स्थायी संकट बनती जा रही है वैश्विक तपिश
प्रकृति के कैलेंडर में फरवरी का महीना आमतौर पर गुलाबी ठंड और वसंत की मंद बयार का प्रतीक माना जाता रहा है। यह वह समय होता है जब रबी की फसलें और आम के बगीचे अपने पूर्ण यौवन पर होते हैं। लेकिन साल 2026 की यह फरवरी डराने वाली है। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर, औरैया और बुंदेलखंड के पठारों से लेकर बिहार के कैमूर और समस्तीपुर तक, सूरज की तपिश ने समय से पहले ही मार्च के अंत वाले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। फरवरी के मध्य में ही देश के एक बड़े हिस्से में पारा 30 से 32 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है, जो सामान्य से करीब 5 से 7 डिग्री अधिक है। यह केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि वैश्विक तपिश का वह क्रूर चेहरा है जो सीधे हमारी थाली और देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रहार कर रहा है। हालिया समाचार और कृषि विश्वविद्यालयों के आंकड़े बताते हैं कि भारत में सर्दियों का संकुचन अब एक स्थायी संकट बनता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन का सबसे घातक प्रहार हमारी खाद्य सुरक्षा और फलों के राजा आम पर हो रहा है। रबी की मुख्य फसल गेहूं के लिए फरवरी का दूसरा पखवाड़ा बालियों में दाना भरने की अवस्था का होता है। इस नाजुक दौर में अचानक बड़ी गर्मी तापीय तनाव (थर्मल स्ट्रेस) पैदा कर रही है। जब तापमान 30 डिग्री के ऊपर बना रहता है तो पौधों के भीतर चयापचय की प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज हो जाती है और दाना पूरी तरह विकसित होने से पहले ही सख्त होने लगता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में जबरन परिपक्वता (फोर्स्ड मेच्योरिटी) कहा जाता है। परिणामस्वरूप दाना छोटा, हल्का और झुर्रियों वाला रह जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि तापमान में इसी तरह की वृद्धि जारी रही, तो गेहूं की पैदावार में प्रति हेक्टेयर 15 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। सागर और औरैया के खेतों से आ रही रिपोर्टें बताती हैं कि गेहूं की बालियां समय से पहले सफेद पड़ रही हैं, जो सीधे तौर पर किसान की साल भर की मेहनत पर पानी फेरने जैसा है।
विशेषज्ञ विश्लेषण बताते हैं कि आम का पुष्पन जाड़े के अंत और वसंत की शुरुआत में स्थिर तापमान और मध्यम आर्द्रता में होता रहा है। किंतु तापमान की वर्तमान अनिश्चितता ने इस प्रक्रिया को ‘रोलर-कोस्टर’ बना दिया है। लगातार 27-30 डिग्री से ऊपर का तापमान मंजर को समय से पहले परिपक्व कर देता है, जिससे फूलों की गुणवत्ता घटती है और वे झड़ने लगते हैं। सुबह की अत्यधिक नमी फफूंद जनित रोगों का जोखिम बढ़ा रही है जबकि दोपहर की शुष्क हवा पराग के अंकुरण को बाधित कर रही है। नतीजा यह है कि या तो फूल गिर रहे हैं या निषेचन के बाद भी फल टिक नहीं पा रहे हैं। पछिया हवा की बढ़ती तीव्रता ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है जिससे मंजरों की यांत्रिक गिरावट बढ़ गई है।
बुंदेलखंड और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में इस साल पश्चिमी विक्षोभ की विफलता ने आग में घी का काम किया है। आमतौर पर सर्दियों में होने वाली ‘मावट’ या बारिश फसलों के लिए अमृत समान होती थी, लेकिन इस साल शुष्कता और बढ़ती गर्मी ने मिट्टी की नमी को सोख लिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले एक दशक में फरवरी के महीने में लू जैसी स्थितियों की आवृत्ति बढ़ी है। यह पैटर्न स्पष्ट संकेत दे रहा है कि भारत के मौसम चक्र से वसंत ऋतु धीरे-धीरे गायब हो रही है और हम सीधे कंपकपाती सर्दी से झुलसाने वाली गर्मी के दौर में प्रवेश कर रहे हैं। इसका असर केवल गेहूं और आम पर ही नहीं, बल्कि सरसों और दलहन पर भी पड़ रहा है।
इस विकट परिस्थिति का निदान अब केवल पारंपरिक खेती के ढर्रे पर चलकर संभव नहीं है। हमें जलवायु-अनुकूल कृषि की ओर युद्धस्तर पर बढ़ना होगा। मिट्टी की नमी बचाने के लिए गन्ने की सूखी पत्तियों, भूसे या सूखी घास से मल्चिंग करना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। यह तकनीक सतह के तापमान को स्थिर रखती है और पानी के वाष्पीकरण को रोकती है। इसके साथ ही सूक्ष्म-सिंचाई को अपनाकर ‘कम पानी—ज़्यादा असर’के सिद्धांत पर काम करना होगा।
जलवायु परिवर्तन अब कोई दूरगामी चेतावनी नहीं, बल्कि हमारे खेतों की मेढ़ पर खड़ा एक कड़वा सच है। फतेहपुर से लेकर कैमूर और सागर से लेकर समस्तीपुर तक के किसान आज जिस तनाव में हैं, वह आने वाले एक बड़े खाद्य संकट की आहट है। यदि देश के कुल अनाज उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है, तो इसका असर केवल किसान की आय पर ही नहीं, बल्कि देश की जीडीपी और आम आदमी की रसोई पर पड़ेगा। हमें यह समझना होगा कि धरती का बढ़ता तापमान हमारे विकास के मॉडल पर प्रकृति का प्रतिघात है। फरवरी की यह असाधारण तपिश एक चेतावनी है कि यदि हम आज नहीं जागे, तो भविष्य के वसंत केवल लोकगीतों में ही जीवित रहेगी।



