ठंड और प्रदूषण का मिश्रण बना ‘स्वास्थ्य आपातकाल’
दिल्ली व आस-पास की सर्दी अब सिर्फ मौसम नहीं रही, यह शरीर पर चुपचाप टूटता एक स्वस्थ आपातकाल बन चुका है। दिन निकलते ही धूप की जगह आसमान में धूसर चादर फैल जाती है और रात उतरते-उतरते वही घुटन में बदल जाती है। यह वह शहर है जहा ठंड आराम नहीं देती, बल्कि फेफड़ों की परतों पर जमी ज़हरीली हवा के साथ मिलकर दिल, दिमाग और रक्त-प्रवाह पर सीधा हमला करती है। एक तरफ तापमान गिरता है और दूसरी तरफ पीएम 2.5 का स्तर बढ़ कर सांसों में धुआं भर देता है।
नतीजा यह कि अस्पतालों की ओपीडी में खांसी, सांस फूलना, अस्थमा अटैक, ब्रोंकाइटिस जैसी शिकायतों की बाढ़ आ जाती है। जनवरी 2026 में अभी तक (15 जनवरी 2026 तक) सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही 25000 से ज्यादा केस रजिस्टर्ड हो चुके हैं। वहीं दूसरी ओर ब्लड प्रेशर में अचानक उछाल, हार्ट स्ट्रेस और स्ट्रोक के खतरे की घंटियां भी घनघना रही हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि इस कॉकटेल का असर केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं, यह बच्चों के फेफड़ों को भी छोटा कर रहा है और गर्भवती महिलाओं के लिए भी जोखिम बढ़ा रहा है। इसी वजह से हाल के दिनों में डॉक्टरों की चेतावनियां बढ़ गई हैं कि दिल्ली की यह सर्दी सीजन नहीं स्वास्थ्य के लिए संकट का मौसम है। अब सवाल यह नहीं कि ठंड कितनी है, सवाल यह है कि दिल्ली की हवा में कितनी ज़िंदगी बची है।
ठंड के मौसम में हवा भारी हो जाती है, तापमान गिरता है, हवा चलना कम हो जाती है और प्रदूषक कण (पी एम 2.5/पी एम 10) जमीन के पास फंस जाते हैं। इसी वजह से दिल्ली में कई दिनों तक एक्यूआई बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में बना रहता है। उदाहरण के तौर पर जनवरी 2026 में अब तक दिल्ली में एक्यूआई 350+ से कम रिपोर्ट नहीं हुआ जो बहुत खराब स्थिति है जबकि न्यूनतम तापमान 2-5 डिग्री सेंटीग्रेड तक रहा है। इस ‘डबल अटैक’ का असर लोगों के शरीर पर अलग-अलग स्तरों पर पड़ रहा है—फेफड़े, दिल, दिमाग, किडनी, गर्भस्थ शिशु और यहां तक कि मानसिक स्वास्थ्य भी। हाल की रिपोर्टों में डॉक्टरों ने चेताया कि ठंड में हृदय और फेफड़ों से जुड़ी आपात स्थितियां बढ़ती हैं, बीपी अचानक स्पाइक्स होते हैं ऐसे में कमज़ोर वर्ग सबसे अधिक जोखिम में रहता है। सवाल है दिल्ली में हर बार ठंड इतनी ही खतरनाक क्यों होती है? इसका एक बड़ा वैज्ञानिक कारण है—टेम्प्रेचर इन्वर्जन। सामान्यत गर्म हवा ऊपर उठती है और प्रदूषण फैलता है, पर सर्दियों में ऊपर की हवा अपेक्षाकृत गर्म और नीचे की हवा ठंडी होती है, जिससे प्रदूषक नीचे ही कैद हो जाते हैं। इसमें कम हवा की गति तथा धुंध स्थिति को बेहद खराब कर देती है। यही कारण है कि शीतलहर के साथ दिल्ली व आसपास की हवा अक्सर बेहद खराब बनी रहती है।
एम्स दिल्ली के डॉक्टरों की चेतावनी के मुताबिक सर्दियों में ब्लड प्रेशर नियंत्रण बिगड़ जाता है और हृदय, किडनी, डायबिटीज मरीज़ों में जटिलताएं बढ़ती हैं। ज्यादा सर्दियों में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और श्वसन समस्याओं का खतरा बढ़ता है। अगर सुबह-सुबह (जब ठंड चरम पर और प्रदूषण भी भारी होता है) तेजी से वाक या कसरत की जाए तो हार्ट पर अचानक दबाव बढ़ सकता है।
इसीलिए आजकल कई डॉक्टर अर्ली मोर्निंग एक्सपोज़र से बचने की सलाह दे रहे हैं। इस मौसम में अस्थमा, सीओपीडी और बच्चों में निमोनिया, सर्दी में सांस लेना मुश्किल हो जाता है क्योंकि ठंड में लोग दरवाजे-खिड़कियां बंद रखते हैं। रूम हीटर, अंगीठी, धूपबत्ती, अगरबत्ती, किचन स्मोक, नमी और फफूंद आदि के कारण घर के अंदर का प्रदूषण बढ़ता है। साल 2025 की एक रिसर्च के मुताबिक सर्दियों में दिल्ली के घरों में फंगल/बैक्टीरियल कणों की मौजूदगी के कारण खांसी, एलर्जी, आंखों में जलन आदि की समस्या आम है। यह भी बच्चों और बुजुर्गों के लिए सबसे घातक है, क्योंकि उनकी श्वसन प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है।
किडनी और डायबिटीज मरीज़ों के लिए भी सर्दी नुकसान करती है, क्योंकि सर्दियों में प्यास कम लगती है। लोग पानी कम पीते हैं जिससे शरीर में पानी कमी तथा ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है जो कि किडनी में दबाव बनाते हैं। डायबिटीज में कम धूप, कम चलना, ज्यादा कैलोरी का भोजन आदि शुगर कंट्रोल की स्थिति को बिगड़ता है। एम्स दिल्ली के डॉक्टरों के अनुसार यह रूझान लगातार दिख रहा है। इस मौसम की एक और सबसे बड़ी मार है हाइपोथर्मिया की जो कि गरीब और बेघर लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। कुल मिलकर दिल्ली की सर्दी अब ‘मौसम’ नहीं, एक हेल्थ इमरजेंसी बन गयी है, क्योंकि दिल्ली में भीषण ठंड अकेली नहीं आती, वह प्रदूषण को साथ लाती है और दोनों मिलकर शरीर पर हमला करते हैं। इसी वजह से इस मौसम में हार्ट अटैक, सांस की बीमारियां, बच्चों के इंफेक्शन, किडनी व ब्लडप्रेशर बिगड़ना एक साथ बढ़ता दिख रहा है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



