ईरान बनाम अमरीका : विनाशक युद्ध की आहट और विश्व
ईरान आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह केवल एक देश की आंतरिक अशांति नहीं है बल्कि वैश्विक राजनीति का वह विस्फोटक मोड़ है जहां से छद्म लोकतंत्र और मज़हबी कट्टरता के टकराव से उठी एक चिंगारी पूरी दुनिया को झुलसा सकती है। आज उनके अयातुल्लाह काम नहीं शासन के खिलाफ़ तेहरान समेत ईरान के कई शहरों और कस्बों की सड़कों पर उमड़ता विद्रोही जन सैलाब, सरकार की दमनकारी नीतियां और अमरीका की हमले की चेतावनी उस त्रिकोण का निर्माण कर रही है जिसके केंद्र में विनाशकारी युद्ध की आशंका लगातार गहराती जा रही है। ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन अब केवल आर्थिक शिकायतों तक सीमित नहीं हैं। महंगाई, बेरोज़गारी और गिरते जीवन-स्तर की पीड़ा ने जिस असंतोष को जन्म दिया है और ईरान में जिस गति से महंगाई बढ़ी है, उससे वहां के लोगों का जीना मुहाल हो गया है।
जहां विद्रोही हिंसा एवं आगज़नी पर उतरे हुए हैं तथा सरकार के तख्त पलट के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं, वहीं सरकार की प्रतिक्रिया भी उतनी ही कठोर होती जा रही है। इंटरनेट ब्लैकआउट, सामूहिक गिरफ्तारियां, सुरक्षा बलों की गोलीबारी और मृत्युदंड ये सब संकेत देते हैं कि ईरान में खामनेई सत्ता पर किसी भी कीमत पर नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं हैं। हालांकि ईरानी नेतृत्व इसे विदेशी साज़िश करार दे रहा है, लेकिन यह तर्क अब घरेलू स्तर पर भी असर खोता जा रहा है। सवाल यह नहीं कि विरोध क्यों हो रहे हैं, सवाल यह है कि क्या मौजूदा व्यवस्था उन्हें लंबे समय तक दबा पाएगी? आंतरिक उथल-पुथल के बीच अमरीका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर ख़तरनाक स्थिति पर पहुंच गया है। अमरीका मानवाधिकार उल्लंघन और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को आधार बनाकर लगातार दबाव बना रहा है। प्रतिबंधों का नया दौर, सैन्य चेतावनी और मध्य-पूर्व में अमरीकी नौसैनिक तैनाती इस बात का संकेत हैं कि वाशिंगटन ‘देखो और इंतज़ार करो’ की नीति से आगे बढ़ने का विकल्प खुला रखे हुए है।
हालाँकि, यह समझना ज़रूरी है कि अमरीका भी पूर्ण युद्ध नहीं चाहता। इसकी वजह वाशिंगटन की उदारता या शांतिप्रियता नहीं अपितु यूक्रेन युद्ध, इज़रायल-गाज़ा संघर्ष और घरेलू राजनीतिक दबाव के बीच एक और बड़े युद्ध का बोझ उठाना वाशिंगटन के लिए आसान नहीं होगा। यही कारण है कि अमरीका की रणनीति फिलहाल सीमित सैन्य कार्रवाई, आर्थिक दबाव और कूटनीतिक धमकियों तक सिमटी दिखती है। इतिहास गवाह है कि युद्ध अक्सर योजनाओं से नहीं, दुर्घटनाओं से शुरू होते हैं।
यह तो तय है कि अगर अमरीका और ईरान के बीच सीधा युद्ध होता है तो उसके प्रभाव केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेंगे। ईरान के लिए इसका अर्थ होगा—तेल रिफाइनरियों, सैन्य ठिकानों और परमाणु संयंत्रों पर हमले, अर्थव्यवस्था का लगभग ठप हो जाना और संभवत: गृहयुद्ध जैसी स्थिति। बेशक सबसे भारी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ेगी, जिनके लिए शांति पहले ही दुर्लभ हो चुकी है।
इससे भी अहम बात यह है कि अमरीका का ध्यान एशिया-प्रशांत क्षेत्र से हटेगा, जो उसके दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के विपरीत है। वैश्विक स्तर पर इसका सबसे तात्कालिक असर ऊर्जा बाज़ारों पर पड़ेगा। होरमुज़ जलडमरूमध्य में जरा-सी अस्थिरता भी तेल की कीमतों को 120-150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा सकती है। इसका सीधा अर्थ है—वैश्विक महंगाई, आर्थिक मंदी और विकासशील देशों पर असहनीय दबाव। यूरोप, जो पहले ही ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, सबसे अधिक प्रभावित होगा।
इस परिदृश्य में चीन और रूस की भूमिका भी समझना ज़रूरी है। दोनों ही देश ईरान के संकट को अपने-अपने रणनीतिक लाभ के रूप में देख रहे हैं। चीन अमरीका को मध्य-पूर्व में उलझा देखना चाहता है ताकि एशिया में उसकी पकड़ ढीली पड़े। रूस के लिए यह पश्चिमी एकता को कमज़ोर करने और ऊर्जा कीमतों से लाभ उठाने का अवसर है। लेकिन चीन या रूस कोई भी ईरान के लिए अमरीका से सीधा युद्ध लड़ने को तैयार नहीं है। ईरान उनके लिए साझेदार कम, रणनीतिक साधन अधिक है।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का सबब है। तेल आयात पर निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था पर महंगाई का सीधा असर पड़ सकता है। रुपये पर दबाव बढ़ेगा, शेयर बाज़ार में अस्थिरता आ सकती और खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा एक गंभीर प्रश्न बन जाएगी। साथ हीए ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और अफगानिस्तान संपर्क जैसी रणनीतिक परियोजनाएं भी प्रभावित होंगी। (अदिति)



