आर्थिक नीति में बदलाव की उम्मीद

आगामी केन्द्रीय बजट 

जब भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आगामी 1 फरवरी को अपना 7वां यूनियन बजट पेश करने के लिए खड़ी होंगी, जो वह एक तरह का रिकॉर्ड होगा, तो उस पल में एक अनोखे पल महत्व का होगा। उद्योगपति, अर्थशास्त्री और वैश्विक निवेशक सभी इस बजट को दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए एक संभावित बदलाव के बिंदु के तौर पर देख रहे हैं।
बाहरी दबाव साफ दिख रहा है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक टैरिफ नीति ने वैश्विक व्यापार को हिला दिया है, संरक्षणवादी सोच को फिर से जगा दिया है और पूरे एशिया में निर्यात पर चलने वाली अर्थव्यवस्थाओं को अस्थिर कर दिया है। भीतरी उम्मीदें और भी तेज़ हैं। नई दिल्ली के नीतिगत गलियारे और कॉर्पोरेट बोर्डरूम में एक कहावत जो कभी इतिहास की किताबों के लिए रिज़र्व थी, अब फिर से सामने आई है, वह है 1991 का पल। उस साल भुगतान संतुलन के गंभीर संकट का सामना करते हुए भारत के प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत की समाजवादी-युग की कड़े नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था को खत्म कर दिया और इसे वैश्विक पूंजी और प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया। इन सुधारों ने तीन दशकों तक भारत की किस्मत बदल दी।
आज भारत संकट में नहीं है, लेकिन कई लोग तर्क देते हैं कि यह एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जो उतना ही महत्वपूर्ण है। ट्रम्प के टैरिफ, जिनका मकसद उत्पादन को वापस अमरीकी ज़मीन पर लाना है, ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को ऐसे समय में उलट दिया है जब कंपनियां पहले से ही चीन-केन्द्रित उत्पादन पर फिर से विचार कर रही थीं। भारत के लिए यह रुकावट दोधारी तलवार है। भारतीय नीति निर्धारकों का मानना है कि इसका जवाब अर्थव्यवस्था को और गहराई से, ज़्यादा भरोसे के साथ खोलने में है, जो उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन और बड़े मुख्य सुधारों से कहीं आगे है।
बजट पर चर्चाओं से वाकिफ अधिकारियों के मुताबिक सरकार ऐसे उपायों पर विचार कर रही है जो विदेशी उत्पादकों को भारत में उत्पादन करने, तीसरे देशों को आसानी से निर्यात करने, देश में निर्यात से होने वाली कमाई का हिस्सा बनाए रखने और आसान कर और सीमा शुल्क प्रणाली के तहत काम करने की इजाज़त देंगे। लक्ष्य है—पूंजी खाते के घाटे पर दबाव कम करना और साथ ही भारत को वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में और मज़बूती से शामिल करना। अगर ऐसा होता है, तो यह एक अहम बदलाव होगा, आयात विकल्प से निर्यातोन्मुख एकीकरण की ओर।
बजट से कई मोर्चों पर इस असंतुलन को दूर करने की उम्मीद है। अर्थशास्त्रियों को कॉर्पोरेट कर को और तर्कसंगत बनाने, सीमा शुल्क को आसान बनाने और मजबूत द्विपक्षीय निवेश सुरक्षा के संकेतों की उम्मीद है। विदेशी निवेशकों के लिए प्रोत्साहन नहीं, बल्कि प्रत्याशित रूझान की खबर सबसे कीमती बात बनी हुई है। भारतीय रिज़र्व बैंक के एक पूर्व अधिकारी ने कहा, ‘फोकस सट्टेबाजी की पूंजी पर नहीं है। यह लंबे समय से चर रही फैक्टरियों, निर्यात, नौकरियों और कर राजस्व पर है। इसी तरह वित्तीय, चालू खाता और पूंजी के घाटे को लगातार कम कर सकते हैं।’ एक सफल निर्यात बढ़ावा आयातित महंगाई को भी कम करेगा, रुपया मजबूत करेगा और अस्थिर वैश्विक पूंजी प्रवाह पर भारत की निर्भरता को कम करेगा। दुनिया भर में वित्तीय हालात सख्त होने के साथ यह एक तेज़ी से उभरती ज़रूरी प्राथमिकता है।
बजट की शांत लेकिन संभावित रूप से बदलाव लाने वाली बातों में से एक वैश्विक वित्त के प्रति भारत का बदलता नज़रिया है। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे प्लेटफॉर्म के ज़रिए भारत सावधानी से स्थानीय करंसी ट्रेड व्यवस्थाओं और वैकल्पिक सेटलमेंट मैकेनिज्म को बढ़ा रहा है।
1991 से तुलना में आज का भारत सापेक्ष शक्ति से काम करता है। विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त है, बैंक स्वस्थ हैं और विकास अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से आगे है। फिर भी इतिहास बताता है कि परिवर्तनकारी सुधार के लिए अक्सर एक उत्प्रेरक की आवश्यकता होती है। ट्रम्प के टैरिफ झटके ने पुरानी व्यापार व्यवस्था को अस्थिर करके शायद ठीक वही प्रदान किया है। यह बजट एक फुटनोट बनता है या एक महत्वपूर्ण मोड़, यह वित्त मंत्री के भाषण से कम और उसके बाद क्या होता है, (अधिसूचित नियम, वास्तव में खोले गए द्वार, वास्तव में तैनात पूंजी) पर अधिक निर्भर करेगा।
फिलहालए उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं। कॉर्पोरेट बोर्डरूम, ट्रेडिंग फ्लोर और विदेशी राजधानियों में वही सवाल गूंज रहा है कि क्या भारत एक ऐसी अर्थव्यवस्था का अनावरण करने वाला है जो पहले कभी नहीं देखी गई, इतनी आत्मविश्वासी कि व्यापक रूप से खुल सके, इतनी अनुशासित कि अपने खातों को संतुलित कर सके और इतनी महत्वाकांक्षी कि वैश्विक व्यवस्था में अपनी जगह को फिर से आकार दे सके? अगर ऐसा होता है तो इस बजट को सिर्फ एक सालाना रस्म के तौर पर नहीं, बल्कि उस पल के तौर पर याद किया जाएगा जब भारत ने एक बार फिर सुधारों की ताकत पर भरोसा करने का फैसला किया। (संवाद)

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