ऐतिहासिक ही नहीं, रहस्यमय भी है कालिंजर का किला
उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में स्थित कालिंजर बुदेलखंड का एक ऐसा ऐतिहासिक नगर है जिस पर प्राचीन काल में जेजाभुक्ति का साम्राज्य था। यहां का ऐतिहासिक व रोमांच से भरा किला विध्यांचल पर्वत की पहाड़ी पर 700 फुट की ऊंचाई पर स्थित है कालिंजर दुर्ग की ऊंचाई 108 फीट है। इसकी दीवारें चीन की दीवार की भांति चौड़ी और ऊंची है। इसलिए मध्यकालीन भारत का यह सर्वश्रेष्ठ किला माना जाता है। किले के बीचों-बीच अजयपलका नामक पानी की झील है जिसके आस-पास कई पौराणिक मंदिर है।
भारत का सबसे विशाल और अपराजेय किले पर 9वीं से 15वीं शताब्दी तक चंदेल राजाओं का शासन था। इनके शासनकाल के दौरान कालिंजर दुर्ग पर मूगल बादशाह महमूद गजनवी, शेरशाह सूरी, कुतुबुद्दीन ऐबक व हुमायू ने आक्रमण किये परन्तु वे इसे जीतने में असफल रहे लेकिन 1569 में अकबर बादशाह ने यह किला जीता और अपने नवरत्नों में एक बीरबल को यह किला उपहार स्वरूप भेंट किया। बीरबल के बाद यह किला बुंदेल महाराजा छत्रासाल के अधीन रहा तो बाद में इस पर पन्ना के हरदेव ने अपना अधिकार जमाया। सन् 1812 में इसे अंग्रेजों ने अपने अधीन ले लिया।
कालिंजर में चार प्रवेशद्वार थे लेकिन अब तीन ही द्वार बचे हैं जिनमें कामता द्वार, पन्नाद्वार व रीवा द्वार हैं किले में प्रवेश के सात द्वार है व इसके भीतर कलात्मक राजमहल व रानीमहल बने हुए हैं। विध्यांचल पहाड़ पर सीना ताने ख़ड़े इस दुर्ग ने भी कई उतार-चढाव देखे है। किले में कई रहस्य हैं तो रात के सान्नाटे को चीरती घुंघरूओं की आवाज तो कई तिलस्मी चमत्कार भी है दिन के समय ये किला जितना शांत दिखाई देता है तो रात के वीराने में यहां की काली गुफाएं उतनी ही खौफनाक दिखाई देती है। इन गुफाओं का कोई और छोर नहीं है। इन अंधेरी गुफाओं में पानी टपकता रहता है। इस किले में कई तरह की गुफाएं हैं जिनका उपयोग सीमा की सुरक्षा के लिए सैनिक करते थे। इन गुफाओं में घना अंधेरा है व अंदर अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देती है। कालिंजर के रहस्यमयी किले में सात दरवाजों में से एक ऐसा दरवाजा है जो सिर्फ रात्रि के सन्नाटे में खुलता है। वह यहां से निकलने वाला रास्ता रानीमहल में जाता है। रानी महल में हर रोज महफिलें सजती है। किले के रानीमहल में उस समय खूबसूरत नर्तकी जिसका नाम पद्मावती था और जब वह नाचती थी तो चंदेल राजा घुंघरूओं की आवाजों से मदमस्त हो बंधकर रह जाते थे। पद्मावती शिव की भक्त थी और वह कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूरी रात दिल खोलकर नृत्य करती थी।
कालिंजर किले के प्रांगण में नीलकंठ मंदिर है जिसे नागों ने बनवाया था। मंदिर में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर से काल भैरव की प्रतिमा के बंगल में चट्टान काटकर जलाशय बनाया गया है जो पहाड़ी से ढका हुआ है। इसे स्वर्गारोहण जलाशय भी कहा जाता है। ऐसी आस्था है कि इसमें स्नान करने से कुष्ठरोग दूर हो जाता है। मंदिर के पीछे पहाड़ काटकर पानी का कुंड बनाया गया है। कुंड के बड़े-बड़े स्तंभों और दीवारों पर प्रतिलिपियां अंकित है। ऐसा माना जाता है कि किले में गड़े खजानों का रहस्य इन्हीं प्रतिलिपियों में है लेकिन आज तक यहां गड़े खजानों का कोई पता न लगा सका। मंदिर के ऊपर पहाड़ से पानी रिसता रहता है जो आज तक जारी है। किले की 800 फुट ऊंचाई पर पानी की धारा नीचे से ऊपर की ओर बहती है, यह भी हैरानगी की बात है।
कालिंजर किले में की गई बारीक चित्रकारी व पत्थरों पर की हुई नक्काशी देखकर लगता है। इसका अतीत समृद्धशाली रहा है। इस दुर्ग में स्थापत्य कला की कई शैलियां दिखाई देती है जिसमें गुप्त, प्रतिहार व पंचायतन नागर शैली का अभास होता है। कालिंजर का पौराणिक महत्व भी है, ऐसा माना जाता है कि सतयुग में कालिंजर का नाम कीर्तिनगर, त्रोतायुग में मध्यगढ़, द्वापरयुग में सिंहलगढ़ और कलयुग में कालिंजर नाम से जाना जाता है। यह भी माना जाता है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठर ने यहां कोटतीर्थ में आत्मा की शांति के लिए स्नान किया था। वेदों में उल्लेखित है कि कालिंजर का किला दुनिया का सबसे प्राचीन किला है। किले में जाने के लिए उबड़-खाबड़ रास्ते तय करने पड़ते है लेकिन प्रतिदिन यहां आने वाले सैलानियों का जमघट शाम तक लगा रहता है। (उर्वशी)





