कपूर परिवार के सबसे सफल हीरो थे त्रिलोक कपूर

कपूर खानदान निश्चितरूप से भारतीय सिनेमा का पहला परिवार है। चोपड़ा, मुखर्जी आदि फिल्मी खानदानों की तुलना में बॉलीवुड में सबसे लम्बा सफर कपूर खानदान का ही है, जो अभी तक जारी है। हालांकि कपूर खानदान के अधिकतर सितारों को बहुत अच्छी तरह से याद रखा गया है, लेकिन जिस व्यक्ति ने वास्तव में इस खानदान की भारतीय सिनेमा में नींव रखी और जिसने सबसे ज्यादा हिट फिल्में दीं उसे लगभग भुला ही दिया गया है। यह अलग बात है कि उसका बंगला आज भी मुंबई के यूनियन पार्क, चेम्बूर में मौजूद है, जिसे अब त्रिलोक कपूर मार्ग नाम दिया गया है। यह कहानी है कपूर खानदान के उस हीरो की जिसे भुला दिये गये और जो अपने समय में सबसे अधिक फीस लेने वाले एक्टर्स में शामिल था, लेकिन कभी भी सुपरस्टारडम का दर्जा न पा सका। 
पृथ्वीराज कपूर को कपूर खानदान का पितामह समझा जाता है, जोकि सही भी है, लेकिन वह हिन्दुस्तानी सिनेमा में हीरो की प्रमुख भूमिका निभाने वाले पहले कपूर नहीं थे। यह श्रेय जाता है उनके छोटे भाई त्रिलोक कपूर को। 11 फरवरी 1912 को पेशावर में पिता बशेश्वर नाथ कपूर की हवेली में जन्मे त्रिलोक अपने भाई पृथ्वीराज से छह बरस छोटे थे। वह पेशावर से पहले कोलकाता गये और फिर मुंबई आकर यहीं के होकर रह गये। उन्होंने अपना करियर 1933 में फिल्म ‘चार दरवेश’ में हीरो की भूमिका से शुरू किया और फिर कुछ माह बाद ही उनकी हिट फिल्म ‘सीता’ रिलीज़ हुई। उस समय तक पृथ्वीराज स्थापित एक्टर तो बन गये थे, लेकिन अधिकतर फिल्मों में खलनायक या सेकंड लीड के रूप में ही दिखायी दे रहे थे। 
त्रिलोक कपूर 1933 से 1947 तक हिंदी सिनेमा के प्रमुख एक्टर बने रहे और वह प्रति फिल्म सबसे अधिक फीस लेने वाले एक्टर्स में से थे। उन्होंने अपने समय की टॉप हीरोइनों के साथ काम किया, जिनमें नूरजहां, नलिनी जयवंत, सुशीला रानी पटेल, मीना शौरी और सुलोचना शामिल थीं। वह अन्य सितारों जैसे अशोक कुमार व करण दीवान के प्रतिद्वंदी थे। इसके बावजूद उन्हें कभी भी सुपरस्टार नहीं समझा गया। हालांकि उनके समकालीन जैसे अशोक कुमार और जूनियर जैसे दिलीप कुमार आसानी से दर्शकों के दिलों पर राज करने लगे। इस प्रकार की चाहत त्रिलोक कपूर को कभी न मिल सकी।
जब त्रिलोक कपूर ने अपने जीवन के 40वें बसंत में प्रवेश किया यानी 1950 के दशक में तो लीड भूमिकाएं उन्हें मिलना बंद हो गईं। उन्होंने अपना रुख धार्मिक फिल्मों की तरफ किया। वह ‘श्री राम भक्त हनुमान’ (1948) में भगवान राम बने और ‘रामायण’ (1954) में भगवान शिव बने। ये दोनों फिल्में बहुत कामयाब हुईं और त्रिलोक कपूर के लिए इस किस्म के चरित्र निभाने के लिए नया रास्ता बन गया। वह अनेक फिल्मों में भगवान कृष्ण की भूमिका में नज़र आये। भगवान शिव के रूप में त्रिलोक कपूर और पार्वती के रूप में निरूपा राय की बहुत सफल स्क्रीन जोड़ी 1950 के दशक में बनी। दोनों ने साथ 18 फिल्में कीं। अपने 1933 में डेब्यू से लेकर 1960 के दशक के शुरुआत तक त्रिलोक कपूर 30 से अधिक फिल्मों में लीड एक्टर थे। यह संख्या अन्य कपूर सितारों से अधिक है, मसलन शम्मी कपूर ने 28 फिल्में, राज कपूर ने 17 फिल्में और रनबीर कपूर ने अभी तक11 फिल्में ही हिट दी हैं। चूंकि त्रिलोक कपूर की अधिकतर हिट फिल्में कम-बजट व लो-स्केल की थीं, इसलिए अपने पूरे करियर में वह कभी सुपरस्टार नहीं बने। त्रिलोक कपूर एक्टर के अतिरिक्त निर्माता भी थे। उन्होंने टीके फिल्म्स के नाम से अपना प्रोडक्शन हाउस स्थापित किया था, जिसके बैनर तले अनेक सफल फिल्में बनीं। त्रिलोक कपूर 1970 के दशक से बड़ी फिल्मों में सहायक भूमिकाओं में नज़र आने लगे, जैसे ‘सौदागर’, ‘दो प्रेमी’ और ‘गंगा जमुना सरस्वती’। उन्होंने आखिरकार अपने भतीजे राज कपूर की आरके फिल्म्स- राम तेरी गंगा मैली में भी 1985 में काम किया। त्रिलोक कपूर का निधन 23 सितम्बर 1988 को 76 वर्ष की आयु में हुआ, उस समय तक वह छोटी फिल्मों में कैमियो करने लगे थे, जिसके लिए क्रेडिट नहीं दिया जाता है। उनकी अंतिम फिल्म ‘वफा’ 1990 में रिलीज़ हुई, जोकि कम बजट वाली फिल्म थी। त्रिलोक कपूर के दो बेटे हैं- विक्की कपूर वकील व राजनेता हैं और विजय कपूर फिल्म निर्देशक हैं। त्रिलोक कपूर 1988 की टेलीफिल्म ‘आकांक्षा’ में भी दिखायी दिये थे, जिसका निर्देशन उनके बेटे विजय कपूर ने किया था। 
कपूर खानदान के चराग त्रिलोक कपूर ने हिंदी सिनेमा को अपनी ज़िंदगी के 50 साल दिये और 120 से भी अधिक फिल्मों में काम किया। लेकिन अफसोस उनकी मौत के बाद न सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री बल्कि कपूर खानदान भी उन्हें भुला बैठा। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#कपूर परिवार के सबसे सफल हीरो थे त्रिलोक कपूर