज़रूरी मानते हैं।
कुछ लोग मानते हैं कि नेपाल में राजशाही व्यवस्था स्थिरता और राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है। हालांकि यह भी उल्लेखनीय है कि जब 2001 में राजशाही परिवार का कत्ल हुआ, तब ज्ञानेंद्र पर ही सबसे अधिक उंगलियां उठी थी एवं यह माना गया था कि राज परिवार हत्याकांड में उनकी प्रमुख भूमिका थी लेकिन उनके राजा बनने के चलते यह सब बातें नेपथ्य में चली गईं। बाद में उन्हें मजबूर होकर देश को लोकतांत्रिक राज्य घोषित करना पड़ा लेकिन वहां के नेताओं की महत्वाकांक्षाओं एवं जनता के असंतोष के चलते एक बार फिर से उनकी अपील पर लोग सड़क पर उतरे हुए हैं। हालांकि राजशाही समर्थक आंदोलन को अभी तक भी बहुत व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला है लेकिन यदि नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है तो यह आंदोलन और तेज़ होने की संभावनाएं बलवती लगती हैं यद्यपि यह भी सच है कि नेपाल के संविधान और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में राजशाही की वापसी आसान नहीं होगी।
अब यह मांग भले ही पूरी न हो लेकिन यह आंदोलन इस बात को ज़रूर रेखांकित करता है कि यदि लोकतंत्र में नेता केवल अपने व दलगत स्वार्थों को ही पूरा करने में लगे रहेंगे तो फिर उनका टिके रहना संभव नहीं है और ऐसे में वे कालपार हो चुकी राजशाही तक से भी उम्मीदें लगा बैठते हैं। इस घटनाक्रम को देखते हुए भारत को भी सजगता पूर्वक नेपाल के घटनाक्रम पर कड़ी निगाह रखनी होगी।