लोहड़ी, जन-नायक, किस्से और कवीशर

आम तौर पर लोहड़ी को खुशियों और मौज-मस्ती का त्योहार माना जाता है। मेरे बचपन में जन-नायकों के कारनामे गाकर सुनाने वाले कवीशर बड़े गांवों और कस्बों में लोगों का मन मोह लेते थे। गांवों के श्रोता अपनी जेबों में छोटे-बड़े सिक्के लेकर उन्हें सुनने जाते थे। माता-पिता अपने बच्चों को दुआनी, चवन्नी या अठनी देकर मंच की ओर भेज देते थे और गायक बच्चे का नाम पूछ कर उसका नाम सभी श्रोताओं को बताते थे। माता-पिता भी खुश, बच्चा भी और गायक भी। ये वे दिन थे जब रेडियो, टेलीविज़न और टेलीफोन हर किसी पास नहीं होते थे। इनकी आमद हुई तो जोड़ने वालों ने निम्नलिखित पंक्तियां भी जोड़ ली : 
जग्गे जट्ट ने संदूकड़ी लिआंदी
विच बोले बंतो बाहमनी
कवीशर अपने नायकों की प्रशंसा करने के लिए ढड्ड सारंगी का इस्तेमाल करते थे। दुल्ला भट्टी, जग्गा डाकू, जिऊना मौड़ और सुच्चा सिंह सूरमा अच्छे काम भी करते और बुरे भी, परन्तु वे बुरे कामों की कमाई ज़रूरतमंदों और गरीबों तक पहुंचा कर नाम कमाते थे, जिसका कवीशर गुणगान करते थे। सुनने वाले उनके बुरे काम भूल जाते और अच्छे काम याद करके खुश होते।
दुल्ला भट्टी इनका सिरताज था। उसके खानदान की मुगल बादशाह अकबर के साथ टक्कर थी। वह समझते थे कि अगर बाहर से आया अकबर उनके देश से ज़्यादती कर रहा है, तो वह भी बादशाह को लगान देने से मना कर सकते हैं। उनकी नज़र में लगान देने वाले किसान कायर थे जो अपने हाथ की कमाई को खच्चरों पर लाद कर बादशाह तक पहुंचाते थे। दुल्ला के पिता और दादा उनके नेतृत्वकर्ता थे, जो उस समय रावी और चिनाब के बीच वाले क्षेत्र के गणमान्य माने जाते थे। इस इलाके को सांदलबार कहते थे। दुल्ला के जन्म से पहले ही अकबर ने उसके पिता और दादा का सिर कलम करवा कर उनके शरीर में भूसा भर कर सरकारी किले पर लटका दिया थे। दुल्ला की मां लद्धी ने नाव से नदी पार करके अपनी जान बचाई थी। चार महीने बाद दुल्ला का जन्म हुआ था।
दुल्ला की रगों में बाप-दादा का खून होने के कारण वह बचपन से ही अलग और अलबेला था। उसका सबसे पहला हथियार गुलेला था और उसने कुएं से पानी ले जा रही महिलाओं के मटकों को कई बार अपना निशाना बनाया। वह अपने इस कार्य का आनंद ले रहा था कि एक सिहसन के तंज़ ने उसकी हवा निकाल दी। किस्साकारों के मुताबिक उस महिला ने दुल्ला को चुनौती दी कि वह गरीबों के मटकों को तोड़ने की बजाय महलों की तरफ मुंह करे जिन्होंने उसके बाप-दादा की हत्या की थी। जब दुल्ला के मन में अकबर का यह कृत्य पूरी तरह बैठ गया तो उसने अपने साथियों और प्रशंसकों को साथ लेकर महलों की तरफ कूच किया। कवीशरों ने इस अवस्था को ऐसे लिखा है :
मैं ढाहां दिल्ली दे किंगरे
ते करां लाहौर तबाह 
इन दिनों में ही कुछ शाही दरबारियों ने सुंदरी मुंदरी नामक दो बहनों को विवाह के दिन उठाने का फैसला किया तो उनके माता-पिता ने दुल्ला के साथ सम्पर्क किया। दुल्ला व उसके साथियों ने जल्दी उनका विवाह करवा कर उन्हें ससुराल पहुंचा दिया। इस बात की परवाह नहीं की कि लड्डू और जलेबियां तैयार नहीं थीं। उनकी झोली में शक्कर डाल कर उन्हें विदा कर दिया। इस घटना को लोक-कवियों ने निम्नलिखित शब्द दिए जो लोहड़ी की रात गाए जाते हैं :
सुंदर मुंदरिये, हो
तेरा कौन सहारा, हो
दुल्ला भट्टी वाला, हो
दुल्ले धी विआही, हो
पल्ले शक्कर पाई, हो
इस घटना के बाद दुल्ला भट्टी की पूरे सांदल बार में वाह-वाह हो गई।  दुल्ला भट्टी को शाही फौज द्वारा गिरफ्तार किए जाने से पहले बहुत कुछ हुआ, परन्तु गायकों और कवीशरों द्वारा उभारी गई बातों में से जो दो मुझे आज भी याद हैं, उनमें पहली तो यह है कि बादशाह ने दुल्ला को गिरफ्तार करने का काम मिज़र्ा निज़ामदीन को सौंपा था। दुल्ला के खेमे में यह खबर पहुंची तो दुल्ला की प्रशंसक सुंदरी खुद मिज़र्ा से मिली और पूछने लगी कि मिज़र्ा के पास ऐसा कौन-सा जादू है जिससे वह दुल्ला को पकड़ कर अकबर के सामने पेश कर सकता है। मिज़र्ा ने अपने पास रखे शिकंजे की तरफ इशारा किया। सुंदरी ने देखा कि अगर इस शिकंजे में हाथ, पैर और गर्दन फंस जाएं तो इंसान बेबस हो सकता है। फिर भी उसने भोली बन कर मिज़र्ा से कहा कि इसमें इंसान का शरीर फंसना संभव नहीं। यहां किस्साकारों के शब्द सब कुछ बता देते हैं : 
मिज़र्ा दस्सदा सिर ते पैर पा के
उत्तों सुंदरी मारदी जंद जानी 
सुंदरी ने मिज़र्ा को शिकंजे में जकड़े जाने की खबर दुल्ला को दी तो दुल्ला निश्चिंत होकर आगे बढ़ गया। यहां लिखने वाले दुल्ला के रास्ते में होनी नामक उस महिला को ला खड़ा करते हैं जिसके सामने कांटों का टोकरा है। वह दुल्ला से गुहार लगाती है :
कंडियां दा रखिया है, मैं भराइके 
दुल्लिया वे टोकरा चुकाईं आइके 
जब दुल्ला भट्टी कांटों का टोकरा उठवाने में सफल नहीं होता तो उसे चाहिए था कि आगे बढ़ने की बजाय वापस लौट जाता। वह नहीं लौटा तो उसके साथ वही हुआ जो शाही फौज के साथ टक्कर लेकर होना था।
मेरे बचपन के किस्साकारों की रचना और गायकों का शब्दों में इतना रस होता था कि हमारी ओर से गायकों को दिए सिक्के भूल जाते थे। आज के मोबाइल, टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने उस आनंद को फीका कर दिया है। करें तो क्या करें!
बस इतना ही कह सकते हैं कि दोआबा की छिंझें और मालवा के मेले एवं कवीशर हमारी पूंजी हैं, यह पूंजी अलोप नहीं होगी!
अंतिका
(वारिस शाह)
बाझों दुख दे सुख नसीब नाहीं,
लग्न बाझ खुआर संसार नाहीं।
बाझों हिज़र दे ज़ौक ते शौक नाहीं,
बाझों वसल दे मौज बहार नाहीं।

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