कैसीनो

fम त्र चतुरमल के जोर देने पर आत्माराम गोवा चलने के लिए मजबूरन राज़ी हुए। कुल 33 लोगों का ग्रुप था, जिसमें नौजवानों की संख्या अधिक थी। नदी के किनारे पर बने हैरिटेज को देखकर आत्माराम का तन-मन तृप्त हो गया। चारों ओर हरियाली थी। शोर-शराबे से दूर शांत वातावरण में सभी आनंदित होकर उछलकूद कर रहे थे। नाच, गा रहे थे। सभी को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे किसी कार्यक्रम में मेहमानों की तरह उपस्थित हैं। वहां पर एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जा रहे थे। हैरिटेज का पूरा स्टाफ हर तरह से अच्छी सेवा दे रहा था। हंसी-मज़ाक में पलक झपकते ही दो दिन कैसे बीते, किसी को पता नहीं चला। आत्माराम ने अपने जीवन में जिन व्यंजनों का नाम तक नहीं सुना, उनका स्वाद चखने का मजा ले रहे थे। ग्रुप में और भी कुछ लोग थे जोकि सिर्फ सैर-सपाटे के लिए आए थे।
दूसरे दिन रात को सभी इकट्ठे बैठकर, बारी-बारी अपने संस्मरण या हंसी-मज़ाक की बातें सुनाकर सबका मनोरंजन कर रहे थे। आत्माराम की बारी आयी तो उन्होंने एक सुनी हुई लघुकथा सुनाई। संक्षेप में कहानी का सार यह था कि एक राजा के दरबार में तीन जनों को लाया जाता है। रोज़ाना दारू पीकर, बीवी-बच्चों के साथ बुरा व्यवहार करने वाले को राजा 6 महीने की सज़ा सुनाते हैं। विवाहित होते हुए भी वेश्याओं के पास जाने वाले को 12 महीने की सज़ा सुनाते हैं। तीसरा जुआरी निकलता है। उसके बारे में राजा कुछ भी सुनने को राज़ी नहीं होते। उसे फांसी का दंड देते हैं। जुआरी प्रार्थना करता है कि उसे मृत्यु दंड न देकर आजीवन कारावास की सज़ा सुनाएं। राजा दलील देकर उसे योग्य ठहराते हुए अपने निर्णय पर अडिग रहते हैं।
आत्माराम की बात पूरी होने पर एक बुजुर्ग उठकर ताली बजाकर उन्हें दाद देते हैं। सभी आश्चर्यचकित होकर उन्हें निहारने लगते हैं। सबकी जिज्ञासा शांत करने के लिए वे कहते हैं, इस ग्रुप में दो-तीन लोग ऐसे भी हैं जो हर वर्ष इस ग्रुप के साथ इसलिए आते हैं कि कोई उन पर संदेह न कर सके और वे कैसीनो में जाकर जुआ खेल सकें। जीतने के इरादे से आते हैं और हजारों, लाखों लुटाकर, हारकर ही लौटते हैं। पता नहीं इनकी लत कब छूटेगी? इनकी तरह मेरा बेटा भी यहां हर वर्ष आकर हारता था। एक बार लाखों रुपये हार गया। उसे चुकाने के लिए हमें अपना बंगला बेचकर अट्टालिका में रहना पड़ रहा है। मैं सभी से हाथ जोड़कर बिनती करता हूँ कि गोवा ज़रूर आते रहें लेकिन कैसीनो। 
उसके आगे वे बुजुर्ग कुछ बोल न सके। उनकी आंखें नम हो चुकीं थी। जो लोग कैसीनो में जाते थे, शर्म के मारे उनकी गरदनें झुकने लगीं। 

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