धरती की पीड़ा

दूर-दूर तक न कोई वृक्ष, न कोई पौधा। यहां तक कि घास का एक तिनका भी नहीं दिखाई दे रहा था। चारों ओर रुखी सूखी धूल ही धूल उस पर एक बूढ़ी महिला फटेहाल कपड़े में कराहती हुई-सी बैठी थी। उस समय आकाश में बिजली चमकी। बूढ़ी महिला ने बड़ी आशा भरी नज़रों से आकाश की ओर देखा बिजली की नज़र उस बूढ़ी महिला पर पड़ गई। वह लहराती हुई नीचे उतर आयी।
‘ऐ अम्मा, तुम कौन हो? और इतने दर्द से क्यों कराह रही हो?’ बुढ़िया के पास बैठकर बिजली ने पूछा।
‘मैं तो धरती हूं बेटा। पर तुम कौन हो?’ कराहते हुए महिला ने जवाब दिया। ‘अरे आप धरती मां हो...मेरा नाम बिजली है। मैं आकाशीय बिजली हूं। ...धरती मां, आप इतना कराह क्यों रही हो? आपको क्या कष्ट है?’
‘बेटा मैं बहुत प्यासी हूं। वर्षा न होने के कारण सब कुछ नष्ट होते जा रहा है। अब तो प्यास के कारण मेरा भी अंत निकट आ गया लगता है।’ लम्बी कराह के साथ धरती मां बोली।
‘मां, आप हिम्मत रखिए। मैं जाकर फौरन बादल को भेजती हूं।’ कहती हुई बिजली वापस चल दी।
थोड़ी ही देर में आकाश घने काले सफेद बादलों से भर गया। धरती मां आशा भरी नज़रों से टकटकी लगाकर बादल को देखने लगी। बड़ी देर तक सिवाये गरजने के कुछ नहीं हुआ। धरती मां के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने कातर दृष्टि से बादल की ओर देखते हाथ जोड़ दिये। बेचैन होकर बादल तेजी से नीचे उतर आया। धरती मां का हाथ पकड़ कर अपने माथे से लगाकर बोला, ‘मां, मुझे शर्मिंदा मत करो। मैं बहुत मजबूर हूं। मेरे पास एक बूंद पानी नहीं है। मैं क्या करुं?’
‘तुझे क्या कहूं बेटा, मेरी अपनी चार बेटियां है सर्दी, गर्मी, बसंत और वर्षा। एकदम नियम से वो आती जाती थी। कोई न कोई मेरे पास बनी रहती थी। मेरी देखभाल करती थी। मेरा श्रृंगार करती थी। परंतु उन्होंने भी आना छोड़ दिया। सर्दी, गर्मी तो अभी आ जाती हैं परन्तु इनका भी आने-जाने का कोई समय नहीं रह गया है। इसी कारण प्रकृति के सारे नियम गडमड हो गये हैं।’ धरती मां ने एक गहरी सांस ली।
‘मां आपकी बेटी बसंत मुझे मिली थी। आपसे पास आने को बहुत बेचैन थी। बादल बोला। तो आती क्यों नहीं बेटा? उसे कौन रोक रहा है?’ धरती मां ने पूछा।
‘यहां की परिस्थिति मां। बेचारी बता रही थी कि जब से ओजोन की पर्त में छेद हुआ है, यहां के वायुमंडल में सूर्य की तेज किरणें आ गई है। वो उसके कोमल शरीर को झुलसा देती है। गर्मी यहां से जाती नहीं, वर्षा आती नहीं। ऐसे में उसके साथ आने वाले उसके नन्हें-नन्हें बच्चे जिन्हें हम फल-फूल कहते हैं, गर्भ में ही नष्ट हो जाते हैं। इसी से घबरा कर वो नहीं आती।’
‘ओह? ...’ धरती मां के मुंह से आह निकल गई।
‘मां, मैं जाकर वर्षा बहन को बुलाता हूं। उन्हीं के आने से कुछ होगा।’ कहता हुआ बादल आकाश की ओर चल दिया।
कुछ ही देर बाद रिमझिम करती हुई वर्षा आकर मां के पास बैठ गई। मां की दयनीय दशा देख वह रोने लगी और बोली-
‘मां ये क्या हाल हो गया आपका?’
‘तुम मेरे लिए रो रही हो? मेरे सारे धरती पुत्र इससे भी बुरे हाल में हैं। पानी और दाने को तरस रहे हैं। बीमारियां फैलती जा रही है। ...तुम पानी क्यों नहीं बरसाती बेटी?’ कहते-कहते धरती मां की सांस फूल गई।
‘कहां से लाऊं पानी मां? ...ये सब तुम्हारे इन्हीं धरती पुत्रों के कारण हो रहा है।’
‘मैं समझी नहीं वर्षा।’ आश्चर्य से धरती मां अपनी बेटी को देख रही थी। जिसे वो दोषी समझती थी वो स्वयं को निर्दोष बता रही थी।’ मां वर्षा के लिए जल की आवश्यकता होती है। ये जल हमें जलाशयों और पेड़-पौधों से मिलता है। परंतु आपके ये धरती पुत्र, वृक्षों को काटकर कंकरीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं। जलाशयों को पाटकर मकान और फैक्ट्री लगाते जा रहे हैं। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला प्रदूषित धुआं, पेड़-पौधों के लिए सांस लेना मुश्किल कर दे रहा है। वो बेचारे मरते जा रहे हें। फिर बताओ मां, हम जल कहां से लाये?’
परेशान होकर धरती ने वर्षा की ओर देखा, ‘ये तो बड़ी मुसीबत हो गई, पर कोई रास्ता होगा न बेटा?’
‘मेरे पास थोड़ा-सा जल है मां। मैं उसे तुम्हारे पास भेजूंगी पर तुम इन धरती पुत्रों को समझाओ, पर्यावरण की रक्षा करें। नहीं तो इनके साथ-साथ हम सब भी नष्ट हो जायेंगे।’ कहते हुए वर्षा उठी और धरती मां के चरण छू कर आकाश की ओर चल दी।
कुछ ही पलों में धरती पर मूसलाधर वर्षा होने लगी। धरती मां की प्यास बुझ गई थी। अब आगे का काम धरती पुत्रों के जिम्मे है।
 (सुमन सागर)

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