लावारिस कुत्तों की समस्या
सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से हल होने की सम्भावना बढ़ी
लावारिस कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनके द्वारा निरन्तर आम लोगों को काटे जाने की घटनाओं ने इस समस्या को इतने गम्भीर चरण पर ला खड़ा किया है कि सर्वोच्च न्यायालय को एक बार फिर केन्द्र सरकार, प्रदेश सरकारों और उनके स्थानीय निकाय प्रशासनों को लेकर कड़ी टिप्पणियां करनी पड़ी हैं। सर्वोच्च अदालत ने इस बार जहां ऐसी घटनाओं को लेकर सरकारों पर मुआविज़ा राशि आयद करने की चेतावनी दी है, वहीं इस हेतु समाज और कुत्ता-प्रेमियों को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने हेतु कहा है। हालांकि सर्वोच्च अदालत की इन कठोर टिप्पणियों से इस समस्या का कोई अन्तिम हल तलाश किये जाने की सम्भावनाओं पर बूर पड़ते हुए भी दिखाई दिया है। मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने याचिका-कर्ताओं के वकीलों से अनुरोध किया कि वे इस मामले को प्रतिष्ठा से न जोड़ें, और इस निरन्तर गम्भीर होती जाती समस्या का कोई अंतिम और स्वीकार्य निदान तलाश किए जाने हेतु सहयोग करें। अदालत ने यह भी कहा कि उनके बार-बार के अनुरोध के बावजूद न तो केन्द्र सरकार ने इस हेतु कोई सार्थक प्रयास किया, और न ही प्रदेश सरकारों अथवा उनके स्थानीय प्रशासनों ने कोई सुचारू कार्य-योजना ही तैयार की। अदालत की पीठ ने इस तथ्य को लेकर भी खेद ज़ाहिर किया कि एक बार उन्होंने अपने ही फैसले को इसलिए पलटा कि शायद समाज और सरकारों को स्थितियों की गम्भीरता का कुछ पता चल सके। अदालत की पीड़ा को इस एक वाक्य से भी समझा जा सकता है कि हम पिछले चार दिनों से इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं किन्तु अन्तिम समाधान की ओर हम एक पग भी आगे बढ़े नहीं प्रतीत होते।
पशु विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय पूरे देश में लावारिस कुत्तों की संख्या लगभग 65 लाख हो सकती है। अकेले पंजाब में पिछले वर्ष लगभद दो लाख लोगों को लावारिस कुत्तों ने काटा। इस गणना के अनुसार लावारिस कुत्ते प्रतिदिन 10 हज़ार लोगों को काटते हैं। समस्या का एक बड़ा गम्भीर पक्ष यह है कि कुत्ता काटने के बाद होने वाला रैबीज़ रोग ला-इलाज है। एक बार इसके उत्पन्न हो जाने पर रोगी की मृत्यु तय हो जाती है। समस्या यह भी है कि रैबीज़ रोग के टीके भी प्राय: राज्यों में पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं होते। लावारिस कुत्तों की संख्या बढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार के निर्देशों और सरकारों के अपने दावों के बावजूद इनकी नसबन्दी अथवा अन्य उपायों की योजना टैंडर-बंदी में उलझ कर ही रह गई है। लावारिस कुत्तों के लिए शैल्टर बनाये जाने की योजना भी कागज़ों में बनी प्रतीत होती है। ऐसी स्थिति में अदालत कठोर रवैया न अपनाये, तो क्या करे। सरकारों की अपनी प्रत्येक योजना का परिणाम वही ढाक के तीन पात वाला ही सामने आता है। विगत वर्ष सात नवम्बर को सर्वोच्च अदालत ने एक फैसले के तहत राज्य सरकारों के अधिकारियों को कहा था, कि वे देश भर में तमाम सार्वजनिक स्थलों, शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, सड़कों और अदालत परिसरों को लावारिस कुत्तों एवं अन्य जानवरों से रहित बनाने हेतु यत्न करें। किन्तु, इस आदेश के विरुद्ध भी सर्वोच्च न्यायालय में अनेकानेक याचिकाएं दायर कर दी गईं। सर्वोच्च न्यायालय ने मौजूदा नया आदेश इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जारी किया है। सर्वोच्च अदालत की इस दलील में भी एक अज्ञात जन-पीड़ा व्यक्त होते दिखाई देती है कि कुत्ता-प्रेमी जितनी शिद्दत से कुत्तों बारे पैरवी कर रहे हैं, उतनी तत्परता से वे सड़कों पर ठिठुरते अनाथ बच्चों को गोद क्यों नहीं लेते?
हम समझते हैं कि नि:संदेह समस्या उस मोड़ पर आ पहुंची है जहां से और आगे बढ़ना सम्भव प्रतीत नहीं होता। समस्या का निदान चाहे सर्वोच्च न्यायालय के किसी आदेश से हो, अथवा सरकारों की किसी सार्थक कार्य योजना से सम्पन्न हो, कोई प्रतिफल अवश्य सामने आना ही चाहिए। बेशक गंदगी के ढेरों पर खाना तलाश करते लावारिस कुत्ते खूंखार हुए हैं। एक बच्चे के सिर के भीतरी हिस्से को खा जाने, एक अन्य घटना में बच्चा और 26 वर्षीय एक युवक को नोच-नोच कर मार देना, उनकी इसी वृत्ति का सूचक है। इस स्थिति को भी रोका जाना होगा, किन्तु निरीह, बेज़ुबान कुत्तों के लिए जीने के साधन मुहैया करवाना भी देश और समाज का दायित्व बन जाता है। गांवों और शहरों में गंदगी के ढेरों पर सर्दी-गर्मी-बरसात में जीते इन कुत्तों के लिए जीने का कोई तो साधन चाहिए। एकाधिक जजों की कई पीठ और अनेकानेक वकीलों की बहस-बाज़ी के बावजूद इस समस्या के हल की ओर अभी तक एक पग भी न बढ़ पाना सरकारों और उनके प्रशासन की अकर्मण्यता ही प्रतीत होती है।
हम समझते हैं कि तत्काल रूप में बड़ी संख्या में कुत्तों की नसबन्दी की जा सकती है, और एक निश्चित संख्या में लावारिस कुत्तों को खुले बाड़ों में रखा जा सकता है, किन्तु इस हेतु भी आवश्यकता एक दृढ़ प्रशासनिक संकल्प और ईमानदारी से योजनाबंदी तैयार करने की है। इस प्रकार लम्बी-लम्बी अदालती बहसों और सार्वजनिक दावों से समय की बर्बादी के अतिरिक्त कुछ हासिल होने वाला नहीं। उल्टे अदालत की सख्ती को आमंत्रित करने वाली बात भी हो सकती है। हम समझते हैं कि मुआविज़े और ज़िम्मेदारी आयद करने वाले सर्वोच्च अदालत के इस ताज़ा फैसले से मुद्दे को निर्णायक मोड़ तक ले जाने में बड़ी मदद मिल सकती है।

