समय से संवाद करती संस्कृति बीकानेर का ऊंट उत्सव
राजस्थान की मरूस्थलीय आत्मा, जब परंपरा, लोकजीवन और आधुनिक समय से संवाद करती है, तब बीकानेर ऊंट उत्सव जैसा अनूठा सांस्कृतिक महोत्सव जन्म लेता है। यह आयोजित उत्सव केवल एक पर्यटन आयोजन भर नहीं है बल्कि उस सभ्यता का उत्सव है, जिसने ऊंट उत्सव को जीवन-सहचर बनाया। ऊंट मनुष्य के विकास क्रम में बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं। इसलिए ऊंट राजस्थान के जीवन में यात्रा, व्यापार, सुरक्षा और जीविका के हर मोड़ पर खड़ा मिलता है। आगामी 12-13 जनवरी 2026 को प्रस्तावित बीकानेर का ऊंट उत्सव, ऊंटों की इसी प्रासंगिकता और उनकी सांस्कृतिक उपस्थिति को राजस्थान की विशिष्ट संस्कृति के रूप में देश और दुनिया के पर्यटकों के सामने प्रस्तुत करता है। यह दो दिवसीय उत्सव परंपरा को मंच देता है और वर्तमान से उसका जीवन संवाद रचता है। इस उत्सव में सजे-धजे ऊंटों की भव्य परेड, ऊंट नृत्य, ऊंटों की सौंदर्य प्रतियोगिता और कौशल प्रदर्शन। ये सब गतिविधियां मिलकर रेगिस्तान की सौंदर्य भाषा को अनंत विस्तार देते हैं। लोकसंगीत, कालबेलिया और घूमर की थाप पर जब ऊंट लयबद्ध ढंग से चलते हैं, तो लगता है समय ठहर गया है और दर्शक इतिहास के साथ वर्तमान को एक फ्रेम में देख रहे हैं।
दो दिन का यह उत्सव आमतौर पर जनवरी के मध्य में होता है मगर अंतिम कार्यक्रम सारणी स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विभाग द्वारा घोषित किया जाता है। जैसा कि हम जानते हैं राजस्थान के थार क्षेत्र में ऊंट सदियों से जीवनरेखा रहा है। यात्रा, व्यापार, कृषि और रक्षा हर क्षेत्र में उसकी भूमिका निर्णायक रही है। बीकानेर रियासत के दौर में ऊंटों की नस्ल सुधार, उनकी साज-सज्जा और प्रशिक्षण की एक विलक्षण परंपरा विकसित हुई, जो आगे चलकर ऊंट उत्सव की आधुनिक प्रस्तुति की रूपरेखा तय किया। यह उत्सव न सिर्फ लोकस्मृति को मंच देता है बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी परंपरा से जोड़कर रखता है। इसके प्रमुख आकर्षण में भव्य ऊंट शोभा परेड, ऊंट नृत्य व करतब, ऊंट सौंदर्य प्रतियोगिता, ऊंट दौड़ व कौशल प्रदर्शन, लोकसंगीत/कालबेलिया व घूमर, शिल्प व खानपान मेला और दीप प्रज्वलन की सांस्कृतिक संध्या इस उत्सव में मूल आकर्षण होते हैं। ऊंट परेड में जहां सजे-धजे ऊंटों की भव्य व रंगीन परेड निकलती है, वहीं ऊंट नृत्य के तहत प्रशिक्षित ऊंट लोक धुनों पर लयबद्ध चाल के साथ चलते हैं। जबकि ऊंट सौंदर्य प्रतियोगिता के तहत ऊंटों की कद-काठी, साज-सज्जा और चाल-ढाल के आधार पर किसी को विजेता चुना जाता है। ऊंट दौड़ के कौशल प्रदर्शन में मरूस्थलीय मैदानों में गति और नियंत्रण का प्रदर्शन करते हुए ऊंट दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ढोलक, खड़ताल और अलगोजा की धुनों पर नृत्य करतीं राजस्थानी बालाएं कालबेलिया व घूमर नृत्यों पर राजस्थानी आत्मा का उत्सव प्रस्तुत करती हैं। इस महोत्सव में जो शिल्प व खानपान का उत्सव सजता है, उसमें ऊंट के ऊनी उत्पाद, कशीदाकारी, मिट्टी का शिल्प और बीकानेरी भुजिया, रसगुल्ला तथा घेवर का स्वाद पर्यटक बड़े चाव से ग्रहण करते हैं।
बीकानेर ऊंट उत्सव राजस्थान और देश के सांस्कृतिक उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इससे विरासत का संरक्षण संभव होता है। ऊंट पालन पारंपरिक साज-सज्जा और लोककला का दस्तावेजीकरण व मंचन होता है। इससे विलुप्त होती परंपराओं को नया जीवन मिलता है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक राजस्थान की लिविंग कल्चर देखते हैं, जिससे भारत की सॉफ्ट पावर को बल मिलता है। इस तरह हमारी वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक कूटनीति का डंका बजता है और इस महोत्सव में युवाओं की भागीदारी उन्हें आधुनिकता और परंपरा से परिचय कराता है। इस उत्सव में पर्यावरणीय चेतना का भी समावेश है। इन सब वजहों से बीकानेर का ऊंट उत्सव एक अनूठा उत्सव बन जाता है। इस उत्सव में शामिल होने के लिए अगर वर्तमान में सोच रहे हों तो सुबह की परेड और शाम की सांस्कृतिक संध्या में हिस्सा लेने से न चूकें। स्थानीयता का रस लेना भी इस उत्सव की खास खूबी है। इस उत्सव में लोक खानपान और हस्तशिल्प का जलवा देखने को मिलता है और हां, इस उत्सव में भाग लेने के लिए आने पर आसपास के दर्शनीय स्थलों की यात्रा भी इसके चलते हो जाती है। कुल मिलाकर बीकानेर का ऊंट उत्सव एक ऐसा उत्सव है, जिससे रंगीले राजस्थान की धज बनती है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर




