अपना खून

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दोनों  पढ़ने में काफी तेज़ थे। दोनों अपने वर्ग में प्रथम आते थे। यह देखकर उनका मन प्रसन्नता से खिल उठता। उन्हें इस बात का विश्वास हो गया था कि उनकी मेहनत एक दिन ज़रूर रंग लायेगी। वे अपने पिता की इच्छा पूरी नहीं कर सके, लेकिन वे दोनों एक दिन परिवार का नाम रौशन ज़रूर करेंगे। 
उनका बेटा इंटर की परीक्षा में पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया तो बेटी मैट्रिक की परीक्षा में अपने विद्यालय में प्रथम आयी थी। इन दोनों की सफलता से उनका सीना गर्व सै चौड़ा हो गया। 
उन्होंने दोनों को अपने पास बुलाया और कहा- ‘मैं तुम दोनों की सफलता से फूला नहीं समा रहा। तुम दोनों ज़रूर अपने परिवार का नाम रौशन करोगे। मनोहर तुम आगे क्या करना चाहते हो?’
मनोहर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति से परिचित था। एक किसान अपने बेटे के लिए इतना ही कर दिया, वह ही बहुत काफी था। वह डाक्टर बनना चाहता था, लेकिन अपने पिता की स्थिति को देखकर कहने में झिझक रहा था। 
‘बेटा! तुम्हें जो कहना हो नि:संकोच कहो। तुम्हारे भविष्य को संवारने में अपना कदम पीछे नहीं हटाऊंगा। तुम अपनी इच्छा व्यक्त करो।’ वे उत्साहित स्वर में बोले। 
‘पिता जी! मैं डाक्टर की पढ़ाई करने शहर जाना चाहता हूं, लेकिन...। ‘और उसके शब्द अधूरे रह गये। 
‘लेकिन क्या बेटा?’ वे उसकी ओर देखते हुए बोले। 
‘इसमें लाखों रूपये खर्च होंगे, फिर इतने रूपये कहां से आयेंगे?’ मनोहर धीमे स्वर में बोला। 
‘तुम्हें पैसों की चिंता नहीं करनी है। बस तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। रूपये कहां से आयेंगे यह मुझ पर छोड़ दे? तू शहर जाने की तैयारी कर।’ वे मुस्कुराते हुए बोले। 
‘पर इतने रूपये कहां से आयेंगे?’ उसने प्रश्न किया। 
‘अपनी जमीन गिरवी रख दूंगा। जब तू डॉक्टर बन जाएगा तो अपने दुख दूर हो जायेंगे।’ वे बोले। 
‘मैं अपना भविष्य संवारने के लिए पुरखों की जमीन का सौदा नहीं कर सकता।’ वह बोला। 
‘यह सौदा कहां है? जब तू बड़ा आदमी बन जाएगा तो ये जमीन वापस हमारे पास आ जाएगी। अब ज्यादा सोच-विचार मत कर।’ वे उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले। 
वह मैडीकल की तैयारी करने शहर चला गया। राम प्रसाद उसकी पढ़ाई में पैसे को बाधा बनने नहीं दे रहे थे। धीरे-धीरे सारी जमीन और घर पर काफी रूपये ले लिए। इस बीच हेली भी इंटर पास गयी और वह शिक्षिका बनना चाहती थी। उसकी पढ़ाई पूरी होते ही उसे भी टीचर्स ट्रेनिंग करवा दिया। 
मनोहर की पढ़ाई में पैसे को उन्होंने बाधक बनने नहीं दिया। उसकी पढ़ाई पूरी होने वाली थी और अब वह डाक्टर बनने वाला था। उसके भविष्य को संवारने में उन्होंने सारी संपत्ति दांव पर लगा दी। जब से मनोहर शहर गया है, कभी गांव नहीं आया। वह डाक्टर बन चुका था और महानगर के एक अस्पताल में अपनी सेवा दे रहा था। उसके आने की प्रतीक्षा में मा-बाप अपनी पलकें बिछाये बैठे थे, लेकिन वह पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब उनकी जवान बेटी शादी के योग्य हो गयी थी, लेकिन अब उनके पास बचा ही क्या था, जिससे उसकी शादी करते? वे अपने परिवार के साथ फुटपाथ पर आने वाले थे। 
‘किस सोच में डूब गये?’ उमेश ने उनके कंधे पर हाथ हुए कहा। 
उनका ध्यान भंग हुआ और वे मुस्कुराकर बोले- ‘अपनी लहलहाती फसल देख रहा था।’
‘कल आपकी सारी संपत्ति किसी और की हो जाएगी। जिसके भविष्य को संवारने के लिए आपने सारी संपत्ति दांव पर लगा दी, वही दगा दे दिया। मनोहर को ऐसा नहीं करना चाहिए। कम से कम उसे अपनी जवान बहन के बारे में सोचना चाहिए था।’ उमेश बोला। 
राम प्रसाद बिना कुछ बोले आगे बड़ गये। वे सारी रात जाग कर बितायी। सुबह होते ही उनका मन खिन्न हो गया। उनके घर के आगे नीलामी की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी। जैसे ही उनकी संपत्ति की बोली लगती। उनके घर के आगे एक चमचमाती कार आकर रूकी। लोग उस ओर देखने लगे। जैसे ही कार का दरवाजा खुला उससे सूट-बूट पहने एक आदमी अटैची लिए उतारा। उसके पीछे मनोहर था। 
अपने घर के आगे लोगों का जमावड़ा देख वह बोला-‘यहां भीड़ क्यों लगी है?’
गांव का एक आदमी बोला- ‘राम प्रसाद की सारी संपत्ति नीलाम होने वाली है।’
वह अपनी निगाहें घर के दरवाजे पर टिका दी। उसके पिता अपने सिर झुकाकर खड़े थे। वह फौरन अपने पिता का चरण स्पर्श किया और बोला- ‘अब यहां कोई नीलामी नहीं होगी। सूद समेत सारे पैसे आपको मिल जायेंगे।’
यह सुनते ही राम प्रसाद की आंखों में आंसू आ गये। वे एकटक मनोहर को देखते हुए अपनी बांहें फैला दी। वह उनसे जाकर लिपट गया और बोला- ‘आप यही न सोच रहे होंगे कि मैं आपको भुला चुका हूं। मेरे भविष्य को संवारने के लिए आपने सारी संपत्ति दांव पर लगा दी। अपने परिवार को कैसे फुटपाथ पर आने देता? मैं आपका खून हूं और अपना फर्ज कैसे भूल सकता हूं? अपना खून दगा कैसे दे सकता है? ये नवीन बाबू हैं। बहुत बड़े उद्योगपति है। इनकी आर्थिक सहायता से डाक्टर की विशेष पढ़ाई के लिए विदेश गया था। इनके भी मुझ पर बहुत एहसान हैं। इनकी इकलौती बेटी मेरी दोस्त है। ये आपसे कुछ मांगने आये हैं।’
नवीन बाबू हाथ जोड़कर बोले- ‘मैं आपके बेटे का हाथ मांगने आया हूं। आपकी सहमति से इन दोनों की शादी होगी।’
राम प्रसाद उन्हें अपने गले से लगाते हुए बोले- ‘मुसीबत की घड़ी में साथ देने वाला इंसान ही अपना होता है। मुझे ये रिश्ता मंजूर है।’
नवीन बाबू अपनी अटैची खोल सारे कर्ज चुका दिये। 
मनोहर अपने पिता से बोला ‘आपने मेरे भविष्य बनाने के लिए बहुत दुख झेला है। हमारा परिवार अब साथ रहेगा। आप मना नहीं करेंगे।’
‘मनोहर सही कह रहा है। अब आप लोग मनोहर के साथ ही रहेंगे। इसके आगे कुछ न कहेंगे।’ नवीन बाबू मुस्कुराते हुए बोले। 
राम प्रसाद को आज अपने बेटे पर गर्व हो रहा था क्योंकि उसने उनका सपना पूरा कर दिया था। मनोहर अपने परिवार को साथ लिए गांववालों की नज़रों से दूर चला जा रहा था।  (समाप्त)
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