सही साबित हो रही वैश्विक तपिश की चेतावनी
धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इसके दुष्परिणाम अब पूरी दुनिया में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। इसी क्रम में यूरोपीय संघ की कोपरनिकस जलवायु परिवर्तन सेवा (सी3एस) ने 14 जनवरी 2026 को जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की। रिपोर्ट के अनुसार यह इतिहास में पहली बार हुआ है जब लगातार तीन वर्षों 2023, 2024 और 2025 के दौरान वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। गौरतलब है कि वर्ष 2024 सबसे गर्म और वर्ष 2023 दूसरा सबसे गर्म वर्ष रहा, जबकि पिछले 11 वर्ष अब तक के सबसे गर्म वर्षों की सूची में शामिल हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2025 में अंटार्कटिका ने अब तक का सबसे गर्म साल दर्ज किया जबकि आर्कटिक क्षेत्र दूसरे स्थान पर रहा। तापमान में इस असामान्य वृद्धि के कारण दुनिया भर में भीषण तबाही देखने को मिली। भारत और पाकिस्तान में मानसूनी बारिश और बाढ़ से एक हज़ार से अधिक लोगों की जान गई। वैज्ञानिकों ने इस गर्मी के लिए दो प्रमुख कारण बताए हैं—पहला, ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, जलवाष्प, ओज़ोन और फ्लोरोन युक्त गैसों का लगातार बढ़ता उत्सर्जन और दूसरा, अल-नीनो की सक्रियता के साथ महासागरों की सतह का रिकॉर्ड स्तर तक गर्म होना।
धरती के बढ़ते तापमान का ताज़ा उदाहरण उत्तराखंड का ओम पर्वत है, जो आमतौर पर जनवरी महीने में मोटी बर्फ की चादर से ढका रहता है। वर्ष 2026 में लगभग 15,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र पर्वत शीतकाल के बीचों-बीच भी लगभग बर्फ विहीन नज़र आ रहा है। ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में पर्याप्त बर्फबारी न होने के कारण पर्वत का निचला और मध्य हिस्सा काला दिखाई दे रहा है। पहले अगस्त-सितम्बर में बर्फ का न होना असामान्य माना जाता था, लेकिन अब जनवरी में भी यही स्थिति सामने आना जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी है।
भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में वैश्विक तपिश का असर और भी तेज़ी से दिखाई दे रहा है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में तापमान वृद्धि की दर वैश्विक औसत से अधिक है, जिसके कारण ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार लद्दाख के ज़ांस्कर क्षेत्र में स्थित डुरुंग-द्रुंग ग्लेशियर 2015 से 2023 के बीच लगभग 165 मीटर पीछे हट चुका है। एक पत्रिका के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर 2011 से 2020 के दौरान पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत तेज़ी से सिकुड़े हैं और यदि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो सदी के अंत तक लगभग 45 से 50 प्रतिशत बर्फ समाप्त हो सकती है। ग्लेशियर और बर्फ पहाड़ों में जल का प्राकृतिक भंडार होते हैं। सर्दियों की बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर साल भर नदियों को पानी देती है, लेकिन बढ़ते तापमान के कारण अब बर्फ कम गिर रही है और जल्दी पिघल भी रही है। बर्फ की जगह बारिश हो रही है।
वैश्विक तपिश का प्रभाव अब केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा है। भारत के मैदानी, तटीय और शहरी इलाकों में भी इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। वर्ष 2025 में देश भर में 270 से अधिक दिनों तक चरम मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं। फरवरी 2025 पिछले 124 वर्षों में सबसे गर्म महीना रहा जबकि गर्मी के मौसम में भारत-पाकिस्तान क्षेत्र में कई स्थानों पर तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। एक अध्ययन के अनुसार भारत के 85 प्रतिशत से अधिक ज़िले अब बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी चरम जलवायु घटनाओं के जोखिम में हैं।
इन लगातार बढ़ते प्रभावों के चलते ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स-2026 में भारत को दुनिया के सबसे अधिक प्रभावित देशों में नौवां स्थान मिला है। संक्षेप में यह स्पष्ट है कि वैश्विक तपिश अब केवल तापमान वृद्धि तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह मानव जीवन, कृषि, जल संसाधन, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था पर गहरा और विनाशकारी प्रभाव डाल रही है। वर्ष 2025 इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट भविष्य में और अधिक भयावह रूप ले सकता है। (एजेंसी)



