एआई के हल्ले के बीच पुस्तकों की बौद्धिक वापसी

53वां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026

जब पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के शोर शराबे में डूबी हुई है, ऐसे में 10 जनवरी 2026 से धुंध भरे मौसम में राजधानी दिल्ली में शुरु हो रहा, 53वां अंतर्राष्ट्रीय विश्व पुस्तक मेला, किताबों की बड़ी बौद्धिक वापसी की तरह है। एक ऐसे दौर में जब हर सवाल का पलक झपकते उत्तर, हर विषय पर मिनटों में आलेख, सेकंडों में सार और हर रचनात्मक प्रयास का ‘आटो जनरेटिड’ विकल्प मौजूद हो, उस समय ठिठुरती सर्दियों का नई दिल्ली पुस्तक मेला, एक गहरे और लगभग प्रतिरोधी अर्थ के साथ सामने आता है। यह मेला सिर्फ किताबों का नहीं बल्कि मानव बुद्धि, स्मृति और विवेक की वापसी का संकेत है। दरअसल 2024 तक आते-आते एआई हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है- लेखन, अनुवाद, पढ़ाई, रिसर्च यहां तक कि सोचने की प्रक्रिया में भी अब एआई का साथ अनिवार्य हो गया है लेकिन इस सुविधा ने एक खास तरह की थकान भी हमें दे दी है। यह थकान सिर्फ अधिक उत्पादन या अधिक नतीजों से नहीं आयी बल्कि हर चीज का रेडिमेड हो जाना, हर मौलिक प्रयास की जगह शॉर्टकट का ले लेना और हर गहराई के विकल्प के रूप में गति के उभरने से आयी है। 
ऐसे में एआई ओवर लोड के बीच शायद इंसान को यह एहसास होने लगा है कि सुविधा चाहे जितनी बढ़ गई हों, लेकिन संतोष बिल्कुल घट गया है। शायद यही वह घड़ी है, जहां किताबों ने बहुत सामयिक और सही जगह पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है। क्योंकि किताब हमेशा हर सवाल का रेडिमेड विकल्प ही नहीं बताती बल्कि वह अपने आपमें सवाल खड़े करने का रोमांच रचती है। इसलिए 53वां नई दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला अब तक के बाकी 52 मेलों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला सिर्फ अपने आयोजन की आधी सदी से ज्यादा बार की संख्या के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि इसका सबसे बड़ा महत्व इस बात से है कि यह लगभग पांच दशकों के अधिक की बौद्धिक निरंतरता का प्रतीक है। यह मेला- 
* पीढ़ियों को पढ़ने की स्मृति से जोड़ता है।
* तकनीक के बदलते दौर में विचारों की स्थिरता सुनिश्चित करता है।
* इसके साथ ही यह याद दिलाता है कि ज्ञान का कोई अपडेटिड वर्जन नहीं होता।
क्योंकि एआई हर पल अपने आपको अपग्रेड करता रहता है और यही उसकी सबसे बड़ी यूएसपी भी है लेकिन कोई किताब एक बार छपने के बाद वह तब तक ज्यों की त्यों होती है, जब तक कि वही किताब दूसरी बार नये सिरे से अब तक की यानी उसके छपने के बाद की नई जानकारियों और निष्कर्षों के साथ अपडेट नहीं होती। इस तरह जहां एआई में अपडेट होने की निरंतरता हर पल मौजूद रहती है, वहीं एक आम किताब के अपडेट होने की उम्र अनुमानत: एक दशक तो होती ही है। लेकिन किताबों का यही जादू है कि वह अपडेट हुए बिना भी ज्यों-ज्यों पुरानी होती जाती है, त्यों-त्यों ज्यादा खुलती जाती है और ज्यादा महत्वपूर्ण होती जाती हैं। एआई बनाम किताब में कुछ और महत्वपूर्ण फर्क हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है। मसलन एआई जहां डेट देता है, वहीं किताब अनुभव देती है। एआई जहां रेडिमेड जवाब के लिए तैयार रहता है, वहीं किताब सही मायनों में हमें सोचने की प्रक्रिया सिखाती है। 53वां विश्व पुस्तक मेला एक बार फिर इसी फर्क के साथ रूबरू होगा। जहां पाठक केवल जानकारी लेने नहीं आएंगे बल्कि वह खुद से संवाद भी करेंगे। 
इस मेले की एक बड़ी खासियत यह होगी कि यह पढ़ने को निजी क्रिया से निकालकर सार्वजनिक बौद्धिक अनुभव बना देने की दिशा की ओर कदम बढ़ायेगा-
* इस 53वें विश्व पुस्तक मेले में लेखक आमने-सामने संवाद करते नज़र आएंगे। 
* विचार धाराओं की टकराहट और स्पष्ट होगी।
* फिर भी असहमत के बीच शिष्ट बहस की सहमति बरकरार रहेगी।
* सबसे बड़ी बात जो इस पुस्तक मेले में होने जा रही है, वह है मंच से संबोधित करने वालों से युवाओं के तीखे सवाल।
क्योंकि एआई युग में संवाद ‘वन-वे’ होता जा रहा है। ऐसे में यह विश्व पुस्तक मेला फिर से संवाद की पुरानी ‘टू-वे’ और ‘मल्टी-वे’ परंपरा को जीवंतता के साथ प्रस्तुत करेगा। इस पुस्तक मेले में सिर्फ किताबें, उनका कंटेंट, उन पर होने वाली बातचीत ही नई नहीं होगी बल्कि पाठक भी कुछ बदला-सा नज़र आयेगा। 53वें विश्व पुस्तक मेले का पाठक केवल मनोरंजन या साहित्य सुख के लिए किताबों की टोह में नहीं जायेगा बल्कि बौद्धिक ईमानदारी की खोज में आयेगा। ऐसा होना स्वाभाविक ही है। पिछले कुछ सालों से खास पाठकों की तो छोड़िये, आम पाठक भी मशीनी शॉर्टकट कंटेंट से ऊब चुके हैं। इतिहास, दर्शन, समाज, विज्ञान और भविष्य को लेकर आम पाठक जिस अनहोनी की उथल-पुथल से दोचार है, उन सवालों के जवाब भी ढूंढ़ने की कोशिश 53वें विश्व पुस्तक मेले में होगी। ऐसा स्वभाविक है, क्योंकि जब से एआई ने हर सवाल का एक निश्चित जवाब प्रस्तुत करना अनिवार्य रूप से कर दिया है, तब लोग इस बात से भी बोर हो गये हैं कि कोई तो सवाल हो, जिसका जवाब एआई के पास न हो। कहने का मतलब यह कि इस पुस्तक मेले में पाठक अपने सवालों का जवाब ढूंढ़ने नहीं आएंगे, वह तो उन्हें एआई से नोट्स के जरिये ही मिल जाएंगे। इस पुस्तक मेले में तो पाठक किताबों की दूरदृष्टि से अपना फिर से भाईचारा जोड़ने की उम्मीद के साथ आएंगे।
चूंकि एआई का संसार मुख्यत: अंग्रेजी केंद्रित है और ध्यान से देखें तो सिर्फ इसकी एकरसता का कारण 90 प्रतिशत कंटेंट का अंग्रेजी अनुवाद होना भर नहीं है बल्कि इस ऊब का कारण यह है कि भाषाएं चाहे जितनी भी आप पलट लीजिए, ज्यादातर कंटेंट अंग्रेजी का अलग-अलग भाषाओं के अनुवाद के रूप में मिलता है लेकिन यह पुस्तक मेला एक साथ 10-12 भाषाओं की जोरदार मौजूदगी से भाषायी एकरूपता और अंग्रेजी के वर्चस्व से पैदा हुई ऊब को खत्म करेगा। 53वें विश्व पुस्तक मेले में भारतीय भाषाओं के वृहद साहित्य की मौजूदगी यहां पाठकों को नई ताजगी से रूबरू करायेगी और साबित करेगी कि अलग-अलग भारतीय भाषाओं में गंभीर नाम फिक्शन रचा जा रहा है, पुरजोर तरीके से समकालीन सामाजिक विमर्श भी हो रहा है तथा आत्मकथन और वैचारिक लेखन की भी कमी नहीं है।      -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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