कम होती जा रही है मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता
महाराष्ट्र में नगर निगमों और नगर परिषदों के चुनावों में भाजपा और उसकी सहयोगी एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने एक-दो स्थानीय निकायों को छोड़ कर बाकी पर जीत हासिल कर ली है। अब महाराष्ट्र में ट्रिपल इंजन की सरकार व्यावहारिक रूप से बन चुकी है। यानी, केन्द्र, राज्य और स्थानीय निकाय-तीनों जगह एक ही सरकार होगी। विपक्ष ने, खासकर उद्धव ठाकरे की शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठजोड़ और कांग्रेस इस जीत को साफ सुथरी जीत मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विपक्ष का सबसे प्रमुख आरोप यह है कि चुनाव आयोग ने वोट डाल देने के बाद मतदाताओं की उंगली पर जो स्याही का निशान लगाया है, वह 15 दिन से पहले नहीं मिटना चाहिए, लेकिन वह सेनिटाइज़र से, इंक रिमूवर से आसानी से मिटाया जा सकता है। इस स्याही विवाद पर राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट किया है कि ईसी का गुमराह करना लोकतंत्र पर चोट है, और वोट चोरी एक राष्ट्र-विरोधी काम है। मुख्यमंत्री फडणवीस कहते हैं कि स्याही नहीं जाती लेकिन मेरी उंगली की स्याही हट चुकी है। इसे हटाने के लिए मैंने कोई कोशिश भी नहीं की, सिर्फ नहाया हूं। इसे लेकर कई शिकायतें सामने आई हैं। इसे निष्पक्ष चुनाव नहीं कहा जा सकता। सत्ता में रहने के लिए इस तरह की धांधली हो रही है। एक व्यक्ति को दो बार वोट करते हुए पकड़ा भी गया है।
सवाल यह है कि क्या इन आरोपों में दम है? दरअसल, आरोपों के इस सिलसिले में दो ऐसी बातें सामने आई हैं जिनके कारण ये गम्भीर लगने लगे हैं। इनमें एक खबर ‘मुम्बई मिरर’ में छपी है। मिरर की मुख्य लीड यह है कि चुनाव आयुक्त पहले तो इस आरोप का तिरस्कार करते रहे, लेकिन जब उन पर दबाव बढ़ा तो राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे को यह कहना पड़ा कि हमने इस मसले का संज्ञान लिया है। हम इस बात की पुष्टि करेंगे कि क्या नाखून पर लगाई जाने वाली स्याही में सिल्वर नाइट्रेट नामक कैमिकल की मात्रा पूरी थी या उसे कम मिलाया गया था। वाघमारे ने यह भी बताया कि उन मार्कर पेनों का सैम्पल ले लिया गया है जिनसे पोलिंग बूथों पर स्याही लगाई जा रही थी। ये पेन कोरस कम्पनी ने सप्लाई किये हैं। अब इस कम्पनी से पूछताछ होगी।
दरअसल, हमें महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावों को बिहार में हुई एसआईआर और उसकी मदद से जीते गए विधानसभा चुनाव के आईने में देखना चाहिए। इससे एक बात स्पष्ट होकर उभरती है कि भाजपा चुनाव जीतने का बंदोबस्त दो स्तरों पर करती है। पहला चरण है माइक्रो, यानी बहुत छोटे-छोटे मुकामों पर, बहुत गहराई से बारीकी में जाकर ऐसी-ऐसी जगहों पर चुनाव जीतने का प्रबंधन किया जाता है, जहां उसके विपक्षियों की न निगाह जाती है, और न ही वे कल्पना कर पाते हैं कि इस जगह पर भी हेरफेर किया गया होगा। ये छोटे-छोटे हेरफेर एक-दूसरे से जुड़ कर बड़ा फर्क डाल देते हैं। दूसरा स्तर है माइक्रो, यानी बड़ी-बड़ी एकमुश्त की गई गड़बड़ियां। ये निर्वाचन क्षेत्रों में बड़े स्तर पर वोट काटने और फिर वोट जोड़ने से संबंधित होती हैं। ये माइक्रो और मैक्रो स्तर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक दूसरे के लिए ज़मीन साफ करता है।
इन छोटे और बड़े हेरफेरों के आपसी संबंधों को एक मिसाल के ज़रिये समझा जा सकता है। बिहार की एसआईआर के गहन अध्ययन से समझ में आया है कि वहां 128 विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां बहुत बड़ी संख्या में वोट काटे गए थे। जब एक बार वोट कट गए, तो विपक्ष ने आरोप लगाए, शोरगुल किया। इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि इतना हंगामा क्यों मचा रहे हो, वोट अगर कट गये हैं और उसमें कोई गलती हो गई है तो उसे सुधारा जा सकता है। जिनके वोट कट गये हैं, उन्हें चाहिए कि वे फॉर्म नं. 6 भर कर जमा कर दें। उनके वोट जुड़ जाएंगे। यह एक हकीकत है कि बिहार की 243 सीटों पर कटे 65 लाख वोटों का मतलब यह हुआ कि हर सीट पर कम से कम साढ़े 26 लाख वोट काट दिये गये। सवाल यह है कि जब कटे वोटों को जुड़वाने के लिए फार्म 6 भरे गये होंगे तो क्या हुआ होगा। भरने वालों और भरवाने वालों ने देखा होगा कि यह तो वह फार्म 6 नहीं है जो पारम्परिक तरीके से आमतौर से होता आया है। हालांकि पहले वाले फार्म को संसद से पारित किया गया था, पर इस बार आयोग ने उसे अपने स्तर पर ही बदल दिया। हम सब जानते हैं कि फॉर्म छह उस वोटर के लिए होता है जिसने कभी वोट नहीं डाला। यानी, जो अभी-अभी 18 साल का हुआ है। इस फार्म को भरने वाले को गारंटी देनी पड़ती है कि वह पहले कभी वोटर नहीं रहा है। जबकि, जो 65 लाख वोट कटे हैं, वे पहले वोटर रह चुके लोगों के हैं। यानी, यह फॉर्म उन्हें मजबूर करता है कि वे अगर अपना वोट फिर से बनवाना चाहते हैं तो उन्हें पहले तो झूठ बोलना पकड़ेगा, और फिर वे यह भी देखेंगे कि उन्हें तरह-तरह के प्रमाण-पत्र देने हैं जिनकी इस फॉर्म में मांग की गई है। पहले वाले फॉर्म में आधार जैसे सार्टीफिकेट को छोड़कर किसी प्रमाण-पत्र की मांग नहीं की गई थी।
इस तरह एसआईआर पहले वोट काट कर हथकंडेबाज़ी का स्पेस तैयार करती है। वोट काटना मैक्रो स्तर की हथकंडेबाज़ी है। फिर माइक्रो स्तर की हथकंडेबाज़ियों, जैसे फार्म को बदल देने से उस स्पेस में भाजपा की जीत के लिए ज़मीन साफ की जाती है। चूंकि फार्म में दी गई गारंटी अपने-आप में एक झूठ ही होगी, तो भाजपा के पन्ना प्रमुख और ईआरओ अगर मिल जाएं तो वे अपने हिसाब से तय कर सकते हैं कि किसकी गारंटी वे सही मानें और किसकी झूठ। इस तरह से भाजपा समर्थक वोट जुड़ते हैं और भाजपा विरोधी वोट जुड़ने से रह जाते हैं। जिन 128 सीटों पर बड़े पैमाने पर वोट कटे, उनमें से ज्यादार सीटें एनडीए ने जीतीं, बहुत कम वोटों से। ये फैसले सौ से हज़ार वोटों के बीच हुए। जिस विश्लेषण का ज़िक्र मैं आपके सामने कर रहा हूँ, वह बिहार चुनाव का है और उसे महाराष्ट्र की संस्था वोट फॉर डेमोक्रेसी ने किया है। मुझे यकीन है कि यह संस्था महाराष्ट्र के इन चुनावों पर भी दिमाग खपायेगी, और उसका विश्लेषण लेकर सामने आएगी, लेकिन यह जब होगा, तब होगा। अभी तो यह खेल बहुत बड़े पैमाने पर उत्तर प्रदेश में हो रहा है। वहां तो राज्य चुनाव आयोग और केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा बनाई गई वोटर लिस्टें आपस में टकरा गई हैं। स्वयं मुख्यमंत्री ने माना है कि कोई 4 करोड़ वोटरों के नाम मतदाता सूची से काट दिये गये हैं। अब उन्हें जोड़ने की कवायद होगी।
हमें इस मामले को इस रूप में नहीं देखना चाहिए कि हम भाजपा के समर्थक हैं या कांग्रेस के या समाजवादी पार्टी के समर्थक हैं। देखना इस रूप में चाहिए कि क्या चुनाव आयोग एसआईआर के ज़रिये स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की गारंटी कर रही है या नहीं। अब उत्तर प्रदेश में उसी फॉर्म 6 के ज़रिये वोट जुड़वाने का अभियान चल रहा है जिसके ज़रिये बिहार में वोट जुड़वाये गये थे। कहना न होगा कि भाजपा के पास बिहार में महागठबंधन के 67 हज़ार बीएलए के मुकाबले 91 हज़ार बीएलए थे। उनके साथ बिहार की नौकरशाही भी थी। बूथ लेबिल अफसर भी राज्य सरकार के ही कर्मचारी होते हैं। ऐसी स्थिति में एसआईआर का पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुक जाना स्वाभाविक ही है। एसआईआर राजस्थान में भी हो रही है। वहां से मिली खबरों के अनुसार राजस्थान में भाजपा नेता अधिकारियों को धमका रहे हैं। बीएलओ पर जायज वोट काटने का दबाव डाला जा रहा है। हमें पता है कि बंगाल में एक ईआरओ ने अपने पद से यह कह कर त्यागपत्र दे दिया है कि उसके ऊपर भी वोट काटने का दबाव डाला जा रहा है। कहना न होगा कि महाराष्ट्र में जांच करने पर पता चलेगा कि वहां भी ऐसा कुछ हुआ है जो या तो बिहार जैसा होगा या उत्तर प्रदेश जैसा होगा। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नेता संजय राउत ने आरोप लगाया है कि उन इलाकों में वोटर लिस्ट से हजारों मतदाताओं के नाम गायब थे, जहां शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और कांग्रेस को पारंपरिक रूप से मजबूत समर्थन मिलता है।
धीरे-धीरे तरह-तरह के प्रयोग करते-करते भाजपा ने वह हथकंडा आखिरकार परफेक्ट कर ही लिया है जिसके माध्यम से वह चुनाव होने से पहले, मतदान होने से पहले, एक भी वोट पड़ने से पहले चुनाव में जीत सुनिश्चित कर लेती है। बिहार विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में जो हुआ है, वह तो एक शुरुआती नमूना है। वोट पड़ने से पहले ही जीत जाने की यह परिघटना इस साल और अगले साल होने वाले चुनावों में और खुल कर सामने आने वाली है।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



