प्यार की खातिर बॉलीवुड को छोड़ने वाली राजश्री
राजश्री की प्रेम कथा ऐसी है जैसे उसे 18वीं शताब्दी के किसी रोमांटिक उपन्यास से निकाल लिया हो। वह अपने करियर की बुलंदियों पर थीं। तभी राज कपूर की फिल्म ‘अराउंड द वर्ल्ड इन एट डॉलर्स’ (1967) की शूटिंग के सिलसिले में उन्हें अमरीका जाना पड़ा। वहां रहते हुए उनकी मुलाकात एक अमरीकी छात्र ग्रेग चैपमैन से हुई। दोनों में प्यार हो गया। तीन साल की कोर्टशिप के बाद वे दोनों परम्परागत भारतीय विवाह के बंधन में बंध गये। भारत में आयोजित यह विवाह समारोह पांच दिन तक चला था। इसके बाद राजश्री सब कुछ बीच में छोड़कर अपने पति के साथ अमरीका चली गईं और वहीं स्थायी रूप से बस गईं।
उस समय राजश्री के पिता वी. शांताराम अपनी फिल्म ‘बूंद जो बन गई मोती’ पर काम कर रहे थे, जो निर्माण के शुरुआती दौर में थी। राजश्री इस फिल्म की हीरोइन थीं। लेकिन जब वह इस फिल्म को बीच में ही छोड़कर चली गईं तो शांताराम को अपनी आंखों पर विश्वास न हुआ। वह यह मानने के लिए तैयार न थे कि उनकी बेटी ने उन्हें धोखा दिया, जिसे उन्होंने अपनी फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों’ से लांच किया था। फिल्म के हीरो जितेंद्र, जो राजश्री के करीबी दोस्त थे, ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया, ‘अच्छी बात यह थी कि शांताराम जी राज (राजश्री का प्यार का नाम) को लेकर चिंतित नहीं थे कि उन्होंने एक अमरीकी से शादी कर ली। वह फिल्म को लेकर चिंतित थे। उन्होंने अपनी बेटी से कहा कि तुम्हें जो करना है करो और मेरी लीड हीरोइन के तौर पर मुमताज़ को साइन कर लिया।
राजश्री अब अपना वैवाहिक जीवन अपने पति व बेटी चंद्रिका चैपमैन के साथ अमरीका में व्यतीत कर रही हैं। लास एंजेल्स में एक हाई-एंड कस्टम टेलरिंग शॉप है। राजश्री ने ग्रेग के साथ अमरीका में बसने पर कभी अफसोस नहीं किया। राजश्री 1960 के दशक की सुपरस्टार थीं। उन्होंने शम्मी कपूर के साथ ‘जानवर’, ‘ब्रहमचारी’ आदि सफल फिल्मों में काम किया और अपनी सुंदरता, अभिनय प्रतिभा व नृत्य कौशल से सभी को प्रभावित किया। राजश्री जानेमाने फिल्मकार वी. शांताराम (जिन्होंने डा. कोटनिस की अमर कहानी और अमर भोपाली जैसी फिल्मों का निर्देशन किया) और उनकी दूसरी पत्नी जयश्री की बेटी हैं। जयश्री भी अभिनेत्री थीं और ‘नाईटमेयर इन रेड चाइना’, ‘चोरों का चोर’ जैसी सफल फिल्मों के लिए विख्यात थीं। राजश्री ने लगभग दो दर्जन फिल्मों में काम किया, जिनमें ‘सुहागरात’, ‘सगाई’, ‘गीत गाया पत्थरों ने’, ‘शेहनाई’ आदि शामिल हैं।
मराठी फिल्मकार वी. शांताराम ने तीन शादियां कीं। अपनी पहली पत्नी विमला को तलाक देने के बाद उन्होंने विख्यात अभिनेत्री जयश्री से शादी की, जिनसे उनके तीन बच्चे हुए- किरण चन्द्रा (मराठी फिल्म निर्देशक), अभिनेत्री राजश्री और तेजाश्री। लेकिन बाद में उन्हें अपनी फिल्म ‘नवरंग’ की हीरोइन संध्या से प्यार हो गया और उन्होंने जयश्री को तलाक देकर संध्या से शादी कर ली। इस तलाक पर बाद में जयश्री ने कहा था, ‘अब मैं पिंजरे से निकाले गये पंछी की तरह हूं और मुझे खुशी है कि एक स्वतंत्र कलाकार के रूप में मैं अन्य फिल्मों में काम कर रही हूं।’ राजश्री ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1964 में अपने पिता की फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ से की, जिसके लिए उनकी तारीफ भी हुई और वह मशूहर भी हो गईं। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त हिट रही और राजश्री की अलग पहचान बन गई। वह अन्य कलाकारों जैसे शम्मी कपूर, बिस्वजीत, जॉय मुख़र्जी, जितेंद्र आदि के साथ फिल्में करने लगीं। ‘शहनाई’ सहित उनकी अधिकतर फिल्में सफल रहीं और उनका शुमार उस दौर की टॉप अभिनेत्रियों के साथ किया जाने लगा। वह अपने कॅरियर के शिखर पर थीं जब उन्होंने शादी करके फिल्मोद्योग को छोड़ने का फैसला किया।
दिलचस्प यह है कि राजश्री ने अपने पिता की फिल्म को तो बीच में ही छोड़ दिया था और फिर कभी बॉलीवुड में काम नहीं किया, लेकिन फिल्मों में उनकी दिलचस्पी बराबर बनी रही है। वह ‘हैक-ओ-लैंटर्न’ ‘टेंटिड लव’ और ‘मानसून’ फिल्मों की सहायक निर्देशक थीं और उन्होंने बच्चों के वीडियो ‘अशोक बाई अनदर नेम’ का नरेशन भी किया है। गौरतलब है राजश्री ने बाल कलाकार के रूप में भी फिल्मों में काम किया है, 1954 की फिल्म ‘सुबह का तारा’ में वह हीरो की छोटी बहन की भूमिका में थीं। वह उस समय 10 साल की थीं। राजश्री का जन्म 8 अक्तूबर 1944 को बॉम्बे (अब मुंबई) में हुआ था। हालांकि अब उनकी चर्चा अपनी समकालीन अभिनेत्रियों जैसे वहीदा रहमान, आशा पारिख आदि की तरह नहीं होती है, लेकिन अपनी सफल फिल्मों के कारण भारत के सिनेमा इतिहास में उनकी विशिष्ट जगह अवश्य है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर