राहगीरों की गर्दन पर लटकती चाइनीज मांझे की तलवार

भारतीय समाज में मकर संक्रांति का दिन उल्लास, पतंगों और आपसी सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। तिल-गुड़ की मिठास, नीले आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें और छतों पर गूंजती हंसी, यह सब हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों का अभिन्न हिस्सा है। यह वह दिन होता है, जब सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का उत्सव मनाया जाता है लेकिन चाइनीज मांझे ने इस वर्ष भी इस पर्व को एक बार फिर खून से रंग दिया। जिस दिन लोग आस्था और परंपरा के उल्लास में डूबे थे, उसी दिन देश के अलग-अलग कोनों में चाइनीज मांझा मौत बनकर सड़कों, गलियों और आसमान में घूमता रहा। कहीं किसी डॉक्टर की गर्दन कट गई, कहीं बाइक सवार ने मौके पर दम तोड़ दिया, कहीं एक मासूम बच्चे का गला चार इंच तक चीर दिया गया और कहीं परिवार की आंखों के सामने एक पिता अंतिम सांस ले गया। सवाल यह नहीं है कि हादसे हुए बल्कि सवाल यह है कि ये हादसे आखिर कब तक होते रहेंगे और हम कब तक इन्हें ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ कहकर टालते रहेंगे?
उत्तर प्रदेश के जौनपुर में 14 जनवरी की सुबह डा. समीर हाशमी अस्पताल से लौट रहे थे। एक हड्डी रोग विशेषज्ञ जो रोज अपने मरीजों को चलना-फिरना सिखाते थे, खुद ज़िंदगी की दौड़ में अचानक हार गए। हवा में फैली चाइनीज मांझे की अदृश्य डोर उनकी गर्दन से टकराई। मांझा इतना धारदार था कि पलक झपकते ही उनका गला कट गया। वे लहूलुहान होकर सड़क पर गिर पड़े और कुछ ही सैकेंड में तड़पकर दम तोड़ दिया। यह केवल एक डॉक्टर की मौत नहीं थी बल्कि उस व्यवस्था पर करारा तमाचा थी, जो हर साल चेतावनियां जारी करती है, कुछ छापेमारी करती है और फिर चुप बैठ जाती है। इसी दिन तेलंगाना के संगारेड्डी ज़िले में एक और ज़िंदगी खत्म हो गई। बिहार निवासी 35 वर्षीय व्यक्ति बाइक से घर लौट रहा था। अचानक पतंग की डोर उसके गले में आ फंसी। दर्द से तड़पते हुए उसने अपनी बेटी को फोन किया, शायद आखिरी बार उसकी आवाज़ सुनना चाहता था। कुछ ही पलों बाद वह हमेशा के लिए खामोश हो गया। यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं था बल्कि यह हमारे समाज की वह कड़वी सच्चाई थी, जहां एक सस्ता धागा रिश्तों को हमेशा के लिए तोड़ देता है और एक परिवार को ज़िंदगी भर का दर्द दे जाता है।
कर्नाटक के बीदर ज़िले में भी 48 वर्षीय संजू कुमार होसामणि की जान चली गई। तलामदगी ब्रिज के पास सड़क के बीच खिंची नायलॉन डोर उनके गले में फंस गई। मांझा इतना मजबूत और तेज था कि खून की धार बह निकली और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। राजस्थान में पाली निवासी दीपक लखारा अपने बेटे के साथ बाइक पर जा रहे थे, तभी चाइनीज मांझा उनके सात माह के मासूम बेटे करण की गर्दन में उलझ गया। चार इंच तक कटी गर्दन वाला यह बच्चा ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता रहा। ये केवल कुछ हादसे नहीं हैं बल्कि यह एक सिलसिलेवार कत्लेआम है, जो हर साल मकर संक्रांति के आसपास दोहराया जाता है और जिसे हम हर बार ‘अप्रत्याशित’ कहकर भूलने की कोशिश करते हैं। हालांकि प्रशासन की ओर से हर साल की तरह चेतावनियां जारी की गई, सोशल मीडिया पर अपीलें की गई और कुछ जगहों पर प्रतीकात्मक कार्रवाई भी हुई लेकिन जमीन पर हकीकत यह रही कि चाइनीज मांझा खुलेआम बिकता रहा और बेरोकटोक इस्तेमाल होता रहा।
चाइनीज मांझा पहले पक्षियों का दुश्मन था, अब इंसानों का हत्यारा बन चुका है। कबूतर, चील, कौवे और न जाने कितने परिंदे हर साल इस अदृश्य ब्लेड का शिकार बनते हैं। वे आसमान से तड़पते हुए गिरते हैं लेकिन उनकी मौत का न तो कोई आंकड़ा होता है और न ही कोई एफआईआर। इंसानों की मौत पर भी कुछ दिनों का शोर मचता है, फिर सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है, जैसे यह सब होना तय हो। चाइनीज मांझा कोई साधारण धागा नहीं है। यह नायलॉन से बना होता है, जिस पर कांच का चूरा, धातु के महीन कण और रासायनिक लेप चढ़ाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल एक होता है, दूसरी पतंग की डोर को काटना लेकिन यही धार जब किसी इंसान की गर्दन, चेहरे या हाथ से टकराती है तो ब्लेड से भी ज्यादा खतरनाक साबित होती है। धातु-लेपित होने के कारण यह बिजली का भी बेहतरीन सुचालक बन जाता है। कई बार यह हाई-टेंशन लाइनों में फंसकर करंट फैलाता है, बड़े इलाकों की बिजली गुल कर देता है और जानलेवा हादसों का कारण बनता है। दिल्ली जैसे महानगरों में मैट्रो सेवाएं तक इस मांझे के कारण बाधित हो चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद सबक नहीं लिया गया।
कानून की नज़र में चाइनीज मांझा प्रतिबंधित है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इसे पर्यावरण और जनसुरक्षा के लिए घातक मानते हुए इसके निर्माण, बिक्री और उपयोग पर स्पष्ट रोक लगाई है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986 के तहत इसके उल्लंघन पर पांच साल तक की सजा और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। ऐसे में सवाल यह है कि कानून इतना सख्त होने के बावजूद यह मांझा हर साल बाजारों में कैसे पहुंच जाता है? यह सवाल प्रशासन की कार्यप्रणाली और इच्छाशक्ति पर सीधा प्रहार करता है। छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई कर दी जाती है, कुछ रीलें जब्त कर ली जाती हैं लेकिन इस अवैध कारोबार की जड़ें जस की तस बनी रहती हैं। मेरठ जैसे शहर इस काले धंधे के गड़ बन चुके हैं, जहां से दूसरे राज्यों तक सप्लाई होती है और प्रशासन आंख मूंदे बैठा रहता है। आर्थिक पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। जहां पारंपरिक सूती मांझा महंगा पड़ता है, वहीं चाइनीज मांझा सस्ता मिल जाता है। लोग कुछ सौ रुपये बचाने के चक्कर में यह नहीं सोचते कि इसकी कीमत किसी की जान हो सकती है। यही मानसिकता इस समस्या को और भयावह बना देती है। सस्ता मनोरंजन, महंगी जान, यह विरोधाभास हमारे समाज की संवेदनहीनता को उजागर करता है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब किसी व्यक्ति की मौत चाइनीज मांझे से होती है तो दोषी कौन होता है? हवा में उड़ता आया मांझा किसने उड़ाया, इसका सबूत जुटाना बेहद मुश्किल होता है। नतीजतन, ज्यादातर मामलों में दोषी बच निकलते हैं और पीड़ित परिवार को केवल मुआवजा या सांत्वना देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।
पतंगबाजी एक लोक परंपरा है, इसलिए इसे खत्म करना समाधान नहीं है। यह बच्चों की खुशी, परिवारों के मेल-मिलाप और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक रही है लेकिन जब यह परंपरा दूसरों की जान लेने लगे, तब इसे सुरक्षित और जिम्मेदार बनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है। समाज को यह समझना होगा कि चाइनीज मांझा कोई खिलौना नहीं बल्कि एक जानलेवा हथियार है। प्रशासन को भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल संक्रांति के आसपास छापेमारी कर देने से समस्या हल नहीं होगी। सप्लाई चेन तोड़नी होगी, निर्माण स्थलों तक पहुंचना होगा और दोषियों को ऐसी सजा देनी होगी कि दोबारा यह कारोबार करने की कोई हिम्मत न कर सके। आखिर कब तक लोग सड़क पर चलते समय यह सोचकर निकलेंगे कि कहीं कोई अदृश्य डोर उनकी गर्दन न काट दे? कब तक माता-पिता अपने बच्चों को बाहर भेजते समय डर के साए में रहेंगे? कब तक मकर संक्रांति जैसे पर्व कुछ परिवारों के लिए मातम का कारण बनते रहेंगे? यह समय आधे-अधूरे अभियानों, खोखली चेतावनियों और औपचारिक कार्रवाईयों का नहीं बल्कि ठोस, निरंतर और ईमानदार कार्रवाई का है। यदि अब भी हम नहीं जागे तो यह खामोश हत्यारा यूं ही आसमान और सड़कों पर घूमता रहेगा। सवाल यह नहीं है कि अगला शिकार कौन होगा बल्कि सवाल यह है कि क्या अगली मौत से पहले हमारा समाज और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाएगा या फिर हर बार की तरह किसी और के गले कटने के बाद कुछ दिनों का शोर मचाकर चुप हो जाएगा?

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