हाथ उनके भी कांप रहे हैं
हाथ कब कांपते हैं। जब हम चोरी करते हैं। जब हम कोई अवैध काम करते हैं। तब हमारे हाथ कांपते हैं। कांपते हाथों से लोग चुंबन लेते हैं। माफ कीजियेगा कांपते होंठों से लोग चुंबन लेते हैं लेकिन अब तो आपकी उम्र भी ना रही चुंबन लेने की। खैर, इस बार ध्वज फहराते हुए भी उनके हाथ कांपे। और मीडिया की विलक्षण चक्षु प्राप्त एक समाचार वाचिका को ये दिखा भी। जिनके दो नहीं चार आंखें हैं। जो आगे-पीछे बराबर देख सकतीं हैं। खैर, उनको पलायन, बेरोज़गारी, महंगाई, भ्रष्टाचार दिखाई नहीं देता है। उनकी जो दिव्य दृष्टि है वो केवल और केवल हाथ का कांपना देख पातीं हैं। अर्थव्यवस्था की सांसें फूल रहीं हैं ये उनको नहीं दिखता।
ये वही हाथ हैं जिन्होंने नौकरियों को खत्म कर दिया। जिन्होंने लघु-उधमियों का उधम बंद कर दिया है। जिन्होंने सौंदर्यीकरण में बाजार तबाह कर दिए। जिनके कारण छोटे दुकानदार रोड़ पर आ गए। ऑनलाईन कारोबार ने व्यापरियों को मजदूर बना दिया है। लोगों को बर्बाद करते समय उनके हाथ नहीं कांपे।
यहां तो उनके हाथ कांप रहे हैं। और मीडिया की नज़र इस बात पर अटक गई है कि उनके हाथ कांप रहें हैं। गनीमत यह है कि मीडिया ने बताते समय ये नहीं बताया कि उनके ध्वज को ऊपर खींचते समय रोंएं भी खड़े हो गए। अगर वो बता भी देता तो तो ये मानना पड़ता कि मीडिया के लोगों की आंखों में माइक्रोस्कोप लगा हुआ है।
पिचहत्तर का होने के बाद हाथ-पैर, दांत-आंख सब कांपने लगते हैं। इससे पहले ही आपने कई लोगों को जो पद-प्रतिष्ठा को पाने वाले थे। जो बरसों से ख्वाब पाले हुए थे कि सत्ता में रहकर नेतृत्व करें। उनको आपने पैवेलियन का रास्ता दिखा दिया। आज तीस चालीस के युवाओें के बाल उड़ जा रहें हैं। रीवाइटल खाकर दिनचर्या चल रही है। परिवार और लोगों की ज़रुरतें सुनकर लोगों के सिर के बाल उड़ते चले जा रहें हैं।
आपके तो खाली हाथ ही कांप रहें हैं। महंगाई है कि थमने का नाम नहीं ले रही है। लोग समय से पहले बूढ़े होते जा रहें हैं।
इधर इनके हाथ कांप रहें हैं। उधर जी.डी.पी. के पांव कांप रहे हैं। जी.डी.पी में सुधार नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपया कांपने लगा है। डॉलर सत्तर से एक सौ चार पर पहुंच गया है।
हाथ उनके भी कांप रहें हैं जिन्होंने बिटिया की शादी के लिए कर्ज ले रखा है। हाथ उनके भी कांप रहें हैं जो लोन लेकर पढ़ाई कर रहें हैं लेकिन नौकरियां या काम नदारद हैं। हाथ उनके भी कांप रहें हैं जिन्होंने कर्ज लेकर फसल लगाई है। और जिनको एम.एस.पी. नहीं मिल रही है। या फसल खराब हो गई है। हाथ उनके भी कांप रहें हैं जिनके पर्चे लीक हो रहें हैं।
-मेघदूत मार्केट फुसरो
बोकारो झारखंड, पिन 829144



