राष्ट्र के समक्ष चुनौतियां और राजनीतिक दल
राजनीतिक दल लोकतंत्र की प्राण वायु होते हैं। सुशासन, योग्य सहभागिता, संसदीय गरिमा, पारदर्शिता, ज़िम्मेदारी एवं जवाबदेही राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त होते हैं। राजनीतिक दलों का साध्य ‘राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति एवं राष्ट्र सर्वोपरि’ होता है तो इनका साधन ‘संसद में सहयोग, संसदीय गरिमा की प्राप्ति एवं राष्ट्रीयता की भावना का उन्नयन’ होता है। सामयिक लोकतांत्रिक परिवेश में पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता, हिंदूओं पर जानलेवा हमले, पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शासकीय संरचना के बजाय सेना को सर्वोच्च शक्ति दिया जाना जैसे मुद्दे चर्चा में रहे हैं।
पाकिस्तान की शासकीय व्यवस्था में ‘तीन-ए’ की प्रासंगिकता हमेशा रही है, अर्थात अमरीका का वर्चस्व, सेना के हाथ में शक्तियों का केंद्रीकरण एवं पाकिस्तान ने अपने नकारात्मक साधनों जैसे छद्म युद्ध, सीमा पार घुसपैठ एवं चरमपंथी तत्वों को हमेशा बढ़ावा दिया है। ड्रैगन का हिंद महासागर एवं भारत के पूर्वोत्तर भाग पर अनाधिकृत नियंत्रण रेखा को बताना, इन सभी आक्रामक, अविश्वसनीयता की उपस्थिति एवं अपने मौलिक धर्म ‘पड़ोसी प्रथम’ के पालन में राजनीतिक दलों को अपने विचारों में एकता, भावनात्मक स्तर पर भारत के प्रति राष्ट्रीयता का भाव एवं रचनात्मक विपक्ष की भूमिका में होना आवश्यक है।
क्या भाजपा राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का मुकाबला करने में समर्थ है? क्या कांग्रेस सहित ‘इंडिया’ गठबंधन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर सरकार का सहयोग कर रहे हैं? क्या वामदल अपने शताब्दी वर्ष में अपने राजनीतिक अस्तित्व को सुरक्षित कर पाएंगे? क्या क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में बदलाव के लिए तैयार हो रहे हैं।
राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का समाधान स्थिर विचारधारा के प्रति स्तुति भावना रखने वाली सरकार कर सकती हैं । विगत 11 वर्षों के कार्यक्रमों, तथ्यों एवं आंकड़ों का राजनीतिक शल्य करने से स्पष्ट होता है कि भारत के समक्ष आंतरिक एवं वाह्य चुनौतियों का सामना वर्तमान सरकार पूरी निष्ठा एवं समर्पण से कर रही है। आंतरिक स्तर पर नक्सलवाद व पत्थरबाजी की घटनाएं, घुसपैठ की समस्याएं एवं जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद की समस्या सरकार को अस्थिर करने की सुनियोजित योजना पर सरकार ने कठोर प्रहार किया है। नक्सलवाद अपनी सिंचित भूमि से अंतिम सांसें भर रहा है। सरकार की मजबूत राजनीतिक इच्छा, प्रशासनिक स्तर पर ज़मीनी निर्णय, क्रियान्वयन की प्रतिबद्धता एवं असैनिक एवं सैनिक उत्साह से भारत ‘शून्य नक्सलवाद’ की तरफ अग्रसर है। विकास एवं पुनर्वास की नीति के कारण नक्सलियों के परिवार शिक्षा, रोज़गार एवं भौतिक एकाग्रता की तरफ आकर्षित हुए हैं।
निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है। अपने निर्णय को क्रियान्वित करने में सक्षम एवं स्वतंत्र निकाय है। लोकतांत्रिक संस्कृति में कार्यपालिका का अभिकरण है जिसने अपने सघन विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) के द्वारा लगभग 4 करोड़ अवैध मतदाताओं को चिन्हित किया है जो पहले लोकतंत्र के महापर्व के हिस्सा थे। भारत के बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं इनसे सटे राज्यों में लोग अवैध घुसपैठियों की तरह रह रहे हैं जो भारत में रहकर भारत को समय-समय पर अस्थिर के लिए नॉन स्टेट एक्टर्स की भूमिका निभा रहे हैं। भारत के मजबूत निगरानी तंत्र एवं सामाजिक संगठनों की सक्रियता के कारण वे भूमिगत हो जाते हैं। इन लोगों का संबंध कुछ भारत विरोधी देशों से है जिनके वित्त पोषण से भारत में अवैध गतिविधियों को अंजाम देते हैं। इन चुनौतियों के समाधान में विपक्षी दलों का रवैया नकारात्मक है। विशेष गहन पुनरीक्षण का कांग्रेस, राजद एवं टीएमसी विरोध कर रहे हैं और निर्वाचन आयोग के कार्य प्रणाली पर भी प्रश्न चिन्ह उठा रहे हैं। यह दुखद विषय है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष निर्वाचन आयोग पर वोट चोरी का तथ्यविहीन एवं प्रमाण विहीन आरोप लगा रहे हैं।
जम्मू-कश्मील में अनुच्छेद 370 एवं 35 ए के उन्मूलन के पश्चात हिंसक घटनाओं में कमी ही नहीं, बल्कि स्थिति नियंत्रण में है। सरकार की मज़बूत राजनीतिक इच्छा एवं सूझ बूझ से इन पर नियंत्रण किया जा चुका है।
राजनीतिक दलों का मुद्दा बेरोज़गारी, महंगाई और विधि एवं व्यवस्था है। इन मुद्दों पर विपक्ष सरकार को सड़क एवं संसद तक दबाव बनाने में अक्षम रहे हैं। कांग्रेस संगठन की राजनीतिक कमी है कि मल्लिकार्जुन खड़गे राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं लेकिन सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी का कांग्रेस में प्रभाव है। राहुल गांधी की छवि राजनीति में अपरिपक्व राजनीतिज्ञ की है क्योंकि वह ज़मीनी मुद्दों के बजाय व्यक्तिगत मुद्दों पर हमलावर होते हैं।
मौजूदा दौर की चुनावी राजनीति में वाम दलों का राजनीतिक प्रभाव अच्छा नहीं दिख रहा है। बंगाल, त्रिपुरा एवं बिहार (कुछ क्षेत्रों में) सत्ता पर काबिज रहे वामदल अब इन राज्यों में राजनीतिक वनवास पर है। बदलते परिदृश्य में वामदलों को बदलना होगा। (एजेंसी)



